शब्द मसीहा की कहानी : भाई झूठ नहीं बोलते

(शब्द मसीहा केदारनाथ)
तीन साल हो गए हैं और शालू रोज दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती है, जब भी सुनती है वह शाम को आने वाली गाड़ी की सीटी। उसका भाई उसी गाड़ी से मिलने के लिए आता था अपनी मां से, अपनी बहन शालू से। अम्मा को कोरोना निगल गया, या फिर उसे मरना ही था। अकेली शालू किसी तरह उसे अस्पताल तक तो ले गई थी एक रेहड़ी में डालकर। मगर अस्पताल में सांस देने वाली हवा नहीं थी। उसके साथ कोई ऐसा अपना भी नहीं था जो उसकी मदद करता।अस्पताल के बाहर ही मर गई थी। चार कंधे भी तो नहीं मिले थे उसको। किसी तरह शमशान तक ले पहुंचे थे और चार-पांच घंटे बैठे रहने के बाद आखिर जगह मिल ही गई थी जलाने को।
अगले रोज अकेले ही जाकर बीन लाई थी अपनी मां की हड्डियां और जमा करवा दी थी एक संस्था में, पंडित के कहने पर। पता नहीं माँ मरने के बाद गंगा जी पहुंची थी या कहीं नाले में, आजकल कुछ कहा नहीं जा सकता।

भाई को फौज में जाने का शौक था। मां उसे अक्सर कहती थी कि अपनी बहन का ध्यान रखने के लिए तुझे यहीं पर रहना चाहिए, लेकिन वह तो अपने बाप के पद चिन्हों पर चल रहा था। जब बाप मरा था तो उस ने एक ईटो वाला मकान बनवा दिया था अपने जाने से पहले। मरा तो वह भी सीमा के ऊपर ही था। कहता था दो-चार को मारकर ही मरूंगा। पाकिस्तान चला गया था, और उसकी लाश भी वापस नहीं आई थी। दुश्मनों के देश की मिट्टी में मिल गया था। मां आधी पगला गई थी। भाई तो तब भी नहीं लौटा था।
अकेली शालू रोज अपने भाई के लौट आने की राह देखती है, यह मेरी रेल तो रोज आ जाती है, भाई की याद भी आ जाती है, मगर उसका भाई नहीं आता। वह शाम को चार बजे अपने दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती है। लोगों का क्या है, जुबान हिलाने में दर्द भी तो नहीं होता, बहुत कुछ कहते हैं उसके बारे में। बाप की पेंशन आती है, उन पैसों से उसका काम चल जाता है।
गली से एक लड़का गुजरता है और मुड़कर उसकी तरफ देखता है। अजीब लड़की है ये, अकेली है, लेकिन किसी की तरफ मुस्कुराकर नहीं देखती है। हर रोज यही होता है। वह लड़का भी इसे देखते-देखते पगला गया है।
एक दिन उसने अपनी साइकिल को रोका और उससे पूछा- “तेरा नाम क्या है? तू रोज यहां पर खड़ी रहती है। तुझे और कोई काम नहीं है?”

शालू ने उसकी तरफ देखा और बोली- “नाम जानकर क्या करेगा? हां, मैं यहां रोज खड़ी रहती हूं, एक फौजी की बहन हूं, उसके इंतजार के सिवाय मेरे पास और कोई काम नहीं है। मेरा भाई लौटा नहीं है तीन साल से।”
वह लड़का शालू की आवाज सुनकर सन्न रह गया।
“उसका कोई खत आया? उसका कोई फोन आया?” लड़के ने पूछा।
“नहीं, पर मुझे पता है, वह जरूर लौटेगा। उसने कहा था, मेरे बाप की अस्थियां लेकर आएगा, तुझे पता है पाकिस्तान कितना दूर है?” शालू ने बड़ी ही मासूमियत से पूछा।
“तू पढ़ी-लिखी नहीं है क्या? तुझे नहीं मालूम कि जो पाकिस्तान जाता है वह लौटकर नहीं आता।” वह लड़का बोला।
“पाँच क्लास तक पढ़ी हूँ। लेकिन मुझे यह नहीं पता कि पाकिस्तान कितनी दूर है, अपनी मां के साथ मामा के यहां जाती थी, तो सुबह चलते थे और शाम को उसके घर पहुंच जाते थे। क्या पाकिस्तान मामा के घर से भी दूर है?” लड़की ने फिर पूछा।
“हां, तेरे मामा के घर से भी दूर है, लेकिन तेरा भाई वापस जरूर लौटेगा। तेरे जैसी बहन के लिए पाकिस्तान दूर नहीं है उसके लिए। तू रोज यहीं उसका इंतजार किया कर ….. भाई अपनी बहनों से झूठ नहीं बोलते।”
वह लड़का अपनी साइकिल को आगे बढ़ा देता है लेकिन उसका कुछ सामान उस दरवाजे पर अटक कर रह गया। अब वह लड़की उसे पागल नहीं लगती।

