शब्द मसीहा की कहानी : आपकी कभी औलाद न हो
मन्दिर के बाहर एक कोने में एक भिखारी बैठा हुआ था . बदन पर एक बनियान और एक कच्छा मात्र था . उसके पास भीख माँगने के लिए भी कुछ और न था . एक नव दंपत्ति मन्दिर से हँसते हुए बाहर निकल रहे थे . भिखारी ने हाथ फैला दिया .
पति ने जेब से दस का नोट निकालकर दे दिया .
“भगवान आपका भला करे . आपकी कभी औलाद न हो .” भिखारी ने दस का नोट माथे से लगाते हुए कहा .
इसे सुनते ही महिला को बहुत गुस्सा आ गया .
“तुम दुआ दे रहे या बद्दुआ ? क्या तुम पागल हो ? कोई ऐसा भी कहता है क्या किसी के लिए ?” महिला बोली .
“हाँ , मैं तुम दोनों की भलाई के लिए ही कह रहा हूँ . तुम्हारा बुरा नहीं चाहता मैं .” भिखारी बोला .
इस जवाब से नौजवान को भी गुस्सा आ गया और बोला –
“अरे! बाबा रहने दे . तुझे बोलना भी नहीं आता तो चुप रहा कर तू …ऐसी दुआ देगा तो भूखा मरेगा .”
“बेटा ! बहुत दुआएँ दीं अपनी औलाद को . एक दो नहीं ….तीन-तीन बेटे हैं मेरे . मुझे पागल बना दिया डॉक्टर को पैसा खिलाकर …घर …खेत …सब हड़प लिया . अब बताओ कि मैंने तुम्हें क्या गलत दुआ दी ? मैं चाहता हूँ सब खुश रहें मगर मेरे जैसी हालत अगर कोई औलाद करती है तो ….मैं कहूँगा कि आपकी कभी औलाद न हो .” और बुजुर्ग की आँखों से पीड़ा बह निकली जिसमें उस दंपत्ति का सारा गुस्सा बहकर लावे से हमदर्दी बन चुका था .
शब्द मसीहा

