लद्युकथा : ऑटिस्टिक (shabd masiha kedar nath)

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…
इत्तेफाक सिर्फ अचानक होने वाली घटनायें नहीं हैं, कभी-कभी इत्तेफाक़ मेहनत से पैदा भी किए जाते हैं। वैसे तो तलाक होना या अलग रहना आजकल बहुत सामान्य सी घटना है लेकिन कभी-कभी कोई घटना असाधारण भी घटित होती है। एक बहुत ही सुखी दंपत्ति थी। सब कुछ अच्छा चला और एक रोज जब पत्नी ने बताया कि वह उसके बच्चे की माँ बनने वाली है तो पति भी बहुत खुश हुआ। पत्नी ने प्लान किया कि बच्चा पैदा होने पर वह ख़ुद उसका पालन पोषण करेगी।
बच्चा पैदा हुआ तो वे दोनों खुश थे। पहला बच्चा लड़का पैदा हुआ था। बच्चा बड़ा होने लगा तो स्कूल में भर्ती कराया गया । स्कूल में जाने पर पता चला कि बच्चा ऑटिस्टिक है। माँ को तो जो दुख हुआ वह हुआ ही लेकिन पिता अपने बच्चे को छोड़ देता है।
सिंगल मदर के सामने क्या परेशानी हो सकती है, वह बताने की जरूरत नहीं है। एक तो बेटे को लेकर चिंता और दूसरे पति से सेपरेशन, दोनों चोट उसे बुरी तरह से तोड़ देती हैं।
एक रोज जब वह स्कूल में बच्चे की प्रोग्रेस जानने पहुँचती है तो वहाँ उसे एक डॉक्टर मिलती है जो अपने बच्चे की रिपोर्ट लेने आई थी। दोनों के बीच बात होती तब वह औरत रोने लगती है और अपने बेटे की बीमारी के बारे में बताती है।
“हा हा हा …. किस दुनिया में जी रही हो तुम ऑटिस्टिक होने का मतलब ये नहीं है कि तुम्हारा बच्चा पागल है, उसके पास दिमाग नहीं । बस सिर्फ इतना है कि वह चीजों को देर से समझता है। लेकिन तुम चाहो तो उसकी जिन्दगी को बदल सकती हो। थोड़ा प्यार, थोड़ी मेहनत और थोड़ी सी जानकारी ….उसे किसी भी आम बच्चे की तरह ही कामयाब बना सकती है।” डॉक्टर उसे बताती है।
“लेकिन मैं उसे इतना समय कैसे दे पाऊँगी। मैं सिंगल मदर हूँ। मैं जॉब करती हूँ।” लड़के की माँ ने कहा।
वह कुछ देर सोचती रही और फिर बोली- “अपनी नौकरी छोड़ दो । बच्चे की जिन्दगी जरूरी है या नौकरी?” डॉक्टर ने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
“मेरे लिए बच्चे से ज्यादा कीमती हो भी क्या सकता है। पर पैसे नहीं होंगे तो इसे पलूँगी कैसे ?” माँ ने कहा।
“पढ़ी-लिखी हो, जवान हो कोई भी काम कर सकती हो । बताओ मेरे लिए काम करोगी ?” डॉक्टर ने हँसते हुए कहा।
“पर मैं तो सेल्स का काम करती हूँ , मुझे मेडिकल के बारे में कुछ भी नहीं पता।” बच्चे की माँ ने कहा।
“कुछ इन्वेस्ट कर सकती हो?” डॉक्टर ने पूछा।
“कितना ?”
“हर रोज कम से कम 12 घंटे । प्रॉफ़िट आधा-आधा।”
“मुझे करना क्या होगा?”
“मेरे पति का हॉस्पिटल है। हम वहाँ पर मेडिकल शॉप चलाते हैं। वहाँ पर जितना पैसा लगाओगी ….उस पर ब्याज भी मिलेगा और कमाई का आधा हिस्सा भी । अब सेल बढ़ाना तुम्हारा मारकीटिंग का कमाल होगा। वैसे आसपास में और भी केमिस्ट हैं । फैसला सोच समझकर ले सकती हो ।” महिला डॉक्टर ने मुसकुराते हुए कहा ।
“एक शर्त है मेरी।”
“क्या शर्त है, जल्दी बताओ ।”
“मैं अपने बेटे को भी शॉप पर ही रखना चाहती हूँ । वह मुझसे बहुत हिला हुआ है । अकेला नहीं छोड़ सकती ।”
“मंजूर है मुझे। कल से आ जाओ और पैसे इन्वेस्ट जब चाहो कर सकती हो । पहले काम समझ लो ।” और उसने अपना कार्ड निकालकर दे दिया।
समय बीतता रहा। उसके पति ने भी दूसरा विवाह कर लिया था। वह एक बड़ी कंपनी में काम करता था और उसका बेटा भी उसी स्कूल की दूसरी ब्रांच में पढ़ता था। दोनों बच्चे बारहवीं पास कर चुके थे। स्कूल का विदाई समारोह एक ही स्कूल में रखा गया था । पहले पति और उसके साथ आए बेटे को देखकर माँ कुछ उदास हो गई। बगल में बैठा बेटा माँ को देखते हुए बोला- “क्या हुआ माँ ? तुम उदास क्यों हो?”
“कुछ नहीं बेटा, आज तुम्हारा भाई भी यहाँ मौजूद है और तुम्हारे पापा भी।”
“कहाँ हैं, मैं उनसे मिलना चाहता हूँ।” बेटे ने पूछा तो माँ ने इशारा कर बता दिया । बेटा उठकर उनके पास गया और कुछ देर बाद सहमा और उदास सा लौट आया।
“क्या हुआ बेटा ?”
“वो अच्छे नहीं हैं। और वो लड़का मेरा भाई नहीं हो सकता । उसे लगता है कि सारे प्राइज़ उसे ही मिलेंगे।” बेटे ने कहते हुए अपना सिर माँ के कंधे पर रख दिया । माँ उसका सिर सहलाने लगी।
कुछ देर बाद प्रिंसिपल स्टेज पर आ चुकीं थीं।
“आप सभी लोगों का स्वागत है। आज हमारे बच्चे यहाँ से अगली जिन्दगी में प्रवेश कर रहे हैं। ये आपके पेरेंट्स की और आपकी मेहनत का नतीजा है। जिन बच्चों ने हमारे यहाँ सबसे ज्यादा मार्क्स लिए हैं, आज उनका सम्मान करने के लिए हमारे विशेष अतिथि आ रहे हैं । वे साइंस के क्षेत्र में बहुत बड़ा नाम हैं, लेकिन मैं आपको बताना चाहती हूँ कि वे ऑटिस्टिक थे । उन्होने समाज की धारणा को बदला है । उन्होने साइंस में पचास से ज्यादा पेपर सबमिट किए हैं। जोरदार तालियों से उनका स्वागत कीजिये।
“नमस्कार दोस्तो! ये सच है कि मैं एक ऑटिस्टिक बच्चा था। मेरे पिता को जब पता चला तो उन्होने मुझे किसी कचरे की तरह मेरी माँ के साथ निकाल दिया । पर मेरी माँ को मुझपर भरोसा था । और अब मैं कह सकता हूँ कि भरोसा ही ईश्वर है। कोई ईश्वर आप पर कृपा करे या न करे , लेकिन आपका भरोसा काम करता है । मेरी माँ को भी शायद कभी लगा होगा कि मैं क्या कर पाऊँगा ….हर एक को ऐसा लगना स्वाभाविक है। मैंने अपनी माँ को रोते हुए देखा था , मुझे दुख होता था । बस फिर क्या था, मैंने मेहनत को अपना हथियार बनाया और खूब पढ़ाई की । मैं आज यहाँ पर ख़ास इसी वजह से आया हूँ कि आज मुझे फिर से किसी ने दोहराया है। मैं चाहता हूँ कि वह बच्चा भी मेरे जैसा नहीं बल्कि मुझसे भी आगे जाय। मैंने उस बच्चे को एक लाख रुपये देने का निर्णय भी किया है। आपकी प्रिंसिपल उस बच्चे का नाम अभी आपको बताएँगी ।” अतिथि अपना भाषण देकर अपनी जगह बैठ गए।
“तो अब वो घड़ी आ गई है जब हम बुलाने जा रहे हैं अपने दोनों स्कूलों में टॉप करने वाले बच्चों को ।” प्रिंसिपल ने कहा तो बगल में खड़ी वाइस प्रिंसिपल ने उनके कान में कुछ कहा।
“माफ कीजिये , मैं बुला रही हूँ उस बच्चे को जिसने हमारे दोनों स्कूलों में हर सबजेक्ट में टॉप किया है। आपने भी कई बार उसका मज़ाक उड़ाया होगा , लेकिन उसने अपनी मेहनत से सफलता का झण्डा गाढ़ दिया है। लेकिन इस बच्चे की सफलता में सिर्फ बच्चे का रोल ही अहम नहीं है, बल्कि उनकी माँ का भी रोल बहुत अहम है, इसलिए स्कूल मेनेजमेंट भी उनको अपनी तरफ से एक लाख रुपये का पुरस्कार घोषित करता है। तो स्वागत कीजिये ….. अंकित और उनकी माँ का जिन्होने फिजिक्स ,केमिस्ट्री, बायोलॉजी, मेथ्स और इंग्लिश सभी सब्जेक्ट्स में टॉप किया है। और वो हैं मिस्टर रमन और उनकी माँ को।” प्रिंसिपल के कहते ही पूरा हाल तालियों से गूंज उठा।
वे दोनों उठे और पुरस्कार की राशि का चेक और एक दो नहीं बल्कि पाँच ट्राफियाँ उन्हें दी गईं । वे अपनी जगह आकर बैठ गए। बाकी बच्चों को भी पुरस्कार दिये गए और सभी लोग नाश्ते के लिए बुलाये गए । रमन को उसके दोस्तों ने घेरा हुआ था तो उसकी माँ को भी कई और औरतों ने । सभी उनको बधाई दे रहे थे ।
“रमन की माँ , तुमने मुझे गलत साबित कर दिया। ईश्वर इसको कामयाबी दे।” रमन के पिता बोले।
“शुक्रिया आपका । आपने तो आज भी उसे ऑटिस्टिक मानकर उसका अपमान किया था ।”
“मैं उसके लिए भी माफी मांगता हूँ । अगर मैं उसके लिए कुछ कर सकूँ तो मुझे खुशी होगी ।” वह अपनी आँखें नीचे किए हुए बोले।
“सॉरी , मुझे लगता है कि उसे किसी मदद की जरूरत नहीं । मैं दो लाख रुपये भी स्कूल को ऐसे ही बच्चों की मदद के लिए डोनेट कर रही हूँ । अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि बीमारी बेटे को नहीं है बल्कि समाज को है ….और ऑटिस्टिक आप भी है , जिन्होने आज मदद का सोचा। बेटे को सर के कालेज में एडमिशन मिल गया है। मेरी दो मेडिकल शॉप हैं …उसकाअपने ऑटिस्टिक बेटे का ख़्याल ये सिंगल मॉम रख सकती है।” कहते हुए रमन का हाथ पकड़े वह बाकी लोगों में विलीन हो गईं।


बहुत अच्छी और भावपूर्ण कहानी लिखने के लिए आपको बधाई।
मेहनत और विश्वास से सच है हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं 🙏💐💐