युवाओं में बढ़ रही है नशे की लत
भारत के साथ पूरे विश्व में युवाओं में बढ़ते नशे की लत को लेकर चिंताजनक स्थिति बनी हुई है । युवा किसी देश की रीढ़ की हड्डी होते है , जिनके कमजोर होने या भटकने से देश को काफी नुक़सान होता है । शराब,सिग्रेट, बीड़ी,गुटका,पान-मसाला आदि में जिसतरह से देश का आम नागरिक फॅसा हुआ है और जिसतरह से नशा उत्पाद बनाने वाली कम्पनियां अपने फायदे को लेकर आयेदिन नए – नए हथकंडे अपना रहीं है उससे लगता नहीं कि इन उत्पादों पर हाल फिलहाल कोई पाबन्दी लग पायेगी। आज सामाजिक सरोकार में लगे एन० जी ०ओ० , सुप्रीम कोर्ट ,आम जनता से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक नशे की की भयावता को लेकर भले ही काफी सजग और गंभीर हो , फ़िर भी इससे पूरी तरह छुटकारा मिल पाना अब भी टेढ़ी खीर है ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का आंकड़ा बताता है कि तंबाकू और धूम्रपान सेवन से दुनिया में हर छह सेकेंड में एक व्यक्ति की मौत हो रही है और भारत में हर 24 घंटे में 2800 से ज्यादा लोग मर रहे हैं।
ग़ौरतलब है कि डब्ल्यूएचओ ने तंबाकू उत्पादों और ध्रूमपान के खतरों से लोगों को अवगत कराने के लिए 2005 में एक प्रस्ताव पेश किया था। इसका अनुमोदन 180 देशों द्वारा किया गया है। इसमें तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन और प्रायोजकता पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी।
विश्व व्यापार संघ ने भी तंबाकू उत्पादों को हतोसाहित करने के लिए और मानव स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए तंबाकू उत्पादों पर प्लेन पैकेजिंग को बढ़ावा देते हुए कहा कि सारे तंबाकू उत्पादों के पैकेट का एक-जैसा ही रंग हो और उसके 85% हिस्से पर तस्वीरों के जरिये साफ शब्दों में चेतावनी दी गई हो। इसके अलावा, इन उत्पादों पर कंपनी को केवल अपने ब्रांड का नाम लिखने भर की छूट हो। ध्रूमपान और तंबाकू उत्पादों के खिलाफ जंग में अभी हालही में विश्व व्यापार का सादे पैकेजिंग के पक्ष में दिया गया फैसला ना सिर्फ मानव स्वास्थ्य को व्यापार से ज्यादा अहमियत देने वाला साबित होगा बल्कि इस फैसले से अन्य देशों को तंबाकू उत्पादों से अपने देश को नशा मुक्त बनाने में भी सहयोग मिलेगा ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के तंबाकू निषेध फ्रेमवर्क को अपनाने और इन उत्पादों की सादी पैकेजिंग का कार्य सबसे पहले आस्ट्रेलिया ने किया । उसके बाद फ्रांस,यू के, नॉर्वे,न्यूजीलैंड,हंगरी,उरुग्
आंकड़े कहते है कि एक सिगरेट जिंदगी के 11 मिनट कम कर देता है। तंबाकू और धूम्रपान उत्पादों के सेवन से औसतन हर घंटे 114 लोग जान गंवा रहे हैं, जबकि दुनिया में प्रति छह सेकेंड में एक मौत हो रही है।
वायॅस आफ टोबेको विक्टिम्स के मुताबिक तंबाकू का सेवन करने वालों के जीन में भी आंशिक परिवर्तन होते हैं। जिससे केवल उस व्यक्ति में ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों में भी कैंसर होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इसके साथ ही इन उत्पादों के सेवन से जहां पुरुषों में नपुंसकता बढ़ रही है, वहीं महिलाओं में प्रजनन क्षमता भी कम होती जा रही है । भारतीय चिकित्सा अनुसंधान (आईसीएमआर) की रिपोर्ट के मुताबिक ,पुरुषों में 50 प्रतिशत और स्त्रियों में 25 प्रतिशत कैंसर की वजह तंबाकू है। इनमें से 90 प्रतिशत में मुंह का कैंसर होता है।
चिंताजनक बात है कि भारत में हर दिन 5500 बच्चे तंबाकू का सेवन शुरू कर देते हैं। टीनएज से पहले ही देश में बच्चे तंबाकू के आदी हो जाते हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद मात्र तीन प्रतिशत लोग ही तम्बाकू के लत को छोड़ पाते हैं। एक सर्वे में यह बात सामने आयी है कि गांव और शहरों की लड़कियों में भी तम्बाकू सेवन की प्रवृति बढ़ रही हैं। ऐसे में भले ही आंकड़ों के हिसाब से तंबाकू उत्पादों के सेवन करने वाले लोगों में गिरावट दर्ज की गई हो, मगर फिर भी इस क्षेत्र में चुनौतियों की कमी नहीं है ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबित बीड़ी,सिग्रेट पीने वालों में कमी जरूर आई है मगर चबाकर खाने वाले तंबाकू उत्पादों में बढ़ोतरी दर्ज की गयी है । और इस वर्ग में ज्यादातर युवा शामिल है ।
भारत में तंबाकू कई रूपो में इस्तेमाल किया जाता है । यह खुले और बंद पैकेट के रूप में भी उपलब्ध है । अलग अलग तंबाकू उत्पादों के लिए अलग-अलग नियम या प्रावधान नहीं होने से सिग्रेट यदि बैन भी हो जाये तो इसे दूसरे रूपों जैसे हुक्का,बिडी आदि में आसानी से इस्तेमाल में लाया जा सकता है । ऐसे में सवाल यह है कि नशा मुक्त भारत कैसे और कबतक बनेगा ?
हालांकि भारत में सादे पैकेजिंग को बढ़ावा देने मात्र से इस समस्या का हल सम्भव नहीं है । मगर इससे उन कंपनियों को एक विकल्प मिलेगा जो इसे अबतक इसे एक फायदे का व्यापार समझकर आगे बढ़ रहे थे । और स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ कर रहे थे । उन्हें अब सोचना होगा कि यदि सादे पैकेजिंग से लोगों ने तंबाकू उत्पादों पर निर्भरता कम कर दी तो उनके व्यापार का दूसरा विकल्प क्या होगा? बहरहाल , राजनैतिक इच्छा शक्ति बहुत सी समस्यायों को समाप्त कर सकती है । मानव स्वास्थ्य से ऊपर व्यापार को नहीं रखा जाना चाहिए । मानव सबसे अमूल्य संसाधन है हमारे जीडीपी और आर्थिक-सामाजिक विकास के लिए । जब बिहार में सरकार शराब और प्लास्टिक को पूरी तरह बंद कर सकती है जबकि बिहार कई मामलों में एक पिछड़ा राज्य है । तो क्या तंबाकू उत्पादों जिससे कैसर जैसी भयानक बीमारी और जिससे युवा नशे की लत के शिकार हो रहे है,को बंद नहीं किया जा सकता ?
नोटबंदी,जीएसटी जैसे फैसले जब रातों-रात लिए जा सकते है तो क्या देश के युवाओं और आने वाली पीढ़ियों को नशामुक्त बनाने के लिये इन कंपनियों को बंद कर दूसरा विकल्प नहीं सुझाया जा सकता ? रातों-रात ना सही एक सही दिशानिर्देश और टाईमलाईन के अनुरूप क्या इनपर कार्रवाही कर इनको देशहित के लिये नशामुक्त बनाने का जिम्मा नहीं दिया जा सकता? ई सिग्रेट के अलावा क्या कोई ऐसा विकल्प नहीं दिया जा सकता जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुक़सान ना पहुँचाती हो ? स्वास्थ्य को ताक पर रख व्यापार करने वाली इन कंपनियों पर भरी टैक्स लगाकर नकेल कसने का काम अब शुरू कर देना चाहिए ताकि ये खुद अपना व्यापार छोड़ दे और आगे बढ़ते हुए तंबाकू उत्पादों के आयत- निर्यात पर पाबन्दी लगाकर इन कंपनियों पर ताला लगाने का इंतज़ाम आसानी से किया जा सकता है । जहाँ तक नशे की लत में फस चुके व्यक्तियों का सवाल है तो उनकी बजाये हमे स्वस्थ व्यक्ति की चिंता पहले करनी होगी ताकि वे नशे के चंगुल में ना फॅसे । नशे में फॅस चुके व्यक्तियों के लिए वैसे भी सरकार नशामुक्ति केंद्र और एनजीओ की मदद से काम कर रही है । अब जरूरत है कि हमारी आने वाली पीढियां नशे से मुक्त हो।
शालिनी श्रीवास्तव
पूर्व रिसर्च एसोसिएट
एवं मुक्त लेखिका

