लघुकथा : पिता का प्रेम

@साक्षी साहू सुरभि, महासमुन्द, छत्तीसगढ़…
माँ माँ मुझे कुछ सामान लेना है पिता जी से पैसे मांग दो न-मुन्नी ने माँ से कहा।
उधर से राजू आया और माँ से कहने लगा-माँ मुझे स्कूल ड्रेस लेना है पिताजी से पैसे मांग दो।
माँ ने पिताजी से दोनों के जरूरत के हिसाब से पैसे मांग लिए।
बच्चे अकसर माँ से ही अपनी जरूरत पूरी करवाते।
पिताजी को बहुत दुख होता कि बच्चे मुझसे क्यो कुछ नहीं कहते मेरे पास क्यों नहीं आते।
एक दिन उनसे न रहा गया तब माँ से कहने लगे-बच्चे मेरे पास क्यों नहीं आते मुझसे अपनी फरमाइश क्यों नहीं कहते।
माँ ने कहा-आपसे डरते हैं थके हारे आते हो तो आपको परेशान नहीं करना चाहते।
पिताजी ने कहा-मै उन्हें कुछ नहीं कहुंगा तुम अब उनकी फरमाइश लेकर मत उन्हें खुद मुझसे मांगने को कहना।
अब की बार माँ ने दोनों बच्चों से कहा कि अपने पिताजी से मांग लो।
दोनों डरते सहमे हुए पिताजी के पास गये।
पिताजी ने दोनों को गले से लगा लिया और उनके आँखो से अश्रु धार बहने लगी।
बच्चों की आँखो से भी आंसू बहने लगे।
पिताजी ने बच्चों को समझाया -बच्चो मैं तुम्हारे लिए, तुम्हारी खुशियों के लिए, तुम्हारे जरुरतो को पूरा करने के लिए ही मैं दिन रात मेहनत करता हूँ।जब तुम अपनी जरूरतों को मुझसे कहोगे तो मुझे अपार खुशी होगी।
पिता कितना भी थका हो बच्चों की आवाज सुनकर , बच्चों के चेहरे की मुस्कान देखकर पूरी थकान मिट जाती है,तुम दोनों ही मेरे जीवन का आधार हो।
आज मुन्नी और राजू ने पिता के प्रेम की अन्तर्मन से अनुभूति की।

