यूपी में 2027 का संग्राम

राजभर जी की राजनीति: जहाँ जाएँ, वहीं सीटों का गणित गड़बड़ा जाए!

@आनन्द कुमार…
कोई माने या न माने, लेकिन मऊ की राजनीति में ओमप्रकाश राजभर ऐसे खिलाड़ी हैं जिनकी एंट्री होते ही सहयोगी दलों के नेताओं की धड़कनें बढ़ जाती हैं। वे विरोधियों से कम और अपने गठबंधन के दावेदारों के लिए ज़्यादा चुनौती बन जाते हैं।

2022 का चुनाव याद कीजिए। तब समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन था। मुख्तार परिवार अपनी सीट पर जीत दर्ज कर गया, अब्बास अंसारी विधायक बन गए और राजभर जी भी अपना राजनीतिक कद बढ़ाने में सफल रहे। सबका हिसाब-किताब फिट बैठ गया।

लेकिन राजनीति में मौसम बदलते देर नहीं लगती। अब सपा से दूरी है और भाजपा के साथ गठबंधन है। ऐसे में अब्बास अंसारी को लेकर राजनीतिक समीकरण पहले जैसे नहीं रहे। भाजपा गठबंधन धर्म निभाते हुए मऊ सदर सीट पर चर्चा कर सकती है, लेकिन राजनीति के लाभ-हानि का कैलकुलेटर राजभर जी से बेहतर शायद ही कोई चलाता हो।

यही वजह है कि चर्चा है कि उनकी निगाह अब मऊ से ज्यादा मधुबन और घोसी पर टिकी है। रणनीति भी बड़ी सीधी है—दो सीटों पर दावा करो, चार में से एक तो हाथ आएगी ही। राजनीति में मांग जितनी बड़ी, मोलभाव उतना मजबूत।

इधर भाजपा के वे नेता, जो वर्षों से घोसी या मधुबन में अपनी दावेदारी की फाइल सँभालकर बैठे हैं, अंदरखाने बेचैन बताए जा रहे हैं। उन्हें डर चुनाव हारने का नहीं, टिकट कटने का है। क्योंकि यहाँ लड़ाई जनता से पहले गठबंधन की मेज पर लड़ी जाती है।

कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है, लेकिन मऊ में इन दिनों संभावना से ज्यादा चर्चा दावेदारी की है। घोसी और मधुबन वाले नेता माथा पकड़कर बैठे हैं और मऊ सदर वाले धीरे-धीरे सपने बुन रहे हैं।

बाकी राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। बस एक बात तय है—जहाँ राजभर जी की नजर पड़ जाए, वहाँ सीट का गणित दोबारा लिखना पड़ जाता है!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *