आत्म शुद्धिकरण एवं समाज सुधार-आत्म शुद्धिकरण (Self Purification) समाज सुधार का मूल मंत्र है

आत्म शुद्धिकरण एवं समाज सुधार-आत्म शुद्धिकरण (Self Purification) समाज सुधार का मूल मंत्र है लेकिन यह प्रक्रिया आजीवन शतत् चलनी चाहिए। “आत्म शुद्धिकरण” का मतलब यह है कि जाने अनजाने में अगर किसी व्यक्ति में कोई बुराई घर कर जाती है तो ज्योंही उसे उस बुराई का एहसास हो तुरंत उस बुराई को अपने से निकालने का प्रयास शुरूकर उसे जड़ से समाप्त कर दें। अपनी बुराई को खुद पकड़ पाना थोड़ा कठिन है लेकिन व्यक्ति के हितैशी जल्द ही उसकी बुराई को संज्ञान में लेकर व्यक्ति को प्रेम से उस बुराई को जड़ से समाप्त करने के लिए उत्प्रेरित कर सकते हैं लेकिन “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” खुद उस बुराई की बिमारी से ग्रस्त होते हुए दूसरों को उस बुराई से छुटकारा पाने की सलाह कभी भी कदापि प्रभावशाली नहीं हो सकती है। महात्मा गांधी जी हमेशा आत्म शुद्धिकरण में लगे रहते थे। एक बार एक व्यक्ति अपने बेटे को जो बीड़ी पीने के दुर्गुण से ग्रस्त हो गया था उसे लेकर गांधी जी के पास गया और गांधी जी से उसकी आदत को छोड़ने की सलाह देने का आग्रह करने लगा। गांधी जी कुछ देर तक चिन्तन-मनन करने के बाद उस व्यक्ति से कहे कि अपने बालक को 15 दिन बाद लेकर आना। वह व्यक्ति पुनः 15 दिन बाद अपने बेटे के साथ गांधी जी के सामने हाजिर हो गया। तब गांधी जी ने बच्चे को संबोधित करते हुए कहा कि बेटा बीड़ी पीना बहुत गंदी आदत है इसे छोड़ दो।यह कहने पर वह व्यक्ति अपने क्रोध पर काबू करते हुए गांधी जी से हाथ जोड़कर कर कहा कि महाशय आप इस सलाह को प्रथम दिन भी दे सकते थे लेकिन आप ने एक छोटा वाक्य कहने के लिए 15 दिन का समय लिया एवं अनावश्यक रूप से मेरा समय एवं दूसरी बार आने का भाड़ा-किराया बर्बाद किया।
गांधी कुछ देर शान्त रहने के बाद उस व्यक्ति से कहा कि मुझे बताने में शर्मिन्दगी महसूस हो रही है। बात यह है कि जिस दिन पहली बार आप आये थे उस दिन तक हैं खुद बीड़ी पीता था। लेकिन 15 दिन के प्रयास से अब मैं उस बहुत गंदी आदत को हमेशा के लिए छोड़ दिया है।इसलिए आज मैंने अपनी सलाह दी है। अगर मेरे इस कृत्य से आप जो कष्ट हुआ उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ। यह बात सुनकर पिता पुत्र गांधी जी के चरणों गिर गये।पुत्र ने बीड़ी के साथ -साथ अपनी सभी बुराइयों को छोड़ने का प्रण लिया और अपने अन्दर की सभी बुराइयों को हमेशा के लिए परित्याग कर दिया। एक कहावत में कहा गया है कि जो भी व्यक्ति काजल की कोठरी में जायेगा उसे कालिख जरूर लगेगी। अर्थात् बुरी आदतों वाले लोगों के साथ रहने से मनुष्य बुरी आदतों का शिकार हो जाता है। मेडिकल साइंस में “प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर”का सिद्धांत कड़ाई से पालन की सलाह व्यक्ति/समाज को दिया जाता है। इसका मतलब वैक्सीनेशन, साफ-सफाई, पौष्टिक आहार, योग एवं व्यायाम, ट्रैफिक नियमों का पालन एवं अति तीब्र गति से वाहन नहीं चलाना, चिकने धरातल पर बहुत सावधानीपूर्वक चलना, बाथरूम में साइड गार्ड लगवाना जिससे बाथरूम में थोड़ा भी बैलेंस बिगड़ने पर साइड राड को पकड़कर गिरने से बचें, विभिन्न बिमारियों से बचाव/कम्लीकेशन/ सिक्वली रोकने लिए परहेज एवं नियमित दवा सेवन एवं मेडिकल चेक-अप आदि से बिमारी पैदा ही नहीं होने देना है। उसी प्रकार हर व्यक्ति को हमेशा बुरी संगत वालों से बचाव एवं नियमित सत्संग आमने सामने या टीवी पर करना चाहिए। एक कविता में एक प्रसिद्ध समाज सुधारक ने कहा है कि जब व्यक्ति आत्म शुद्धिकरण करते -करते मनुष्य जब महाज्ञानी/महात्मा बन जाता तब बुरे लोगों के संगत कोई प्रभाव वैसे ही नहीं पड़ता है जैसे चंदन के वृक्षों पर जहरीले सांप लिपटे रहने के बावजूद उसके जहर का कोई असर नहीं होता है। आत्म शुद्धिकरण एक तपस्या है। लेकिन बहुत कठिन नहीं है। दृढ़संकल्प एवं आत्म विश्वास से आत्म शुद्धिकरण का प्रयास हमेंशा सफल रहता है। किसी व्यक्ति के आत्म शुद्धिकरण प्रक्रिया में परिवार, आत्मीय जन, एवं समाज का भी बड़ा योगदान होता है।ऐसे लोगों को प्रोत्साहन एवं सम्मान दिया जाना चाहिए।ऐसे लोगों को ताना मारने एवं हे दृष्टि से देखने से व्यक्ति हतोत्साहित हो जाते हैं। कभी कभी मनो चिकित्सक एवं कौन्सलर की राय एवं चिकित्सकीय सहायता की भी आत्म शुद्धिकरण में जरूरत पड़ती है जिसे जल्द से जल्द ले लेना चाहिए। अंततः मैं यही कहूंगा कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनी भी कभी कभी राह से भटकने के वृतांत हमारी भारतीय संस्कृति में मिलता है तो आम आदमी का भटक जाना स्वाभाविक है। लेकिन खुद/आत्मीय जन/समाज को तुरन्त जागृत होकर आत्म शुद्धिकरण करना/करवाना चाहिए।
जय हिंद…



