मुझे याद है
( शब्द मसीहा केदारनाथ )
तीनों बच्चों को अपने कमरे में नदारद पाकर देवरानी जेठानी बहुत घबराईं कि ये नटखट कहाँ चले गए हैं। दोनों अपने सास-ससुर के कमरे की तरफ बढ़ीं, लेकिन ये कमरा भी खाली था। दोनों सोच में पड़ गईं कि ये सब लोग कहाँ हैं ? तभी छत से कुछ ठोकने की आवाज आई। वे दोनों ऊपर गईं, तो छत का तो माहौल ही बिगड़ा हुआ था।
बच्चे थोड़ी -थोड़ी दूर पर आलती-पालथी मारकर बैठे थे। सासु माँ बच्चों से बातें कर रहीं थी और ससुर जी के साथ दोनों के पति मिट्टी कूट रहे थे।
“आप सब यहाँ हैं, और हम घरभर में ढूंढते हुए परेशान हो रहीं हैं।” बड़ी बहू बोली।
“चलो अच्छा हुआ कि तुम भी आ गईं । ऐसा करो दो बड़ी बाल्टियाँ नीचे से लाकर उनमें पानी भर दो।” जेठ जी ने कहा ।
“लेकिन छत पर पानी का क्या काम है ?” पत्नी ने पूछा।
“आजादी के लिए पानी की बहुत जरूरत है। जाओ और काम में मदद करो।”
पति ने जैसे आदेश दिया था। जेठानी ने देवरानी की तरफ हैरानी से देखा और दोनों नीचे चली गईं बाल्टियाँ लाने के लिए। वापिस आईं तो ससुर जी भी और सास भी बच्चों से थोड़ा दूर बैठे हुए हँस रहे थे।
“दादाजी ! जब फोन नहीं था तब लोग मैसेज कैसे भेजते थे किसी को?” पोते ने पूछा।
“मैसेज तो तब भी भेजते थे बेटा। कबूतर, पाले हुए बाज, पतंगे, गुब्बारे, चिट्ठियाँ, तार और कई बार साइकिल या बहुत पहले घुड़सवार भी मैसेज लेकर जाते थे। और पहले लोग घंटे बजाकर, नगाड़े बजाकर मैसेज भेजते थे।” ससुर जी बोले।
“ओहो, तभी गाना बना होगा कबूतर जा…जा…जा। हैं न दादाजी।” इस बार पोती ने पूछा था।
“हाँ, ये गाना वहीं से प्रेरित है। लोग कई तरह के पक्षी पालते थे जो संदेशे लेकर जाते थे। तब एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए पैदाल, घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी आदि का खूब इस्तेमाल होता था। लोग घर से जाते तो कई बार महीनों बाद वापिस आते थे।” ससुर जी बोले।
“महीनों बाद क्यों? क्या मुफ्त का खाना खाने जाते थे?” दूसरे पोते ने पूछा।
“हा हा हा ….अरे! ऐसा नहीं कहते। लोगों में बहुत प्यार था। लोग भले रूखा-सूखा खाते थे, पर प्यार से खाते थे। मेहमान भी कोई निठल्ले थोड़े ही बैठते थे। कहीं गए तो वे भी उसी परिवार का हिस्सा बनकर काम करते थे। इसलिए मेहमान किसी पर बोझ नहीं लगता था।” ससुर बोले।
“और क्या -क्या होता था पहले दादाजी, जो अब नहीं होता। आप हमें अच्छे से बताओ।” पोतेे ने कहा।
“तो सुनों तुम लोग। मेरा मानना है कि दुनिया में जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है, हमारे बाद की किसी पीढ़ी को “शायद ही ” इतने बदलाव देख पाना संभव हो। हमने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखे हैं। बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है, और वर्चुअल मीटिंग सी असंभव लगने वाली बातों को सम्भव होते हुए देखा है। हमने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठकर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं हैं। ज़मीन पर बैठकर खाना खाया है। प्लेट में डाल डालकर चाय पी है।” दादाजी बोले।
“हाँ, तेरे दादाजी तो राजकपूर के जमाने के हैं, प्लेट में नहीं कुल्हड़ में भी चाय-दूध पिया है।” दादी ने बीच में टोकते हुए कहा।
“हा हा हा … हाँ, सही कहा तुमने। हमने वीडियो गेम नहीं खेला पर बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे, पेड़ पर चढ़ना, पोखर, तालाब में तैरना जैसे खेल, खेले हैं । और पता है, हमने चांदनी रात में ढिबरी, दीया, मोमबत्ती, लालटेन या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है। और हम भी शरारती थे दिन के उजाले में चादर के अंदर छिपाकर खूब नावेल भी पढ़े हैं।” दादा जी बोले।
“वो क्यों नहीं बताते कि पागलों की तरह कैसेट खरीदते थे। पता नहीं कहाँ से ग्रामोफोन और रिकॉर्ड उठा लाये थे। वीडियो कैसेट लाकर रातभर फिल्म देखते थे।” दादी बोली।
“हाँ, सही कहा। हमने अपनों के लिए अपने जज़्बात खतों में आदान प्रदान किये हैं, और उन ख़तो के पहुंचने और जवाब के वापस आने में महीनों तक इंतजार किया है।” दादा जी दादी को मुस्कुराते हुए देखा।
“हाँ, और इंतजार भी ऐसा-वैसा नहीं, कूलर, एसी या हीटर के बिना और बिजली के बिना। अक्सर अपने छोटे बालों में सरसों का ज्यादा तेल लगाकर, ताकि निठल्ले बैठने पर चपत लगे तो हाथ फिसल जाय…. हा हा हा।” दादी ने कहा।
“तो क्या टाइमपास के लिए और कुछ नहीं था?” पोती ने पूछा।
“चौपाल, वहाँ बैठकर बातें करना , हुक्का पीना, कहानियाँ सुनना, चारपाई बुनना, रस्सी बुनना जैसे काम कर के टाइमपास कर लेते थे तेरे दादाजी…. हा हा हा।” दादी बोली।
“इसे टाइम पास नहीं, हुनर कहते हैं। अपना क्यों नहीं बतातीं जो इतनी बढ़िया साड़ी गरम पानी में उबाल दी थी तुमने।” दादाजी के कहते ही दादी मुसकुराते हुए चुप हो गई थी।
“कपड़े उबालकर धोते थे ? क्या इतने गंदे हो जाते थे ?” पोती ने पूछा।
“पहले सूती और मोटे कपड़े पहनते थे। अबकी तरह नहीं था कि कपड़े उतारो और मशीन में डाल दो। रे, सोडा और साबुन ही होते थे। ये डिटर्जेंट पाउडर तो बहुत बाद में आया है। तुम टैब इस्तेमाल करते हो, हमने तख्ती, स्याही वाली दवात, खड़िया वाली दवात, सेठे, नरसल की कलम, होल्डर, फाउंटेन पैन से कॉपी किताबें, कपडे और हाथ काले-नीले किये है। स्लेट पत्थर पर काम किया है स्लेटिबत्ती से। श्यामपट्ट पर मास्टर जी से पढ़ा है,न कि तुम्हारी तरह मोबाइल पर। हमने गुरु जी से मार खाई है, और घर में शिकायत करने पर माँ-बाप से फिर मार खाई है। मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देखकर नुक्कड़ से भागकर घर आ जाया करते थे। और समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे। अपनों के साथ-साथ दूसरों से भी डरकर कोई गालत काम नहीं करते थे।” दादा जी बोले।
“ये तो अत्याचार हो गया बचपन में। तब क्या चाइल्ड राइट्स नहीं होते थे?” पोते ने पूछा।
“हा हा हा …..तब चाइल्ड राइट नहीं, राइट चाइल्ड होते थे। जब प्यार करते हैं तो बेटा, कुछ मांगना ही नहीं पड़ता है। कानून तो प्यार कमी को जबरन पूरा करने के लिए बनाए गए हैं।” दादा जी बोले।
“पता है तुम्हारे दादाजी हमारे गाँव जब आए थे तो अपने केनवास शूज को रोज खड़िया से पोतकर इठलाते फिरते थे। रंग काला और जूते सफ़ेद …..हा हा हा।” और दादी ज़ोर से हँसने लगी।
“हाँ, और तुम्हारी अम्मा ने गुड़ की चाय पिलाकर हमको पटाया था तुमसे शादी के लिए। और अगले दिन सुबह-सुबह काला या लाल दंत मंजन दिया था। पर मुझे तो नमक, लकड़ी के कोयले और सरसों के तेल या नीम की दातुन पसंद थे। एक रेडियो तक नहीं था तुम्हारे घर जो चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसा कुछ सुन सकता।” दादाजी बोले।
“तुम्हारे यहाँ तो था न, जो बटन घुमाने पर करंट मारता था और मुआ हर दो महीने बाद ट्यूब बदलवाने की मांग करता था। बेकार लोगों का जमघट घर में लगवाता था, और उनके खाने के लिए मुझपर हुकुम चलता था सबका ….बहू! जरा चाय बना दे ….बहू! दो लोगों को खाना परोस दे।” दादी मुँह बनाते हुए बोली।
“हाँ, और यहीं पर तो मौका मिला था तुम्हें शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव करने और सफ़ेद चादरें बिछा कर सोने का और वो भी फिलिप्स के स्टैंड वाले पंखे में और तुम सुबह सूरज निकलने के बाद भी ढीठ बनी सोना चाहती थीं ?” दादाजी मुस्कुराते हुए बोले।
“हाँ जी, अब तो डब्बों जैसे कमरों में कूलर, एसी के सामने रात होती है, दिन गुज़रते हैं। कैदी की तरह अलग-आलग पड़े अपनी सजा काट रहे हों जैसे।” दादी बोली।
“अरे दादी ! तुम दादा जी झगड़ना बंद करो। अब हमारा टाइम तो एजुकेशन का है, मॉडर्न टाइम है। ऐसा नहीं होता।” बड़ा पोता बोला।
“भले मॉडर्न हो पर वो खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास बांटने वाले लोग लगातार कम होते जा रहे हैं। अब तो लोग जितना पढ़-लिख रहे हैं, उतना ही खुदगर्ज़ी, बेमुरव्वती, अनिश्चितता, अकेलेपन, व निराशा में खोते जा रहे हैं। बच्चो ! हमने रिश्तों की मिठास महसूस की है…!! और तुम्हारे लिए वो सब “अविश्वसनीय सा” लगने वाला है जो ज़िंदगी का नजारा हमने देखा है। और आज इस कोरोना काल में परिवारिक लोगों को एक-दूसरे को छूने से डरते हुए भी देखा है। अपनों की, रिश्तेदारों की तो बात ही क्या करें, खुद आदमी को अपने ही हाथ से अपनी ही नाक और मुँह को छूने से डरते हुए भी देखा है।”
सासु माँ के ऐसा कहते ही बहुओं को जैसे अपनी वो बात याद आ गई थी जब उन्होने बच्चों को संक्रामण से बचाने के लिए दादा-दादी से दूरी बनाकर रखने को कहा था, कोरोना की हवा से फैलाने की बात को सुनकर।
“सही कह रही हो तुम, कहाँ तो एक जमाना था कि गाँव के गाँव इकट्ठे हो जाते थे किसी की चिता पर लकड़ी और उपले लाकर, और एक ये समय है कि अर्थी को बिना चार कंधों के श्मशान घाट पर ले जाते हैं, नदी में बिना संस्कार बहा रहे हैं। मजबूरी में जलाने की जगह गाड़ रहे हैं। पार्थिव शरीर को दूर से ही अग्नि दाग लगा रहे हैं। हम भले पिछड़े थे, अशिक्षित थे, कम पढे लिखे थे पर प्रकृति के साथ थे। इंसानियत के साथ थे। जमाखोरी, मुनाफाखोरी, चोरबाजरी से दूर थे। हर किसी से ताऊ,चाचा, मामा, दादा का रिश्ता बना लेते थे। अपने माँ-बाप की बात भी मानी और अब बच्चों की भी मान रहे हैं। वाकई बहुत कुछ बदल गया है।” दद जी बोले।
“और बाबूजी! आप वो बातें बताना ही भूल गए जब शादी में बुफ़े (buffet) खाने नहीं होते थे, पंगत होती थी और सब्जी देने वाले को गाइड करते थे बैठे-बैठे कि हिला के दे या तरी तरी दे। इशारा करके लड्डू, गुलाब जामुन, काजू कतली मांगते थे, छाँट-छाँट के गरम-गरम पूड़ी लेते थे। और वो लोग भी जानबूजकर ज्यादा लड्डू खिलाने के लिए बार-बार रायता सकोरे में भर देते थे।” बड़ा बेटा भी चर्चा में शामिल होते हुए बोला।
“हाँ, शादी वाले घर में महीनों पहले से रौनक शुरू हो जाती थी। घरों को गोबर-मिट्टी-तूड़ी से लीपना। फिर चूना लगाकर, गेरू से चित्र बनाना। स्वांग मंडलियों को बुलाना। सबका मिलकर खाना बनाना, गीत गाना। हर त्योहार पर अपने रूठों को मनाना, पूरे गाँव का एक परिवार बन जाना …. ये तुम्हारा मॉडर्न होना, बहुत कुछ लील गया बेटा। और सबसे ज्यादा कुछ लीला है तो बचपन और इज्जत। आज आदमी को मशीन बनाने पर लगे हैं….ज्यादा नंबरों की होड है…. ज्यादा प्यार और अपनेपन की नहीं।” बाबू जी कहते-कहते भावुक हो गए थे।
“आप सिखाओगे तभी तो सीखेंगे बच्चे। मैंने मिट्टी कूट दी है। अब आप गमलों में बीज बो दो।” छोटा बेटा बोला।
“अरे ! गोबर का खाद भी मिलाया है न, नहीं तो बीज ही खराब हो जाएँगे। और आज मैं नहीं बौऊँगा बीज, इस नई पीढ़ी को ये काम करने दो। मिट्टी और धरती से दूर होने के कारण आदमी परेशान है, और हमेशा रहेगा। जो मिट्टी हम सबकी माँ है, उससे दूर राहकर भला औलाद कैसे खुश हाल हो सकती है? प्रकृति से जुड़ो और जोड़ो …. यही वक्त की जरूरत है। अगर किसान भी ऐसा ही सोच ले तो क्या तुम्हारी मशीन, ये कंप्यूटर, अन्न और सब्जियाँ पैदा कर सकते हैं? क्या इन मोबाइल में खाने की फोटो देखकर तुम्हारी भूख मिट सकती है ? मैं किसान था, पढ़ने के बाद भी मैंने मिट्टी से नाता नहीं तोड़ा। हमने पेड़ लगाए तो आज बच्चे हवा का आनंद ले रहे हैं। जब ये पेड़ पौधे लगाएंगे तो नई नस्ल इन का फ़ायदा लेगी। प्रकृति ही साक्षात भगवान है ….नियंता है जीवन की । सबको जीवन और जीने का तरीका सीखना ही होगा।” दादाजी बोले।
“सही कहा आपने। बच्चे ही इनकी देखभाल करेंगे, ये ही रोज इन्हें पानी देंगे। और दो थानेदारनियाँ इनको वाच करेंगी।” बड़ा बेटा बोला।
“और आप लोगों की क्या ज़िम्मेदारी है ?” बहू ने हँसते हुए कहा।
“मेरी और छोटे की जिम्मेदारी है बाबूजी और अम्मा के पैर दबाना, गृहस्थी पर शासन के रूल सीखना ताकि तुम सबको वश में रखा जा सके ….हा हा हा।” बेटा बोला।
“और हम अम्मा जी के पैर दबाकर सीखेंगे कि कैसे मालिकों से काम निकलवाना है। सिखाओगी न अम्मा जी?” बहू बोली।
“बेटा! जब प्यार हो जाता है तो मालिक नहीं मजदूर बनकर आनंद आता है। गृहस्थी तो हल का जुआ है जीवन का खेत जोतने के लिए। इसलिए दोनों ही बराबर हैं, मिलकर चालते हैं तो किस्मत की जमीन कैसी भी सख्त हो, प्यार की फसल हमेशा अच्छी होती है।” सासु माँ बोली।
“सब बातें ही करते रहेंगे या कोई सिखाएगा भी कि पौधे कैसे उगाने हैं।” तीनों बच्चे ज़ोर से बोल पड़े।
“आ जाओ, और अपने-अपने बीज बो दो । पानी डाल दो, मगर रोज बीज निकालकर मत देखना कि पौधा बना या नहीं । सब्र से पानी डालते रहना थोड़ा-थोड़ा। ज्यादा पानी डाले तो बीज गल जाएँगे। बचपने से ही सीखना शुरू करते हैं तो फिर सब याद रहता है। जैसे मुझे याद है।” दादाजी ने कहा और सब उठकर गमलों के पास आ गए बच्चों को सिखाने के लिए।

