एक वायरस से हारता विश्व
( शालिनी श्रीवास्तव )
संपूर्ण विश्व कोरोना जैसे महामारी की चपेट में है। विश्व के अपने -अपने क्षेत्र में लॉकडाउन से आर्थिक मंदी के साथ ही रोज़मर्रा के कार्य सौ फ़ीसदी प्रभावित हुए है । जिसका असर न सिर्फ़ हाशिये पर खड़े व्यक्ति बल्कि पूरी पृथ्वी पर दृष्टिगोचर हो रहा है । हालांकि हमसब इस समस्या का जल्द ही निपटान कर लेंगे,परन्तु इससे कुछ सबक भविष्य के लिए सिख लेना आवश्यक होगा ।
आज मनुष्य ने सारी सीमाएं लाँघ कर प्रगति का रास्ता चुना है । औधोगिकरण के इस युग ने यह भुला दिया कि इस आर्थिक विकास का अंत कहाँ और कैसे होगा ? आज पूरा विश्व कई मामलों में सशक्त हो चूका है । आमतौर पर आज ना तो कही आकाल ,भुखमरी जैसी भयावह स्थिति का भय है और ना ही तीसरे विश्व युद्ध की आशंका ही है । यह सांत्वना और संतोष का भाव बस इसलिए है कि आज हम समावेशी विश्व विकास की अवधारणा के साथ ही सम्पूर्ण विश्व में शांति और सुरक्षा के लिये प्रतिबद्ध होकर कार्य कर रहे है और इसके लिए कई वैश्विक संस्थाएं खड़ी है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साझा विकास ,शांति और सुरक्षा को सुनिश्चित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान निभा रही है । साथ ही मानवीय मूल्यों और मानवतावाद को बनाये रखने के लिए भी प्रयासरत है। विश्व में कही भी युद्ध या आतंरिक अथवा बाह्य अशांति का माहौल हो या फिर बीमारी या भुखमरी जैसे हालात हो तब यह संस्थाएं तुरंत राहत और बचाव करने पहुँच जाती है जिसमें विश्व के लगभग सभी देश अपनी सहभागिता निभाते है । एक तरफ किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और विश्व साथ खड़ा दिखता है जैसे आतंकवाद जैसे मुद्दों के लिए। वही कोरोना जैसी महामारी के लिए अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं सील की जा चूँकि है । ग्लोबल चेन की इस श्रृंखला को तोड़ने में एक वायरस की जीत होती दिख रही है । एक तरफ अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव के लिए संपूर्ण विश्व अंतरार्ष्ट्रीय नैतिकता का पालन करते दिख रहे है वही दूसरी तरफ विश्व महाशक्ति बनने की होड़ में सभी अपनी सैन्य ताकत में इजाफा कर रहे है,मिसाइलों के परीक्षण की लाइन लगी है , एक दूसरे से आधुनिकतम हथियारों का ज़खीरा खरीदने के लिए सभी संधियों का उल्लंघन किया जा रहा है । यहाँ तक कि अब वर्चश्व की लड़ाई में ट्रेड वार भी होने लगा है ।
अभी तक व्यापार सारी दुश्मनी को दरकिनार कर अधिकतम लाभ कमाने का साधन था परंतु अब यह भी प्रतिद्वंदात्मक लड़ाई में अपनी भूमिका निभाने लगा है । हथियारों के अलावा नित् नए नए उपाए खोजें जा रहे है जिससे संपूर्ण विश्व का विनाश किया जा सके । बायो विपेन्स , कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अनुचित इस्तेमाल ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि एक देश दूसरे देश को ना सिर्फ पछाड़ना चाहता है बल्कि उसका समूल नाश करने को प्रतिबद्ध है । नैतिकता और मानवता को दरकिनार कर जिस तरह के वार गेम में सारे विश्व लगे हुए है उससे मानव जाति का विनाश निश्चित लगता है।
आतंकवाद ,वैश्विक मंदी और अन्य प्राकृतिक विपदाओ से तो निकला भी जा सकता है मगर वायरसजनित बीमारियों से निकलना कितना मुश्किल है आज पूरा विश्व देख रहा है ।हम उससे लड़ रहे है जिसे हम नंगी आँखों से देख भी नहीं सकते । प्रकृति से अत्यधिक छेड़छाड़ और विकासवाद वैसे ही नित नए समस्याओं को जन्म देगा,जिससे पृथ्वी से मानवजाति का विनाश होने लगेगा ,हमे इसके लिए बॉर्डर पर अत्याधुनिक हथियारों या मिसाइलों की जरुरत ही नहीं पड़ेगी । रही सही आबादी को आतंकवाद निगल लेगा ।
जिसतरह से ट्रम्प पेरिस समझौते से निकले और पर्यावरण की अनदेखी की है वैसा ही अन्य राष्ट्र भी विकास के नाम पर कर रहे है । प्रकृति की अवहेलना कर हम सबआने वाले खतरों से अनभिज्ञ है । हम ये भूल गए है कि प्रकृति के आगे मानव शून्य है । अगर हम अब भी प्रकृति को संतुलित ना कर पाए तो कोरोना से कही अधिक विपदाएँ झेलने को विवश होंगे ।
(शालिनी श्रीवास्तव स्वतंत्र लेखिका हैं)

