जयन्ती विशेष : क्रांतिकारी चन्द्र शेखर आजाद

( डॉ गुलाब चंद पटेल )
चन्द्र शेखर आजाद शहीद दिवस 27 फरवरी 1931
अपनी अद्वितीय संगठन शक्ति और असीम साहसिकता के कारण सभी लोगो के प्रिय बन गए थे। आजाद जीवन के न्तिम श्वास तक “आजाद ‘ ही रहे थे। अंग्रेज़ सरकार को एहसास करने वाले ,उन्हे सबक सीखा ने वाले क्रांतिकारी ओ मे से ही लुंट की प्रवृती या शुरू की गई जिसमे चन्द्र शेखर ने वीरतापूर्ण हिस्सा लिया था। ‘काकरो घाट ‘ ट्रेन लुंट मे भी उनहो ने अजोड़ उत्साह पूर्णा हिम्मत दिखाया था। उसके संदरभ मे जो गिरफ्तारिया हुई उसमे ज़्यादातर कुशल और बहादुर नेता लोग सकंजे मे आ गए थे। चन्द्र शेखर के नाम का वोरंट भी निकला था ,किन्तु पुलिस को उनका पता न लगा ,पुलिस उन्हे खोज न पायी। नाम बदलकर चन्द्र शेखर ,वेश बदलकर उन्होने क्रांतिकारी सैनिको को शस्त्रों कि तालिम देने का भगीरथ कार्य किया था।
एक सामान्य परिवार मे जन्म लेकर अपनी मेहनत से देश के क्रांतिकारी दल के सेनापति के पद पर पाहुचे हुए चन्द्र शेखर ‘आजाद ‘ उनकी व्यावहारिक सूझ और अद्भुत साहस के लिए क्रांति दल मे पहचाने जाते थे। उनकी निखालसता ,सरलता,आत्मीयता,और स्नेहपूर्ण व्यवहार से वे सभी के प्रीति पात्र बन गए थे। वे क्रांतिदल के नेता थे। इतना ही नहीं दल की प्रतिस्ठा भी थे।

भारत माता के यह वीर पुत्र का जन्म मध्य प्रदेश के ‘भावरा ‘ नमक छोटे से गाँव मे एक चोटी सी बांस की झोपड़ी मे ई स 1905 मे हुआ था। उनके पिताजी सीताराम तिवारी ब्राहमीन थे। उनकी माता जगरानी देवी उनपढ़ थे। चन्द्र शेखर उनके पंचवे और सबसे छोटे पुत्र थे। पिताजी के हाथो पिटाई से रूठकर घर त्यज दिया था। चन्द्र शेखर घर से भागकर काशी पाहुचे थे,और वह एक छात्र गृह मे रहकर संस्कृत की पढ़ाई की उस दौरान असहकार आंदोलन शुरू हुआ था,और वे पिकेटिंग मे जुड़े और चाबुक की सजा सहकार भी गांधीजी की जय पुकारी थी। किन्तु गांधीजी ने आशाकर का आंदोलन यकायक रुकवा दिया था,किन्तु क्रोधित हुए अनेक नव युवाओ मे से एक यह चन्द्र शेखर भी थे। उनहो ने क्रांतिकारी दल मे जुडने का पसंद किया और देश की आजादी के लिए सरफरोसी करनेवाले वीर क्रांतिकारी ओके नेता बन गए थे।
चन्द्र शेखर के पूर्वज बदरका (वर्तमान उन्नाव जिला ) से थे। आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी संवत 1956 मे अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका छोड़कर मध्य प्रदेश आए थे। यहा उनहो ने मे अमीराजपुर रियासत मे नोकरी की और बाद मे जाकर भाबरा गाँव मे बस गए। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रांभिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र मे स्थित भाबरा गाँव मे बिता। अतःएव बचपन मे आजाद ने भील बालको के साथ खूब धनुष्य बन चलाये, चन्द्र शेखर कट्टर सनातन धर्मी ब्राहमीन थे। उनके पिता नेक,धर्ममय,और ई ईमान के पक्के थे। और उनमे पांडित्य का कोई अहंकार नहीं था। वे बहुत स्वाभिमानी और दयालु थे।
बचपन से ही चन्द्र शेखर मे भारत माता को स्वतंत्र करा ने की भावना कूट –कूट कर भरी हुई थी,इसी कारण उन्होने स्वयं अपना नाम ‘आजाद ‘ रख लिया था। उनके जीवन की एक घटना ने उन्हे क्रांति के पथपर अग्रसर कार दिया था.13 अप्रैल को जालियावाला बाग मे जनरल डायर ने जो नर संहार किया ,इसके विरोध मे तथा रोलेट एक्ट के विरुद्ध जो जन आंदोलन प्रम्भ हुआ था, वह दिन से दिन प्रतिदिन ज़ोर पकड़ता जा रहा था।
आजाद चन्द्र शेखर देश भक्त थे, वे दल के लिए धन जुटाने हेतु गाजीपुर के एक मरणासन्न साधू के पास केय बनकर भीरा,ताकि उसकेमरने केबा मठ की सम्म्पती उनके हाथ लग जाए,किन्तु वह जाकर जब उन्होने देखा की उनके पाहुचने के पश्चात वो साधू मरणासन्न नहीं रहा। अपितु ओर अधिक हट्टाकट्टा होने लगा तो वापस आ गए।
चन्द्र शेखर ने प्रांभिक शिक्षा घर पर ही ली थी। पढ़ाई मे उनका ज्यादा लगाव नहीं था। चन्द्र शेखर के मात-पिता उन्हे संस्कृत के विद्वान बनान चाहते थे,किन्तु चार तक पढ़ाई करते हुए उनका मन लग नहीं रहा था,वे वह से भाग जाने का सोच रहे थे। उनहों ने भागने का पक्का मन बना लिया था। एक दिन उचित समय देखकर आजाद घर से भाग निकले । वो एक नए भारत का निर्माण करना चाहते थे। जो सामाजिक तत्वो पर आधारित हो।
आजाद ने कुछ समय तक झाँसी को अपनी क्रांतिकारी गतिविधियो का केंद्र बनाया था। झाँसी से 15 किमी की दूरी पर वे ओरछा के जंगलो मे निशाने बाज का अभ्यास कार रहे थे। उन्होने स्तर नदी के किनारे स्थित हनुमान मंदिर के पास एक झोपड़ी भी बनाई थी। मध्य प्रदेश सरकार ने आजाद के नाम पर एक गाँव का नाम रखा था वो हे धीरमहूर । उस गाँव मे चन्द्र शेखर बच्चो को पढ़ाते थे।
चन्द्र शेखर आजाद काकोरी ट्रेन डकैती (1926)वाइसरोय की ट्रेन उड़ाने का प्रयास ,(1926) और लाहोर मे लाला लजपतराय की मौत का बदला, लेने के लिए गोली मरने जेसी घटना ओ मे वो शामिल थे, दिसंबर की कड़ाके वाली ठंड मे पुलिस ने रात मे चंद्र शेखर आजाद को गिरफ्तार किया और पूरी रात कुछ ओढ़ने बिछाने के लिए दिया नहीं,क्यो की ठंड के कारण आजाद वो सब कुछ बता देगा और वो ठंड से मर भी जाएगा। चन्द्र शेखर को दूसरे दिन बनारस न्यायालय मे मेजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया । मेजिस्ट्रेट ने चन्द्र शेखर से पूछा की बालक तेरा नाम क्या हे ?तो उनहो ने उतार दिया की “आजाद’ ।फिर पूछा की मात पिता का नाम ?आजाद ने बताया की स्वाधिनता। युवक की हेगड़ी देखकर मेजिस्ट्रेट क्रोधित हो गया और पूछा की,तुम्हारा घर कहा हे ? तब आजाद ने बताया गर्व से जेल की कोटरी । न्यायाधीश ने चन्द्र शेखर आजाद को क्रोधमे ही 25 बेंत (कोड़े) लगाने का आदेश दिया। चन्द्र शेखर ने बड़ी बहदुरी से ब्रिटिश सेना का सामना किया।
देश के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य स्वीकार करने वाले और खुद को गिरफ्तार करने के लिए उत्सुक यजमान की ओर भी एक वीर को शोभायमान एसी क्षमाशीलता दिखाई –एसे ये क्रांतिकारी वीर चन्द्रशेखर आजाद देश के लिए जिये और देश के लिए ही भव्य शहीदी स्वीकार कार ली।
एसे इस महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद ने अंग्रेज़ो के हाथो गिरफ्तार होने के बजाय अपनी खुद की ही पिस्तोल से अंतिम गोली से अपने प्राण की अंजली दिनांक 27 फरवरी 1931 के दिन दे दी। धन्य हे एसे माँ भारती के वीर पुत्र को ।
आज भी वह पिस्तोल इलाहाबाद मे म्यूजियम मे देखने को मिलती हे।
डॉ गुलाब चंद पटेल
कवि लेखक अनुवादक
अध्यक्ष महात्मा गांधी साहित्य मंच गांधीनगर Mo 8849794377



