ऐतिहासिक सोनाडीह मेला रविवार से, प्रशासन ने मेले की तैयारियों का जायजा लिया
■ चैत्र नवरात्रि से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक चलता है मेला
■ मान्यता है कि इस दौरान मां से मांगी मन्नते अवश्य होती हैं पूरी
(अशोक कुमार जायसवाल)
बिल्थरारोड/बलिया। 14 अप्रैल दिन रविवार से लगने वाले सोनाडीह के ऐतिहासिक मेले की तैयारियां अंतिम दौर पर हैं। मेले में खिलौने, लकड़ी के सामान से लेकर लजीज व्यंजन व मनोरंजन के साधन तक उपलब्ध रहता है। बच्चों को आकर्षित करने के लिए झूला, जादू के खेल, चरखी सहित कई खेल के साधन भी मेले में मौजूद है। मेले में सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था को लेकर उभांव एसएचओ राजेश कुमार सिंह ने हमराहियो संग मेले का जायजा लिया। चैत्र रामनवमी से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक चलने वाले इस मेले का पौराणिक महत्व है। कहा जाता है कि क्षेत्र में राक्षसों का आतंक बढ़ने पर मां चामुण्डा ने इनका संहार करने के पश्चात इसी स्थान पर
विश्राम किया था। विजय स्थल के रूप में भी यह स्थान प्रसिद्ध है।
मां के यहां विश्राम करने से यह स्थान पवित्र हो गया जिसके चलते संसारिक कष्टों से पीड़ित मनुष्य जब मां भागेश्वरी व परमेश्वरी का दर्शन व पूजन करता है तो
उसे शान्ति मिलती है। संसारिक कष्टों से मुक्ति व मन्नतें मागने के लिए चैत्र नवरात्रि में आने वाले श्रद्धालुओं के चलते कालान्तर में यह एक वृहद मेले के रूप में परिवर्तित हो गया। शक्तिपीठ में शुमार सोडीह मंदिर में पूजा-अर्चना करने वालों की सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।
सोनाडीह मेले का इतिहास यद्यपि सोनाडीह मेले के बारे में कई किदवंतिया हैं पर माना यही जाता है कि इस क्षेत्र में रक्तबीज राक्षस व उनके दूत हाहा व हूहू राक्षसों के आतंक का मां चामुण्डा ने अंत कर इस क्षेत्र को उनसे मुक्त किया था। इसकी कहानी यह कि क्षेत्र में आतंक के पर्याय हाहा व हूहू राक्षसों ने मां चामुण्डा से शादी का प्रस्ताव रखा। मां चामुण्डा ने उनके प्रस्ताव पर सूर्योदय तक घाघरा नदी के बहाव को मोड़कर सोनाडीह तक ले आने की शर्त रखी। शर्त को पूरा करने के लिए दोनों राक्षसों द्वारा रात भर घाघरा नदी की खुदाई के बाद भी सूर्योदय तक अपने कार्य में सफल नहीं हो सके। अपनी इस असफलता से बौखलाकर उन राक्षसों ने मां चामुण्डा को युद्ध के लिए ललकारा।

भयंकर युद्ध में दोनो राक्षस मां के हाथों मारे गये। मंदिर के उत्तर दिशा में मौजूद हाहानाला को इस से जोड़ कर देखा जाता है। उधर अपने दूतों के मारे जाने से क्रोधित रक्तबीज ने मां पर हमला कर दिया। मां ने युद्ध में उसका भी काम तमाम कर दिया। गांव के दक्षिण-पश्चिम में मौजूद
रतोई ताल को रक्तबीज से जोड़ कर देखा जाता है। इसी प्रकार मंदिर के उत्तर दिशा में मौजूद मटूकाडीह गांव को मधु-कैटभ नामक राक्षस के वध स्थल से जोड़ा जाता है। मंदिर के पूर्व दिशा से 2 किमी दूर स्थित चंद्रौल गांव को भी चामुडा असुर के संहार का स्थान माना जाता है। गांव
के दक्षिण तरफ मौजूद शुम्भा ताल मां द्वारा शुम्भ-निशुम्भ राक्षसों के वध की गवाही देता है। देवी स्थान से 2 किमी पूर्व-दक्षिण दिशा में स्थित भिण्ड-कुण्ड गांव यानि भैंसकुण्ड को महिषासुर के बध स्थल से जोड़ा
जाता है। देवी स्थान से कुछ ही दूर स्थित चाड़ी गांव में चामुण्ड राक्षस का बध तथा दक्षिण दिशा में एक किमी दूर स्थित पुराना टीला बाणीकोट जो भगवानपुर में स्थित है को बाणासुर राक्षस के बध स्थल से जोड़कर देखा जाता है। मां द्वारा इस क्षेत्र से राक्षसों के संहार के बाद यहां विश्राम करने से यह क्षेत्र पवित्र हो गया।
विचारधारा से जुड़े सदस्यों ने की मंदिर प्रांगण की सफाई इसके पूर्व विचारधारा संस्था के सदस्यों ने मेले की बाबत अपने स्वच्छता अभियान के तहत मंदिर प्रांगण की सफाई की। फौजी रितेश यादव की अगुवाई में मंतोश मौर्य, मनमोहन, कान्हा ग्वाल, अमरिंदर, विवेक, जयचंद, हरिओम, विपुल शुक्ला, आनंद, अनुपम इस सफाई अभियान में शामिल रहें।

