कोरोना महामारी में बालमन पर प्रभाव व दुष्प्रभाव और सुझाव
( डॉ मीना कुमारी परिहार )
कोरोना महामारी ने आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में बड़ा बदलाव किया है। इसके कारण पैदा हुई परिस्थिति का सबसे अधिक शिकार छोटे बच्चे हो ग्रे हैं। इन बच्चों में सबसे ज्यादा ढूंढ रहे हैं तो वह है इंटरनेट वाला मोबाइल फोन। पिछले लांक डाउन से ही बच्चों को मोबाइल फोन पर गेम खेलने की लय लग गई है। वे छिपकर घर में मोबाइल देख रहे हैं। अभिभावकों के लिए बड़ा सिर दर्द बन गया है। कोरोना काल में लांकडाउन की वजह से लगातार घर में रहने के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ गया है। वे बात -बात पर गुस्सा कर रहे हैं। बाल रोग विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों के पास हाल के दिनों में ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
" आजकल खासकर किशोर अपने घर में कुछ समय अकेले अपनी मर्जी के मुताबिक समय बिताना पसंद करते हैं। कुछ को अपने दोस्तों के साथ खेलना और गप्पे लड़ाना पसंद है। लेकिन लांक डाउन की वजह से मां -बाप के हमेशा घर में रहने की वजह से यह सब बंद हो गया है"ज्यादातर मां-बाप बेवजह ही बच्चों पर निगाह रखने के लिए उनके कमरों में जाते रहते हैं और हर बात में टोका -टोकी करते रहते हैं। इससे खासकर किशोर उम्र के लड़के-लडकियों पर दबाव बढ़ रहा है। नतीजतन उनमें झुंझलाना पैदा हो रहा है। यह झझुंलापन बेवजह नाराजगी के तौर पर सामने आ रहा है।
कोरोना काल में कई माता-पिता घर से ही दफ्तर का काम भी कर रहे हैं। ऐसे में उनके दिमाग पर भी अतिरिक्त दबाब पैदा हो रहा है। इस वजह से ज़्यादातर लोग बित-बेबात बच्चों को झिड़क देते हैं। इससे बच्चों पर दबाव पड़ता है।
इस महामारी में बढ़ते एकल परिवारों की वजह से यह समस्या और जटिल हो गई है। बच्चों को अपने जीवन में पहली फिर ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है,जब वे लगातार लांकडाउन के कारण घरों में बंद हैं। न तो बाहर खेलने जा सकते हैं और नहीं स्कूल जा सकते हैं। किसी दोस्त से मुलाकात भी नहीं होती है। ऐसे में आखिर बच्चे मोबाइल, कम्प्यूटर और टीवी से कब तक मन बहलाएंगे...? दरअसल वे हालात से सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं। उम्र कम होने की वजह से उनमें परिस्थिति के मुताबिक खुद को ढालने की क्षमता विकसित नहीं हो सकी है।"
इस विषम परिस्थिति से बचने का रास्ता निकालना पड़ेगा। "स्कूलों के बंद होने के बावजूद बच्चों को पहले। के रूटीन मे के मुताबिक ही पढ़ाई करनी चाहिए।मां -बाप स्कूली शिक्षकों की तरह उनको रोजाना होमवर्क दे सकते हैं। इसके अलावा उनको घर के भीतर ही विभिन्न गतिविधियों में भी हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए। संभव हो तो समय निकाल कर मां-बाप को भी बच्चों के साथ उनकी ऐसी गतिविधियों में शामिल होना चाहिए। इससे बच्चा अलग-थलग महसूस नहीं करेगा। इसके साथ ही उनको समझाना होगा कि जल्दी ही यह दौर भी बीत जाएगा।" स्कूल खुलेगा तो थोड़ा समय लगेगा और सब ठीक हो जाएगा। छोटे बच्चे पटरी पर लौट आएंगे, बड़ों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
“ज़िन्दगी में खुशियां फिर से लौटेगी
फिर से गुलजार होंगी
गुजर जायेंगे ये पल भी
लांक डाउन के
फिर खिलखिलाएंगी बहारें
तबतक मुस्कुराकर इंतजार
फिर जवां होंगी मुलाकातें”

