आस्था

सनातन धर्म की रक्षा, धार्मिक सहिष्णुता, और सामाजिक उत्थान में संत कवि शिवनारायण जी का योगदान

(कल्याण सिंह)

हिन्दी काव्य साहित्य में भक्ति-साधना की अविरल धारा का उदय 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ जिसने हिंदी काव्य को प्रभावित करने के साथ-साथ संपूर्ण हिंदी जगत की आधारशिला को मजबूती प्रदान किया। भक्ति -साधना की जो धारा इस काल के प्रमुख संत कवियों ने अपनी रचनाओं में प्रवाहित की है वह आज भी निरंतर गति से समाज में निरन्तर सरिता की भांति बह रही है। इस काल में भक्ति की विभिन्न शाखाओं का जन्म एवं विकास हुआ जिस कारण इस काल को स्वर्ण काल अथवा हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है ! हिंदी काव्य साहित्य के निर्गुण शाखा के ज्ञानमार्गी धारा के अंतर्गत उत्तरी भारत की संत परंपरा में 17 वीं शताब्दी के मध्य एक समाज सुधारक संत कवि का प्रादुर्भाव संवत 1773 में ज्ञात होता है जो संत शिवनारायण नाम से आगे चलकर प्रसिद्ध हुए।

कल्याण सिंह

जीवन वृतांत…
संत शिव नारायण स्वामी का जन्म संवत् १७७३ में बलिया जिले (तत्कालीन गाजीपुर) के रसड़ा तहसील के अंतर्गत चंद्रवार गांव में नरौनी (परिहार) वंश के राजपूत बाघराय (पिता) के घर में माता सुंदरी जी के कोख में हुआ था ! इनके जीवन वृतांत के संबंध में हिंदी के प्रख्यात आलोचक डॉ रामचंद्र तिवारी जी, बलिया के हिंदी साहित्य के सूर्य परशुराम चतुर्वेदी जी, सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्य के प्रमुख विद्वान प्रसिद्ध नारायण सिंह ने तार्किक एवं विभिन्न मत प्रदान किए हैं । इन्होंने अपने गुरु का नाम स्वामी दु:खहरण बताया है इस तथ्य को स्वयं स्वामी शिवनारायण जी ने अपनी प्रसिद्ध एवं प्रमुख रचना ” गुरु अन्यास ज्ञान दीपक ” में अंकित किया है जो इस सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है जो इस प्रकार है।
“दुखहरण नाम से गुरु कहावे ,बड़े भाग्य से दर्शन पावे”!!
इनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही स्वाध्यायी के रूप में ज्ञात होता है स्वामी शिवनारायण जी तत्कालीन समय के संस्कृत के अच्छे ज्ञानी संत कवि माने जाते थे ।
संत शिवनारायण बाल्यावस्था से ही धार्मिक एवं संत प्रवृत्ति के प्रतीत होते जान पड़ते है ! शुरू से ही संतों के सानिध्य में विचरण किया करते थे जैसा कि उनके द्वारा लिखे गए दोनों से स्पष्ट इंगित होता है।
” एक दिन संत सभा में गयहूं ,
चर्चा शब्द होत तहा रहउ।
चर्चा सुन्नत बहुत सुख पाई, शिवनारायण सुनी मन लाई।।

शिवनारायण जी का जन्म भले ही चंद्रवार गांव में हुआ था किंतु उनका अधिकांश जीवन बिल्थरा रोड तहसील के अंतर्गत ससना बहादुरपुर गांव में ही व्यतीत हुआ। ऐसा माना जाता है कि चंद्रवार से अपने कुटुंब के साथ ससना बहादुरपुर में ही स्वामी शिवनारायण जी ने घने जंगलों के बीच वृक्ष के नीचे ध्यान साधना का केंद्र बनाया था तथा अपने गुरु के द्वारा प्राप्त शब्दों के प्रभाव से तपोभूमि नामक स्थान पर आकाशवाणी के द्वारा परमात्मा के दिव्य दर्शन को प्राप्त किए जैसा कि उनके प्रमाणित ग्रंथों में स्पष्ट प्रतीत होता है उसी गांव में ही इनके गुरु दुखहरण स्वामी की समाधी तथा मंदिर आस्था के प्रमुख केंद्र हैं साथ ही साथ संत शिवनारायण जी की समाधि भी दर्शनीय हैं।
नागरी प्रचारिणी सभा काशी के अनुसार स्वामी शिवनारायण जी का जन्म चंद्रवार में हुआ था किंतु जब उनके अंदर बाल्यावस्था में ही वैराग्य की वेदना हुई तो वह वहां से ससना बहादुरपुर के जंगलों की तरफ प्रस्थान किए तथा उनके साथ कुछ कुटुंबी भी चले आए स्वामी जी ने उन लोगों से कहा कि जंगल काटकर ग्राम वसा दो, सभी लोगों ने मिलकर ऐसा ही किया इस प्रकार संत शिवनारायण जी ने अपनी योग साधना ,ज्ञान,ध्यान आधारशिला इसी गांव में प्रारंभ किए। धीरे धीरे कालान्तर में वह एक सिद्ध संत के रूप में उन्होंने समस्त मानव जाति के उत्थान के लिए दृढ़संकल्प लेकर समस्त भारत में ज्ञान और साधना की प्राचीन परंपरा की रक्षा की.
साहित्य में योगदान…
संत शिवनारायण जी ने सनातन संस्कृति की रक्षा एवं सामाजिक उत्थान में अतुलनीय योगदान दिया है संत शिवनारायण जी का प्रादुर्भाव मुगल शासक मोहम्मद शाह रंगीला (१७१९-१७४८) के शासनकाल में हुआ था जिस समय देश में मुगल सल्तनत की तानाशाही तथा धार्मिक उन्माद धर्मानंतरण चरम पर था, हिन्दू समाज एवं सनातन संस्कृति ,संघर्ष कर रही थी उसी बिच 1935 ईस्वी में बंग देश के अंतर्गत शासीत होने वाला चंद्रवार गांव में मोहम्मद शाह रंगीला ने लगान वसूली के लिए अपने दूत भेजे तथा संत शिवनारायण से लगान देने को कहा यह सुन कर शिवनारायण ने कहा कि पोत (लगान) क्या कहलाता है मैं नहीं जानता और ना ही कभी पोत मैंने अदा किया है। इस पर मोहम्मद शाह ने उनको अपने दिल्ली के जेल खाने के अंदर बंद कर दिया जिसमें विभिन्न सनातन धर्म के साधु संत चक्की चलाने का कार्य करते थे
“सकल छोडो जाती को, भजहु संत पति नाम.
दुखहरन दुख काटीहे, चक्की चालिहे आज, !!
संत शिवनारायण जी ने अपने गुरु के प्रताप से उस निर्गुण रूपी चक्की को हाथ के स्पर्श मात्र से चला दिया इससे मोहम्मद शाह चकित होकर सभी संतो को रिहा कर देता है एवं अन्त में मोहम्मद शाह रंगीला संत शिवनारायण जी का शिष्य बनता है इस तरीके से संत शिवनारायण जी ने सनातन धर्म की संस्कृति की रक्षा की ।
सामाजिक उत्थान:-अगर स्वामी शिवनारायण जी का योगदान सामाजिक रूप से देखा जाए तो एक सामाजिक सुधारक का रहा है जिस समय देश के अंदर जाति व्यवस्था चरम पर थी समाज स्पष्ट रूप से दो वर्गों में बट चुका था सामाजिक संकीर्ण की मानसिकता की भावना से कार्य करने वाले लोग और आपसी समरसता का पूर्ण रूप से अभाव था इस सुधार हेतु दृढ़ संकल्पित मानव मात्र में कोई अंतर नहीं है इस वाक्य से समाज में व्याप्त जातीय व्यवस्था एवं वर्ण व्यवस्था के बीच तथा आपसी समरसता को कम करने का पूरा पूरा प्रयास किए साथ ही साथ दलित समाज के लोगों का बखूबी रूप से उत्थान करने का कार्य किए स्वामी शिवनारायण जी द्वारा चलाए गए संप्रदाय को ही शिव नारायणी संप्रदाय के नाम से देश विदेश में जाना एवं पढ़ा जाता है तथा उनके विचारों को आज भी लोग बड़े प्रासंगिकता के साथ अपने जीवन में आत्मसात करने का प्रयास कर रहे हैं।

प्रस्तुतकर्ता,

कल्याण सिंह

समाजिक कार्यकर्ता (गोल्ड मेडलिस्ट)
सचिव-स्वामी शिवनारायण जी तपोभूमि सेवा संस्थान रजि:१४१६

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