रचनाकार

काव्य सृजन: पावस ऋतु

( साक्षी साहू सुरभि )

प्यास बुझाने धरती की,
रिमझिम पावस आया है।
मेघा ने प्रेम मय होकर,
झूमकर जल बरसाया है।

तप रही थी तपिश से धरती,
अग्नि बाण छोड़ रहा था गगन।
तरुवर से पात भी बिलग हुए,
सुना लग रहा था सघन वन।
सूरज की किरणों से तपकर
पवन भी तमतमाया है।
प्यास….

बरखा की बूंदें पड़ी धरा पर,
नव अंकुर कोंपले खिल गये है।
मोर नाचें पंख फैलाकर,
पंछी नीड़ छोड़ झूम रहे हैं।
बरखा रानी के स्नेह से
धरती ने आँचल लहराया है।
प्यास…..

नील गगन के साये में,
मेघ खुशियों से मंडराया है।
मेघों की बौछार देखके
किसान भाग्य पर इतराया है।
नव पल्लव फूटी धरा पर
देख मंद मंद मुस्काया है।
प्यास बुझाने धरती की
रिमझिम पावस आया है।
मेघा ने प्रेम मय होकर
झूम कर जल बरसाया है।

साक्षी साहू सुरभि, महासमुंद, छत्तीसगढ़

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