सड़कों पर घंटों बिना वजह ही बाइक, पैदल व कार से फर्राटा न भरे लोग

जीवन के गुत्तम गुत्थी में एक अज़ीब सी रवायत लगी रहती है। जहाँ सरकार से लेकर प्रशासन सब ज्ञान दे रहे कि कोरोना हैं दूरियां बनाओ लेकिन लोग हैं कि दिलों से दूरियाँ बना कर खुद कोरोना के खतरों के करीब जा रहे हैं। जबकि नजदीकियाँ दिलो में हो तो अच्छा है। सरकार को नए नए तरीकों और प्रशासन के नए पैंतरों को देखे तो वो साम दाम दण्ड और भेद इन सबका पुर जोर प्रयोग कर रही है। वे हर स्तर तक लोगों को समझाने का प्रयत्न कर रही है कि वे इस महामारी की आपदा को समझे।
जहाँ लोगों को कहा जा रहा कि वे भावी समाज को बचाने हेतु सामाजिक दूरी बनाए ताकि उन्हें भविष्य में जिंदगी के लिए जद्दो जहद न करना पड़े। वही आम लोग है कि उनको सिर्फ अपने नयनसुख की अभिलाषा सड़को पर घंटो बिना वजह ही बाइक, पैदल व कार से फर्राटा भरकर आने जाने में मशगूल हैं।
लाकडाउन के पहले व दूसरे चरण में आर्थिक रूप से टूटे लोग जहां दो वक्त के भोजन में अभी जद्दोजहद कर रहे हैं वहीं बिना काम सड़क पर तफरी करने वाले अपने आदत से बाज नही आ रहे हैं। कुछ लोग दुकानों पर इसलिए भीड़ लगा कर बैठे है ताकि उनका घर के चाहरदीवारी पर लगी चित्रों और और मनोरंजन के समस्त संसाधनों से मन जो कि ऊब गया है वो थोड़ा खुश हो सके। जबकी चिकित्सालयों में लोग अन्य बिमारियों के इलाज में परेशान हाल हैं। कुछ लोग अपनै घर के बिस्तर को छोड़ कर कोरोना से दोस्ती करने हेतु शहर में पैतरा मारने से भी नही चूक रहे है। तीसरे चरण की गंभीरता को सभी को समझ हर एक व्यक्ति को अपने ही जीवन को लेकर कड़ा फैसला लेना होगा।

