अपना जिला

हमने हमारे मासूम बच्चों को क़ब्रगाह बनते देखा है…!

@अरविंद सिंह


यह सुशासन बाबू की छिजती लोक व्यवस्था का नग्न सच है या दुनिया की महाशक्तियों में तेजी से शुमार होती मोदी सरकार के नये भारत की असल तस्वीर। यह 21वीं सदी का भारत है या आदिम काल का भारत। यह तक्षशिला के उस महान ब्राह्मण चाणक्य के मगध साम्राज्य और उसके भूगोल का पसरा सियापा है जिसके इतिहास ने टूटते हिन्दुस्तान को जोड़ने का कार्य किया। या उन मांओं के चित्कार का घना अंधेरा है जिनके कलेजे के टुकडे़ हर घंटे मौत के मुंह में समाएं जा रहे हैं। और बच्चों का शरीर,मासूम लाशों का ढेर बनता जा रहा है। सच कहें तो हमने हमारी नंगी आंखों के सामने अपने मासूमों को चिता बनते देखा है। हमने बच्चों की तोतली आवाज़ों की डोर टूटते हुए देखा है। हमने मांओं का करूण क्रंदन और पिताओं की आह!निकलते देखा और सुना है। हमने 140 अबोधों को काल के गाल में समाते हुए देखा है।
लेकिन हमने किसी नेता के बच्चे को इस तरह मरते नहीं देखा है। हमने किसी नौकरशाह की पत्नी को इस तरह विलाप करते नहीं देखा है। हमने किसी मंत्री की दुनिया बिखरते और उजड़ते नहीं देखा जैसे आज हमने हिन्दुस्तान के उस बिहार में चमकी बुखार यानि इंसेफेलाइटिस से मुजफ्फरपुर को मासूम लाशों का मरघट बनते देखा है। हमने सामाजिक न्याय के परिवर्तक और सुशासन बाबू के उस सुशासन को तार तार और मरते हुए देखा है जिसकी आबादी ने भाजपानीत एनडीए को 40में 39 सीटें दी हैं। हमने हमारे समय में बिहार और दिल्ली की आती-जाती सरकारों और उनकी परियोजनाओं और दावों को तिल तिल कर मरते हुए देखा।हमने बौद्धों के विहार में समय और सभ्यता के मुहं पर बदनुमा दाग लगते देखा है। हमने देखा है एक तरफ बिहार के 40 सांसद दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक मंदिर संसद में लोक मर्यादा और विधि की रक्षा की शपथ ले रहे थे तो दूसरी तरफ वही लोक और उसका भविष्य विकास के नाम पर सभ्यता के भग्नावशेषों में तब्दील हो रहा था। मौत मासूमियत के सिर चढ़ तांडव कर रही थी और हमारे हुकमरान जीत का जश्न मना रहे थे। मुजफ्फरपुर की चीखें मासूमों को चिता बना रही थीं और भारत सरकार एवं बिहार सरकार के लिए नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनती जा रही थी। मंत्रियों और जवाबदेहों के लिए यह मौतें भले सामान्य सी घटना लग रही थी लेकिन 140 परिवारों की दुनिया हमारी आंखों के सामने उजड़ती जा रही थी।

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