रचनाकार

लघुकथा : लौट आना मुसाफिर

( साक्षी साहू सुरभि ) रचना अतीत की हसीन पलों में खोई भविष्य के सुन्दर सपने बुन रही थी, तभी रवि की आवाज आई- रचना मैं आ गया तुम्हारे पास यादों से बाहर निकली देखा रवि सामने है।

रचना रवि से मिलकर हर दर्द हर दुख भूलकर खुशी से झूमने लगी।

कहाँ खोई हुई थी-रवि ने पूछा

बस बीते दिनों को याद कर रही थी-रचना ने उत्तर दिया।
कैसे ट्रेन के सफर में हम दोनों मिले थे। बातचीत में पता चला कि आप आर्मी में हैं और शादी के लिए घर जा रहे हो।
संयोग से ट्रेन के सफर से अब हम ज़िन्दगी के हमसफ़र बन गये।

हाँ रचना हम दोनों मुसाफिर एक होकर जिन्दगी भर साथ चलने का वादा किया,पर समय और परिस्थति के कारण मुझे तुम्हें छोड़ कर ड्यूटी पर जाना पड़ा।

रवि मैंने तुम्हारे बिना अकेले बहुत तकलीफ़ और परेशानियों का सामना किया,।

मैं जानता हूं इसलिए तो बड़ी मुश्किल से छुट्टी लेकर आया हूँ,अब सब ठीक हो जायेगा। इन छोटी बड़ी परेशानियां से ही तो हमें भविष्य में ढेर सारी खुशियां मिलने वाली है।

रवि के प्रेम ,सहयोग और इलाज से अब रचना पूरी तरह से स्वस्थ्य हो गई। रवि की छुट्टी भी खत्म हो गई थी।उसे वापस जाना था।

रचना ने दुखी मन से आँखो मे आँसू भरकर रवि को बिदा करते हुए आग्रह किया-
रवि ,हमे एक मुसाफिर की तरह मिलना बिछड़ना है।
मेरे आंचल में हमारे प्रेम की कली से फूल खिलने वाला है आप जल्दी लौट आना मुसाफिर।

रवि अपनी आँसूओं को पलकों में छुपाकर स्वीकृति में सिर हिलाते हुए चला गया अपने कर्मपथ पर।

साक्षी साहू सुरभि, महासमुंद, छत्तीसगढ़

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