शब्द मसीहा की कहानी : बहुत सस्ता है
पत्नी को बड़ा- सा टिफिन पैक करते हुए पति ने पूछा , “अरे! का हो गया है तुझे . का दोपहर में तू इत्ता खाती है ?”
“काहे डरते हो , हम मुटिया गए तो कहना . अपना ख्याल रखते हैं .”
“अरे! इत्ता तो तीन आदमी को भी पूरा हो जाय और तुम अकेले खाती हो ?”
“नाहीं …अकेले नाहीं , हमार माँ जी और बाबूजी हैं . दोपहर को हम उनके संग बैठ के खाते हैं .”
“पर तोहार माँ-बापू तो बचपन में मर गए रहिल.” पति ने आश्चर्य से पूछा .
“तो सुना , जहाँ सोसायटी में हम सब्जी बेचत हैं न , उहाँ एक बुजुर्ग जोड़ी है . उ का बालक सब छोड़ के चले गए . माँ जी से अब खाना बनत नाहीं है सो हम ही उ का वास्ते ले जाते हैं . ये टिफिन भी ओही दिए थे . चार -छह रोटी में अगर माई-बाबा मिलते हैं तो बहुत सस्ता है .”
पति के चेहरे पर अश्रुपूरीत मुस्कान फ़ैल गई थी .
शब्द मसीहा केदारनाथ

