रचनाकार

शब्द मसीहा : लाइफ़ रिवर्सल

(शब्द मसीहा केदारनाथ)

आज शहर का सबसे बड़ा रंगमंच पूरी तरह से सजा हुआ था और हॉल के अंदर बैठे हुए लोग इस बात का इंतजार कर रहे थे कि मोहिनी कब अपने नृत्य की प्रस्तुति करती है।

मोहिनी के अतीत के बारे में अखबारों में खूब लिखा गया था। मोहिनी जो दो बच्चों की माँ थी। और परिवार की देखभाल में जिसने अपने आप को पूरी तरह से खपा दिया था, जिस ने अपने ऊपर जरा भी ध्यान नहीं दिया था, और घर को बनाते-बनाते उसने अपने शरीर पर चर्बी के कई टायर चढ़ा लिए थे। उसके पति का बिजनेस अच्छा था। घर की तरफ से किसी तरह की चिंता नहीं थी इसलिए लगातार बिजनेस बढ़ता जा रहा था। मोहिनी घर को संभालती थी और पति विदेशों की यात्राएं कर रहे थे, अपनी सेक्रेटरी के साथ। मोहिनी ने अपना जीवन जिया, जैसा वो चाहती थी, जैसा उसने माँ, भाभी या बड़ी बहन को जीते देखा था।

अचानक उस बेढंग से शरीर वाली औरत से पति को बोरियत होने लगी। पति का कैरियर पिछले दस-बारह सालों में और भी आगे बढ़ चुका था। कमाई ज्यादा, रुतबा ज्यादा, रिश्तेदारों और समाज का डर, शर्म सब खत्म हो गया। जब सब कुछ अपने हिसाब से कंट्रोल होने लगा तो मानवीयता भी कम होने लगी, प्रेम के रिश्ते कमजोर होने लगे। घर मे कलेश बढ़ने लगा….और अंत ये हुआ कि दोनों में तलाक की बात होने लगी।

रोहन कम उम्र की ज्यादा सुडौल शरीर की, ज्यादा खूबसूरत दिखने वाली लड़की के साथ मस्त था। अब वो उसकी पार्टनर थी। मोहिनी खूब रोई, मायके में जाकर माँ-बाप को बताया, अपने भाई- भाभी को बताया, ख़ूब चिल्लाई पति पर, झगड़े किये, माँगने लगी वापिस अपनी वही जिंदगी जो उसके मिलने से पहले थी उसके पास, उस सारी छटपटाहट के बीच वो चाह रही थी कि पति माफी माँगे, कहे कि अब ऐसा नहीं होगा। वो महसूस करे उसके त्याग को। लेकिन, पति तो बस खुद को इसी दिन के लिए तैयार कर रहा था।

मोहिनी ने बच्चों की कस्टडी माँगी और रोहन खुशी-खुशी तैयार हो गया। अंधे को क्या चाहिए था…. दो आँख। पंद्रह साल की गृहस्थी बिखर गई। जबरन किसी रिश्ते को कब तक ढ़ोया जा सकता है।

रंगमंच का पर्दा उठा। लोग अपनी कुर्सियों पर खड़े हो गए। पूरे हॉल के अंदर जोरदार तालियां बजने लगीं। मोहिनी ने सभी लोगों का स्वागत किया अपना शीश झुकाकर। करीब पाँच मिनट तक पूरा हाल तालियों की जोरदार गड़गड़ाहट से गूँजता रहा।

उसके बाद मोहिनी के सामने एक माइक लाकर खड़ा कर दिया।

“मैं अपने देश हिंदुस्तान में आज अपनी पहली प्रस्तुति देने जा रही हूँ। आज मुझे इस बात का फख्र है कि मैं दो बच्चों की माँ हूँ, और मैंने अपने आप हो फिर से खोज लिया है। हम औरतें घरों को बनाती हैं। अपने घर को ही पूरी दुनिया समझ लेने की सबसे बड़ी गलती करती हैं। हमारे समाज को भी यह सोचना होगा कि एक औरत, जो अपना सब कुछ दांव पर लगा कर एक मकान को, घर कहने लायक बनाती है, उसको क्या मिलता है? चमत्कार को नमस्कार करने के लिए तो सभी तैयार हो जाते हैं, मैं इस बात को बखूबी जानती हूँ कि हर कोई एक उम्र के बाद लाइफ़ रिवर्सल नहीं कर सकता। जब एक औरत को बच्चे पैदा करने के बाद, शरीर पर निशान आ जाए, या फिर वह मोटी हो जाए, तो क्या उसे प्यार पाने का हक नहीं है? क्या ऐसी स्थिति में जब पति मोटा हो जाता है, तो क्या किसी औरत ने तलाक दिया है? यह तलाक़ की तलवार हम औरतों के ऊपर ही क्यों है? क्या मुझे उन बहनों के लिए लड़ना चाहिए, जो मोटी हो गई हैं, और तलाक के कगार पर हैं, या फिर हमें उन आदमियों को तलाक दे देना चाहिए जो हमारी हालत के जिम्मेदार है।

मैंने तो अपने बचपन से नृत्य सीखा था। शादी के बाद रम गई थी घर में, और नई परंपराओं के लिए अपने आप को खत्म कर दिया था। और उस बलिदान का जो मुझे सिला मिला, वह सब आप लोग जानते हैं। मैंने इस समाज के तानों से बचने के लिए अपने बच्चों के साथ विदेश जाने का फैसला किया। वहाँ जाकर अपने शरीर को ठीक किया, अपने बच्चों को पढ़ाया और फिर से आपके सामने अपने हुनर के साथ मौजूद हूँ। मैंने अपना पुराना नाम ही बदल दिया, उस हारे हुए नाम से मुझे नींद आती थी। मैं नहीं सुनना चाहती हूँ उस नाम को। हम कब तक सीता, सावित्री, अनुसूया का नाम लेकर अपनी बेटियों को ठगते रहेंगे और कब तक सामाजिक न्याय पर चुप्पी साधे रहेंगे। औरत आपके लिए खिलौना है क्या?

शरीर है, शरीर में बदलाव भी होंगे। यूं भी जो औरतें बच्चों को जन्म देती हैं, अपने पतियों के लिए सुबह से लेकर रात तक हर काम करती हैं, वे कोई मेहनताना नहीं लेतीं। किसी का वंश चलाती हैं, किसी के घर में खुशियां भरती हैं, लेकिन उन औरतों का क्या? क्या वे सिर्फ़ मात्र चलता फिरता खूबसूरती का कोई बाजार हैं, मर्द का प्यार आखिर रहता कहाँ है? क्या औरत सिर्फ मर्द को ही पसंद है? बिस्तर पर दो मिनट में दम तोड़ देने वाले कितने मर्दों को औरतों ने तलाक दिया है? अगर हमारा समाज इस बात को लेकर सोया रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जिस दिन औरतें शादियां करने से मना कर देंगी। औरत को भी उतना ही हँसने का और खुश रहने का अधिकार है, जितना कि किसी मर्द को। अगर हम औरतों के उस दर्द को इस समाज ने महसूस नहीं किया, तो यकीन रखिए आज नहीं तो कल….. किसी की बहन की जिंदगी में, किसी की बेटी की जिंदगी में, यह दर्द आने वाला है। अपनी बेटियों को बोझ और भोज बनाकर मत भेजिए, उन्हें दूसरे घर में अगर भेजना है, तो जिंदगी का लाइफ पार्टनर बनाकर भेजिए।

मेरी शालिनी से मोहिनी बनने तक की कहानी अमेरिका में बहुत सराही गई है। जब आप यहाँ से बाहर जाएंगे, तो आप उसे अपनी बेटी, अपनी बहन के लिए खरीद सकते हैं, और जो लोग इसे नहीं खरीद सकते, उनके लिए मेरी तरफ से उपहार में जरूर लेकर जाएं, अपनी बेटी या अपनी बहिन के लिए। एक औरत की सोच का बीज उसके दिमाग में आज से और अभी से रोपना शुरू करें, ताकि उसकी जिंदगी किसी शालिनी की जिंदगी के जैसी न हो। मैं पाँच मिनट के बाद आपके सामने उपस्थित होती हूँ। ” और मोहिनी ने अपने दोनों हाथ जोड़कर हॉल में उपस्थित सारे जनसमूह का अभिवादन किया।

इस बार तालियों की गड़गड़ाहट और भी ज्यादा थी। कई महिलाएं और पुरुष अपनी आँखों को पोंछ रहे थे।

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