अपना जिला

निकलना खुंद से आदम का सुनते आए थे फिर भी…….

(संजय दुबे)
सुना है, जिल्लेइलाही की शहर रूखसती हो गयी। अजीब निजाम है कुदरत का। निजामत का। फिलहाल दोनों उरूज़ पर है। एक ,कोरोना के जरिए चैलेंज दे रही है। दूसरी, उसके निपटने के तरीके में रोज नये फामूर्ले इजाद कर रही है। मसलन, कोरोना से निपटने के लिए क्या करें? कैसे करें? क्यों करें? अब? जनता करें क्या! उसके अख्तियार में सुनने के अलावा है क्या? जिल्लेइलाही ने कहा- शहर इस तरह खुलेगा, उस तरह बंद होगा। लोग के दरवाजें, दुकानें उसी तरह खुली, बंद हुई। मलाल बस इसका है कि कोरोना फिर भी अपनी पैदाइश में इजाफा करता चला गया। जैसे जैसे कोरोना बढ़ा वैसे वैसे लोगों की माली हालत बदतर होेती चली गयी। जनता, जम्हूरियत में सबसे निचले पायदान पर आती है। ठीक वैसे ही जैसे कुर्बानी का बकरा। ये अलग बात है कि निजामत, सियासत उसे अव्वल दर्जे का बताती है। मगर ऐसा सिवा वोट वाले दिन के अलावा उसे महसूस नहीं होता।
अपने हेडक्वार्टर की बात निराली है। पूरे सूबे में सबसे जुदा जगह। अपना खास अंदाज ए बयां। आरामतलब पहनावे के साथ वैसे ही अलमस्त बोली। पानी की तरह साफ मिजाज। मेहमान नवाजी वो कि जो भी यहां सरकारी महकमें में आया अपने मन से नहीं गया। उसे, निजामत ने वक्त की पाबंदी के चलते यहां से रूखसत किया या सियासत ने उनकी कारकदर्गी पर उन्हें इनाम या सजा से नवाजा। आया ट्रेन और दो बेडिंग के साथ। गया दो ट्रकों के साथ। इस शहर के मिजाज से वाकिफ होने में किसी को अरसा लग सकता है कुछ को महज चंद साल। कईयों को ये गुमां भी रहा है कि इतने सीधे और सरल पाॅलिटिकल शहर से बेहतर जगह कोई हो ही नहीं सकती इस शहर की एक खास बात और है ये, जितनी तेजी से आपको सर पर बैठाता है उससे कहीं तेजी से नजर से गिरा भी देता है। इसकी शुरूआत वो बद्दुआओं से करता है। ये पहलें वाहिद तौर पर शुरू होगी फिर हुजूम में तब्दील हो जायेगी। अब तो साइंस भी कहता है कि मुंह से निकली आयत, मंत्र के हरफ हवाओं में तैरते रहते है। तो अगर बद्दुआएं इस तरह दी जायेंगी तो? साथ ही एक और खसूसियत है इसकी, हाजमा भी काफी खराब है। ये दावत और बात दोनों पचाने में जरा आलसी है। दावत जितनी तेजी से खाता है उससे दुगने रफ्तार से उसके जायके का शीन,काफ बताता है। बात का भी यही हाल है। एक बात कहकर देखिये। बस,इतना कह दीजिये, कि ये किसी से कहना नहीं। शर्तिया तौर पर जिसके खिलाफ कुछ कहा गया होगा उसे पता चल ही जायेगा। जिल्लेइलाही की भी तूती शहर में बोली। हर आम ओ खास ने इसमें मन से शिरकत की। खुद जिल्लेइलाही के हममनसबदारों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। हो तुझको जो पसंद वहीं बात कहेंगे, तू दिन को कहे रात, हम रात कहेंगे वाली तर्ज पर चली जिल्लेइलाहियत।
इधर लाकडाउन का सिलसिला बढ़ता गया और अवाम की झोली खाली होती गयी। लोग बाग हैरान परेशान। उधर रोज नए नए कारनामों की फेहरिस्त। लोगों की जबान जो खीरीगबाग के कचालू की शौकीन है । उसके मसाले की तासीर को अपनी खास जबां में भाग…… के, अंदाज में पढ़कर तफसरा करती रही। लाकडाउन में कपड़े उस तरह लोगों के गंदे नहीं हुए जिस तरह अमूूूमन होते है। गुलैइची धोबिन को पुराने शहर से फाटक इस पार का रूख करना पड़ा। क्योंकि पापी पेट का सवाल है। अब, गुलैइची फाटक पार काम ही नहीं करती उधर से खबरें भी लाती। उसके मालिकान का जिल्लेइलाही के यहां उठना बैठना था। उनसे उनकी तारीफ वो सुनकर आती और मुहल्लें की पंचायत में अपने तल्ख तेवर के साथ उसे बयां करती। उसकी बात की तसदीक शहर के तमाम अख़बारात की खबरें सुबह बयां करती। कल शाम को वो आयी और पान घुला बैठ गयी अपनी पंचाट में-जिल्लेइलाही गए! उनके कामों की मकबूलियत नवाबों के शहर तक हो गयी। लिहाजा अब वो……..नहीं रहे।सुनते है प्रमोशन हो गया उनका। उसके बगल से एक नेता जी मुस्कराते हुए निकलें और उससे बोलें,तुम्हें सब पता रहता है। और कुछ बताओं। गुलैइची बोली- बात इ है नेता जी। हमरें साहिब गजल सुनते है। वो भी तब जब बहुत खुश हो तब। ऊ भी गालिब़ की। ये बात हमरी सहबाइन हमकों बताई है। आज दोपहर में साहब जब खाना खा रहे थे तो सुन रहे थे- निकलना खुंद से आदम का सुनते आये थे फिर भी
बड़े बे आबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकलें।

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