विशेष : लोकतंत्र को किससे खतरा..
पूर्व रिसर्च एसोसिएट एवं मुक्त लेखिका
तीसरी और सबसे अहम बात यह है कि यह दौर लोकसभा चुनावों का है जिसपर सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा अबतक के चुनावो का सबसे ज्यादा ख़र्च किया जा रहा है । वही इलेक्टोरल बांड द्वारा भी गुमनामी चंदे के रूप में भी वीजेपी को ही सबसे अधिक फायदा हुआ । ऐसे में इसकी पारदर्शिता पर तो सवाल खड़ा होता ही है साथ ही देखना दिलचस्प होगा की अब चुनाव आयोग तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा राजनीति में अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ते कालाधन तथा अपराध को रोकने के लिए कौन सा कदम उठाया जाता है ।
बीते दिनों आपराधिक प्रवृति के लोगों का संसदीय चुनाव में भागीदारिता को लेकर ना तो संसंद में कोई कानून बन पाया है और ना ही चुनाव आयोग इस मामले में कुछ खास कर सका है । सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में दखान्दाज़ी से कतराता दिख रहा है । ऐसे में भविष्य के लोकतंत्र में भ्रष्टाचार ,अपराधीकरण आदि पर अंकुश लग पाना मुश्किल दिखता है । उससे भी मुश्किल है लोकतंत्र की सुचिता को बनाये रखना ,क्योंकि जिस तरह से लोकतंत्र में तानाशाही प्रवृति बढ़ती चली जा रही है । साथ ही तमाम बड़ी संस्थाएं जिसतरह सरकार अनुरूप फैसला ले रही है उससे लगता है कि राजनीति अन्य लोकतान्त्रिक स्तम्भों पर भारी पड़ रही है।
आज से पहले सेना का राजनीतिकरण इसतरह से नहीं हुआ । उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी ने ‘मोदी जी की सेना’ जैसे शब्द बोलने से पहले यह नहीं सोचा कि सेना देश की होती है किसी व्यक्ति की नहीं । हाल ही में ज्ञान प्रकाश द्वारा प्रकाशित पुस्तक “इमरजेंसी क्रोनिकल ” में भी इस बात जिक्र है पार्टी में सिर्फ मोदी जी के इमेज को ब्राण्ड बना कर प्रस्तुत किया जा रहा है । “मोदी है तो मुमकिन है” तथा अब की बार मोदी सरकार जैसे स्लोगनों से यह समझा जा सकता है कि बाकि चीजों को दबाकर मोदी को सामने रखा जा रहा है ठीक वैसे ही जैसे 1975 में इंदिरा गांधी ने किया था ।
इस समय भी एक राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति सी दिख रही है । दमदार विपक्ष है नहीं और तक़रीबन सभी बड़े नेताओं ने खुद को चुनावी रेस से बाहर रखने का फैसला कर लिया है । और तो और सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर मिशन शक्ति तक श्रेय प्रधानमंत्री को जाना यह आज से पहले नहीं हुआ। इन सबके के साथ पायलट अभिनंदन की फोटो के इस्तेमाल चुनावी फायदे के लिए करना और चुनाव आयोग का इस मसले पर प्रधानमंत्री को क्लिन चीट दे देना वाकही असहज कर देता है ।
ग़ांधी के राजनितिक विचारों को देखे तो यह जरुरी है कि देशहित के लिए कभी कभी जनमत के विरुद्ध भी फैसले लिए जाने की जरुरत होती है । मगर आज राजनीति न तो देशहीत की तरफ है ना ही जानता के हीत की तरफ । ए डी आर की रिपोर्ट बताती है कि अस्सी प्रतिशत सांसद करोड़पति है । राजनीति में आदर्शो का लोप हो चूका है । आरोप प्रत्यारोप और फालतू की बयानबाजियों से कोई भी राजनेता अछूता नहीं है । ऐसे में मौजूदा सरकार अगर बड़ी संस्थाओं तथा कॉर्पोरेट जगत को अपने अनुकूल ढाल भी लेती है तो सेना के राजनीतिकरण का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है । हाल ही में सूडान ,अल्जीरिया में सेना ने तख्तापलट कर तानाशाही सरकारों को उखाड़ फेंका है । भारत में ऐसी स्थिति तो नहीं आ सकती मगर अभी से सचेत हो जाने की आवश्यकता जरूर है। जरुरत से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन, संस्थाओं को कब्जे में लेने की प्रवृति और देश में अराजकता का माहौल लोकतंत्र में घातक साबित हो सकती है क्योंकि भारत की जनता अब जाग रही है।

