महिला योद्धाओं से हारता कोरोना : शालिनी श्रीवास्तव
भारत की सभी महिला योद्धाओं के लिए परीक्षा की घड़ी है। कोरोना जहाँ विपदा लेकर आया है वही यह आपसी सामंजस्य लेकर भी आ गया है। जिन घरों में सभी सदस्य एक साथ यदा-कदा ही दिखते थे। अब वह सभी एक साथ रहने को विवश है। मतलब साफ है भारत में दूर जा रही परम्पराएं अब वापस आती दिख रही है।
कोरोना ने एक साथ बहुत कुछ बदल दिया। कुछ अच्छे तो कुछ बुरे परिणाम देखने को मिल रहे है। अच्छे परिणामों की बात करें तो प्रदूषण कम हुआ है, पारिवारिक मेल -जोल बढ़ा है, लोगों का दूसरों की जिंदगी में ताका-झांकी कम हो गया है, सबसे दूरी बढ़ाकर लोग अब अपने परिवार तक सीमित रहने को संकल्पित दिख रहे है। लेकिन इस बीच महिलाओं की भूमिका में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। कोरोना ने घरलू महिलाओं पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। उन्हें अब पहले से ज्यादा पकवान और फार्महिशों पर ध्यान देना पड़ रहा है। 
जो महिलाएं आमतौर पर घर से बाहर रहने को अभ्यस्त थी उनपर तो जैसे कहर टूट पड़ा हो। लॉकडाउन की स्थिति में न तो कामवालियां आ रही है और न ही बाहर कहीं डीनर पर ही जाने का प्रबंध है। एक -दो दिन की बात हो तो शायद घर संभाल हो जाता मगर घुम्मकड़ी प्रवृति की महिलाओं के लिए यह लॉकडाउन कितना मुश्किल भरा है इस बात का मर्म सिर्फ वही समझ सकती है। ना कोई किटी पार्टी, न इवनिंग पार्टी, ना ब्यूटीपार्लर ऐसे में टाइम पास के लिए घर का काम करना और बच्चे संभालना जैसे काम हाई प्रोफाइल लेडिजों को सूट नहीं कर रहा है। ऊपर से सास बहू के सारे सीरियल भी अब बंद हो चुके है। मज़बूरी में अब वे भी रामायण और महाभारत को देख रही है। इसी बहाने ही सही उम्मीद है उन्हें भारतीय परंपरा और संस्कृति का ज्ञान होगा जिसे वह लॉक डाउन खत्म होने पर अपने और अपने परिवार के बीच लागू कर सकेंगी।
कामकाजू महिलाओं के लिए भी कोरोना ने नाक में दम कर रखा है। अब तो वीकेंड -सिकेंड भी गया और साथ ही ऑफिस वाली गपशप, कानाफूसी भी ना रहा और तो और घर के कामकाज की आदत ना होने के कारण अवसाद बढ़ गया है और ऐसे में साथ देने के लिए कोई नौकर-चाकर भी नहीं है। और ना ही फ़ोन पर ईधर की उधर करने की ही सहूलियत है जिससे वे अपना मन का बोझ हल्का क्र सके। इसवक्त पूरी फैमिली साथ होने के कारण उनकी चालबाजियां धरी की धरी रह गयी है।
मगर उन महिलाओं के लिए कोरोना सुनहरा अवसर लेकर आया है जिन्हें ऑफिस से छुट्टी के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते थे और वे महिलाएं और माएँ जो अपने बच्चों को देखने, उनके साथ समय बिताने को तरस जाती थी उनके लिए कोरोना बीमारी नहीं सौगात है। अगर ऐसी बीमारी से घर का सामंजस्य बढ़ता है, बच्चे घर के बूढ़े माँ बाप के साथ वक्त बिताते है, नाते-नातिन, पोते-पोतियां अपने दादा-दादी, नाना-नानी से लोरीयाँ और कहानियां सुनते है, पूरा परिवार एक साथ रामायण देखता है ,भोजन और बातें करता है,एक दूसरे का हाल समाचार-खैरियत की दुवाएँ करने लगता हो तो यह कोरोना का सकारात्मक पक्ष है। ईश्वर करे की कोरोना के बाद भी उसकी सकारात्मकता बनी रहे। इस बीच जो अपने परिवार से दूर है और अकेले है उन्होंने बहुत कुछ गवां दिया है। ऐसा पहली बार था जब स्कूल कॉलेज, मार्केट,रेल बसे,ऑफिसे सभी बंद थी । अब शायद ही ऐसा मौका कभी आये ।
( शालिनी श्रीवास्तव लखनऊ की निवासी हैं और मुक्त लेखिका )

