कोरोना काल और दो-दो लाॅकडाऊन से बुरी तरह प्रभावित हुये कवि सम्मेलन
■ कवियों के समक्ष आजीविका निर्वहन की बहुत बड़ी समस्या
■ सूने काव्य मंचों के कारण समाज की दिशा और दशा बताने वाले आज आर्थिक रुप से है परेशान
( जितेन्द्र शिवहरे )
इंदौर। कोविड-19 महामारी ने कवि सम्मेलन के मंचों को भी सूना कर दिया है। पिछले साल की तरह यह साल भी काव्य मंचों के निरस्त्रीकरण के नाम रहा। छोटे बड़े सभी कवि सम्मेलन होते-होते निरस्त हो गये। इन सभी में उन कवियों का बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ जो पुर्ण रुपेण काव्य मंचों से ही आजीविका चलाते है। धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक आयोजन पूरी तरह बंद है। कवि सम्मेलन आयोजित होने की दूर-दूर तक कोई संभावना दिखाई नहीं देती। शासन स्तर पर भी कवियों के कोई योजना नहीं है। फलतः आर्थिक तंगहाली में कवि गुजर-बसर करने पर बाध्य है। ऐसे ही कुछ मंचीय कवियों से हमने उनके विचार जाने।
दो-दो लाॅकडाऊन से काव्य मंच बूरी तरह प्रभावित हुये है। पारंपरिक आयोजनों से भी आयोजकों ने हाथ खींच लिये है। सरकार द्वारा कवियों को आर्थिक सहयोग दिया जाना चाहिये।
राहुल बजरंगी
युवा ओज कवि, इंदौर
कलमकार कविता के माध्यम से अपनी बात कहता है। आज कवि सम्मेलनों का सूना होना निश्चित तौर पर काव्य प्रेमियों के लिए निराशाजनक है। इससे आजीविका निर्वहन में दिक्कतें आई है।
अंकिता जैन अवनी
लेखिका/ कवयित्री
अशोकनगर (म.प्र)
कवि सम्मेलन बंद हो जाने से ऐसा लग रहा है जैसे बसन्ती हवाओं ने फूलों के बगीचे में आने मना कर दिया हो और फूल निराश होकर मुरझा गए हों। लेकिन दूसरी ओर लॉकडाउन के इस समय में आत्ममंथन और अच्छी किताबें पढ़ने का बहुत अच्छा मौका मिला। किन्तू कवियों के लिए लाॅकडाऊन में जीवन निर्वाह एक बहुत बड़ी समस्या बनकर ऊभरा है।
विकास आर्य ‘स्वप्न’
पीलीभीत (उत्तर प्रदेश)

