जब नेहरू ने कहा कि चीनी फौजें हमारी सीमा में आ रही है, उनको उठाकर बाहर फेंक दो
“चंद्रशेखर”…
“जिंदगी का कारवां “
मेरे संसद में जाने के कुछ ही समय बाद भारत और चीन युद्ध हुआ। मैं यह मानता हूं कि युद्ध के लिए हम लोगों ने ही उत्तेजना पैदा की थी।
पंडित नेहरू उस समय श्री लंका जा रहें थे, जाते समय उन्होंने कहा कि चीनी फौजें हमारी सीमा में आ रही है, उनको उठाकर बाहर फेंक दो, थ्रो दैम आऊट। नेहरू के इस ऐलान की वजह से असुविधाजनक स्थितियां पैदा हुई और चीन ने भारत पे आक्रमण कर दिया। हमारे यहां उसके लिए कोई तैयारी नहीं थी। हमारी तैयारी न होने के अनेक कारण थे। जिस समय हम हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगा रहे थे, उस समय हमारे मन में यह बात कहीं भी नहीं थी कि चीन और हमारे बीच युद्ध हो सकता है। मेरी समझ में तब भी यह बात नहीं आती थी और आज भी नहीं आती कि जवाहरलाल नेहरू ने उस समय ऐसी असावधानी क्यो बरती ?
यह असावधानी केवल सामरिक तैयारी के सिलसिले में ही नहीं थी,
अनेक मामलों में थी, जहां तक मुझे याद है सीमा-विवाद पर चीन, ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के प्रतिनिधियों की समझौते के लिए कई बैठकें भी हुई। हर बार जो संधि हुई उसपर चीन ने एतराज किया। इस तरह संधि केवल ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच ही हुई। जिस समय हमने तिब्बत पर चीन की संप्रभुता स्वीकार की, उस समय हमने इन बातों को नजरंदाज किया ।हम चाऊ-एन-लाई को कह सकते थे कि जो पुरानी संधियां है, उनपर आप हस्ताक्षर कर दिजिए। चीन के लोगों का कहना है, जब आप मानते हैं कि तिब्बत हमारा हिस्सा है तो तिब्बत से हुई ब्रिटिश इंडिया की जितनी भी संधियां है, उनका कोई मतलब नहीं है । यहां भी एक भूल हुई।
शायद भारत की यह परंपरा बन गई है कि बाहरी देशों में ख्याति प्राप्त करने के लिए हम वास्तविकता को नजरंदाज कर देते हैं।
गलती यही से पैदा होती है। जब हम जानते थे कि चीन सीमा पे विवाद उठा रहा है तब उसके मुकाबले के लिए हमारी भी होनी चाहिए थी।वह तैयारी नहीं हुई। इसके लिए प्रधानमंत्री को सीधे जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
पंडित जी ने तो हिंदी – चीनी भाई-भाई का नारा दिया था। वे जहां तक जनतांत्रिक संस्थाओं को मर्यादा देना चाहते थे, वही अपने व्यक्तित्व को एक अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व बनाने के लिए हमेशा सजग रहते थे ।ऐसी बातें करने से उन्हें दुनिया में शोहरत मिली है।
………………मुझे लगता है कि उसी इतिहास को ध्यान में रखकर आज के प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई जी भी काम करने लग गए हैं ।
जिस समय कारगिल की लड़ाई हो रही थी तो हमें दुनिया के लोगों ने कहा , वास्तविक नियंत्रण रेखा को आप पार मत किजिए , नहीं तो युद्ध होने की आंशका हैं ।
यह आशंका हम लोगों के दिमाग में पहले आ जानी चाहिए। मैं आज यह नहीं कह रहा हूं जिस दिन अणुबम बना था और सारी संसद में इसकी सराहना की जा रही थी, मैने इसे एक भूल कहा था ।
अणुबम रक्षा का हथियार नहीं है। अणुबम आक्रमणकारी हथियार है,इसे हम अपनी सीमा पर और सीमा के अंदर इस्तेमाल नहीं कर सकते, परमाणु बम हरदम दूसरे देश की सीमा में इस्तेमाल किया जाता है।
अगर लाहौर पर बम का आक्रमण होगा तो अमृतसर कैसे बचेगा ?
इसे याद रखना चाहिए । परमाणु परीक्षण से पहले हम पाकिस्तान से चार-पांच गुना बड़ी सामरिक ताकत थे। अब हम दोनो बराबर हो गये।
अंतर इतना ही हैं कि पहले वे हमको बर्बाद करेंगे या हम उनको बर्बाद करेंगे।
किसी को बर्बाद करने की हमारी परंपरा नहीं है। इसे भी ध्यान में रखना चाहिए और फिर वही हुआ ।
सारी दुनिया प्रशंसा करने लगी कि बड़े संयम का परिचय दे रहा है भारत ।
इसे हमने कूटनीतिक विजय की संज्ञा दी ।हमारे जवान बलिदान देते रहें लेकिन हमनें सीमा पार नहीं की,जो सामरिक दृष्टि शायद जरूरी था ।
आखिर हमलोग कितनी बार भूल करेंगे , और कितनी बार इन सवालों को उठायेंगे ।
क्रमशः…..

