लद्युकथा : एक नया बाप

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…
कार घर में खड़े-खड़े धूल खा रही थी। पत्नी ने उसे बेचने के लिए कहा तो पति की आँखों से आँसू टपकने लगे। बेटे की कोरोना से मौत के बाद वे जैसे टूट ही गए थे। जब बेटे ने पहली सेलरी लाकर अपने पापा के हाथों में दी थी तब उन्होने खुशी-खुशी उसे माथे से लगाकर पत्नी को देते हुए कहा था -“इससे कह दो , संडे को पापा गिफ्ट देंगे।”
“ये बात तुम भी कह सकते थे इससे ?” पत्नी ने कहा।
“हाँ, इस पर तुम्हारा हक़ ज्यादा है। जब तक शादी नहीं होती सारा प्यार लुटा लो, फिर तो माँ की जगह बीबी ले ही लेगी तुम्हारी तरह ….हा हा हा।” पति कहकर दूसरे कमरे में चले गए थे। मज़ाक करना उनकी आदत थी। वैसे भी कौन बाप अपनी औलाद की तरक्की से खुश नहीं होता।
कुछ समय बाद बेटे हो बेंगलोर शिफ्ट होना पड़ा। जब दिल्ली आता तो कार में वे तीनों घूमने जाते । पापा की पूरी जिंदगी चेतक और स्कूटी पर गुजरी थी। जब बेटा गाड़ी चलाता तो उन्हें बहुत सकून का अहसास होता। उनका सपना बेटे ने पूरा कर दिया था । मिडिल क्लास फेमिली और सोचती भी क्या है।
समय गुजरा और नापाक बीमारी ने दस्तक दी। बेटा इस बीमारी की चपेट में आया और बेंगलोर में ही उसका दाह संस्कार कर दिया गया। खबर पाकर दोनों बुरी तरह टूट गए। समय गुजरता गया। आज बहुत हिम्मत कर के गाड़ी को बाहर निकाला और गेराज़ पर पहुंचे।
“अरे भाई जान! क्या हालत बना रखी है गाड़ी की ? कोई और ढूंढ लिया क्या ?” माजिद ने हँसते हुए पूछा।
“नहीं भाई, बात दरअसल ये है कि अब गाड़ी चलानेवाला ही नहीं रहा। किसी तरह यहाँ तक लाया हूँ, और मेरी अब हिम्मत नहीं होती। घर सूना हो गया। इतना बड़ा घर बेरौनक़ हो गया। एक-दूसरे को कुछ हो न जाय इसलिए किसी भूत की तरह चिपके रहते हैं एक-दूसरे की छाया से।”
“ओह! बहुत बुरा हुआ ये । अल्लाह आपको हिम्मत दे। आप बैठिए मैं चाय मँगवाता हूँ ।” माजिद ने कहकर अपने बेटे को चाय लाने के लिए कहा।
बेटा अच्छे कपड़े पहने हुए था और उसके हाथ में कोई किताब भी थी।
“ये कौन-सा बेटा है तुम्हारा ?”
“क्या बताऊँ …..यहाँ दिल्ली पढ़ने आया था। गाँव में इसका परिवार नामुराद बीमारी कोरोना की चपेट में आ गया। अपने बिलाल का दोस्त है। एक साल बाद ग्रेजुएट हो जाएगा। मेरे पास काम मांगने आया था। मैंने बेटा बना लिया। अब यहीं पढ़ता है और कभी-कभी मेरी मदद भी कर देता है। जानता हूँ कि इसे तकलीफ होती है । हमारा घर बहुत छोटा है अब तो पढ़ाई के लिए गेराज ही इसका मदरसा है , कालेज है।” माजिद ने कहा।
“ओह! एक मैं ही दुखी नहीं हूँ ….रहम कर प्रभु।” और उन्होने ईश्वर के सामने अपने दोनों हाथ जोड़ दिये।
कुछ देर बाद चाय आ गई थी। चाय पीते हुए उन्होने पूछा- “बेटे ! पढ़ाई कैसी चल रही है ? क्या पढ़ रहे हो?”
“मैं बी कॉम में पढ़ रहा हूँ। पढ़ाई ठीक ही चल रही है लेकिन कई जगह परेशानी होती है, अब्बू अंकल से कोचिंग के लिए किस मुँह से कहूँ , अब कमाई भी तो कम हो गई है, और महंगाई के साथ नफरत भी बढ़ रही है।” लड़के ने कहा।
“गलत सोच है, मोहब्बत भी बढ़ गई है। अब अपने अब्बू अंकल को ही देख लो, कितनी तारीफ कर रहे थे तुम्हारी। लेकिन मैं अपने बेटे की तारीफ नहीं कर सका उसके जिंदा रहते हुए। अरे! हाँ, माजिद बता रहा था कि तुम्हें पढ़ने के लिए जगह की सुविधा नहीं है। क्या तुम्हारे और भी दोस्त हैं यहाँ ?”
“अब्बू अंकल बहुत अच्छे हैं। यहाँ मेरे कई दोस्त हैं जो किराये पर रहते हैं। सबकी अपनी-अपनी परेशानियाँ हैं पर सबको तो अब्बू अंकल नहीं मिलते न ।” लड़के ने कहा।
“हाँ, तुम सही कहते हो। लोग इबादत को उठक बैठक या घंटा घंटी बजाना समझे हुए जो हैं। ख़ुदा का फरिश्ता या देवदूत कौन बनना चाहता है …यामदूत बनना जो पसंद आने लगा है। भगवान ख़ुद नहीं आ सकता तो इंसान के अंदर अच्छी भावना का पौधा लगाया ताकि आदमी भगवान बन सके ….ख़ुदा बन सके …मददगार बन सके , पर आदमी को शैतान बनने में मजा आता है। तुम खूब मन लगाकर पढ़ाई करो ….अल्लाह तुम्हें कामयाबी दे।” उन्होने लड़के की पीठ पर हाथ फिराते हुए कहा। लड़का चाय की तश्तरी लेकर चला गया।
माजिद कार दुरुस्त करने में लगा था और वे कुछ सोच रहे थे। कुछ देर बाद जब माजिद उनके सामने आया तो उन्होने माजिद से कहा- “माजिद ! पहले मैं सोचता था कि कार को बेच दूँगा, लेकिन अब मुझे एक ड्राइवर की जरूरत है। क्या इस लड़के को मुझे ड्राइवर की जगह रखने की इजाजत है मेरे घर में ?”
“बेटा है आपका, इसे सकून की जगह मिल जाय पढ़ने के लिए, तो इससे अच्छा क्या हो सकता है। मुझे कोई ऐतराज नहीं।” माजिद ने कहा।
“इसे तो इसलिए ले जा रहा हूँ कि बूढ़े-बुढ़िया एक वक्त खाना बनाकर गुजारा कर लेते हैं। ये साथ रहेगा तो दो वक्त खाना तो बनेगा।” वे हँसते हुए माजिद से बोले।
“भाईजान ! मुझे ख़ुद इसकी चिंता थी कि किसी रोज मेरे मज़हब की आंच इस पर न आ जाय। ये आपके ही धर्म का है। पर कभी-कभी इसे मिलने जरूर आने देना … पागल अब्बू से अंकल बना देगा अब ।” और माजिद सुबकने लगा।
“ये साला दिल भी बड़ा लोचेबाज़ है….जरा -सी देर में हँसाता है …रुलाता है, लेकिन सच कहूँ …जो पालक होता है …वही पिता होता है। तुम इसके बाप ही रहोगे। आज शाम को तुम सब हमारे घर आना खाने पर। इसे कहो कि अब मेरे घर ही रहेगा । गाड़ी में सब सामान रख ले अपना। अब इसकी पढ़ाई का जिम्मा मेरा …सी ए बनाकर छोडूंगा इसे …हा हा हा । और हाँ, एक नहीं ….इस ड्राइवर के क्लीनर साथी भी मुझे चाहियें….भला एक फूल का भी कोई गुलदस्ता रखता है ? मुझे पता है कि पढ़ाई बहुत महंगी हो गई है ….क्या पता किसी मजबूर बाप की मदद हो जाय।”
“भाईजान! आपने तो कमाल कर दिया। अबे सूरज ! अपना सामान गाड़ी में रख ले …आज से तुझे घर मिल गया और एक नया बाप भी।” कहते हुए माजिद ने उन्हें गले लगा लिया।

