आस्था

इतिहास की गौरवमयी गाथा समेटे हुए है 51 शक्ति पीठों में एक प्रमुख पीठ है मां कष्टहरणी देवी का मंदिर

(गाजीपुर से विकास राय)

गाजीपुर। जनपद के मुहम्मदाबाद से चितबड़ागांव मार्ग पर करीमुद्दीनपुर थाने के समीप मां कष्टटहरणी देवी का धाम इतिहास के साथ-साथ आस्था, श्रद्धा व विश्वास से सरोबोर अपनी पहचान बनाये हुए है। सदैव अपनें भक्तों के कष्टों को हरने वाली देवी मां का नाम है मां कष्टहरणी। जिन्हें दया की सागर, ममतामयी, करूणामयी आदि रुपों की देवी भी कहा जाता है।
इक्यावन शक्ति पीठों मे से एक प्रमुख पीठ मां दुर्गा का एक दिव्य स्वरूप है मां कष्टहरणी ,जो पल भर में अपने भक्तों के दैहिक दैविक एवं भौतिक सारे ताप व संताप को हर लेती है। अपने दरबार में पंहुचे भक्तों की सारी मनोकामनायें एवं मुरादे पूर्ण ही नहीं करती बल्कि भक्तों के सभी रोग शोक दु:ख का शमन करके धन धान्य एवं आरोग्यता प्रदान करती हैं।
मां कष्टहरणी के पवित्र धाम की युगो-युगो से करीमुद्दीनपुर मे बिराजमान है। धाम के इतिहास में जाने पर इस स्थान को युगो पूर्व दारूक बन के नाम से जाना जाता था। जिस बन मे शेर बाघ जैसे हिंसक जीव विचरण किया करते थे। मां के स्थान के बगल में बघउत बरम बाबा का स्थान है। जनश्रृतियों के अनुसार बाघ से लड़ाई के दौरान उनकी मृत्यु हो गयी थी तभी से आप बघउत बरम बाबा के नाम से यहां पर बिराजमान है। मां कष्टहरणी के यहां इस स्थान पर त्रेतायुग एवं द्वापर युग मे बिराजमान होने का प्रमाण मिलता है। आप की चमत्कारिक शक्तियों से जो भी मां की शरण मे आकर पवित्र मन से प्रार्थना किया मां ने उसका सदैव कल्याण व मंगल किया। मां के दरबार में सच्चे एवं पवित्र मन से की गयी आराधना कभी खाली नहीं जाती। इतिहास के आइने से कहा जाता है कि त्रेतायुग में भगवान राम, लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ अयोध्या से सिद्धाश्रम बक्सर जाते समय यहां पर रूक कर मां कष्टहरणी का दर्शन पूजन किये थे। उसके पश्चात कामेश्वर नाथ धाम कारो जो बलिया एवं गाजीपुर के सीमा पर स्थित है वहां पहुंचने का प्रमाण है। आपने कामेश्वर नाथ धाम मे दर्शन पूजन कर रात्रि विश्राम किया तथा सुबह सभी भगवान गंगा पार कर बक्सर बिहार स्थित सिद्धाश्रम पहुंचे थे,यह कामेश्वर नाथ धाम वही स्थान है जहां समाधिस्थ शिव को जगाने में कामदेव भष्म हो गया था। त्रेता युग में अयोध्या नरेश महाराज दशरथ अयोध्या से शिकार खेलते खेलते गाजीपुर जनपद के महाहर धाम तक आ गये थे। वहीं पर राजा दशरथ के शब्दभेदी बाण से श्रवण कुमार की मृत्यु हो गयी थी। आज भी उस स्थान पर श्रवण डीह नामक स्थान बिराजमान है। भगवान राम के साथ बक्सर जाते समय लक्ष्मण जी ने बाराचवर ब्लाक के उत्तर दिशा में रसड़ा के लखनेश्वरडीह नामक स्थान पर लखनेश्वर महादेव की स्थापना की थी जो आज भी लखनेश्वर नाथ के नाम से जाना जाता है। अब आपको ले चलते है द्वापर में जब धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों, द्रोपदी एवं कुल गुरू धौम्य ॠषी के साथ अज्ञातवास के समय मां कष्टहरणी धाम में आकर मां से अपने कष्टों को दूर करने के लिये प्रार्थना किये थे। मां के आशीर्वाद से महाभारत के युद्ध में पांडवों की विजय हुई। जैसा मां का नाम है उसी के अनुरूप आप वास्तव में अपनें भक्तों का कष्ट दूर करती हैं। राजसूय यज्ञ के समय भीम हस्तिनापुर से गोरखपुर श्री गोरखनाथ जी को निमंत्रण देने जाते समय भी मां कष्टहरणी का दर्शन पूजन किये थे। कलयुग में बाबा कीनाराम जी को स्वयं मां कष्टहरणी ने अपने हाथ से प्रसाद प्रदान कर सिद्धियां प्रदान की थी, बाबा कीनाराम कारों से रोजाना अपने गुरू जी के सो जाने के पश्चात मां के पास आ जाते थे और गुरू जी के जागने से पहले वापस कारो पहुंच जाते थे। एक दिन गुरू जी ने कीनाराम जी से पूछ दिया तो कीनाराम जी ने सच सच बता दिया की मै मां कष्टहरणी की सेवा में चला जाता हूं। गुरू जी ने कीनाराम जी को जाने से तो नहीं रोका लेकिन हिदायत दिया था की वहां का कुछ भी खाना नहीं। एक दिन स्वयं मां ने अपने हाथ से कीनाराम जी को प्रकट होकर प्रसाद देकर सिद्धी प्रदान की। गुरू जी के द्वारा यह जानने पर खुद उन्होेनें कीनाराम जी को कहा की जाओ अब तुम्हारे में वह सभी योग्यता हो गयी है अब समाज का कल्याण करो। वहां से बाबा वाराणसी के गंगा तट पर पहुंचे तथा एक गंगा में बहते शव को देख कर बोले की तुम कहां जा रहे हो। बाबा कीनाराम जी की आवाज सुनकर वह मुर्दा उठ खड़ा हुआ। बाबा कीनाराम ने उसका नाम जियावन रखा। मां के आशिर्वाद से बाबा कीनाराम जी का यह पहला चमत्कार था।मां के धाम में गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक, ह्वेन सांग, फाह्यान, स्वामी विवेकानन्द, सहजानन्द सरस्वती, मंडन मिश्र जैसे अनेक लोगों ने इस मार्ग से जाते समय यहां रूक कर मां का दर्शन पूजन किया है। ह्वेन सांग एवं फाह्यान ने यहां का वर्णन अपने यात्रा वृतांत में किया है, मां के धाम में आश्विन एवं चैत्र नवरात्र में मातायें दूर दर से आकर अपने परिवार की सुख समृद्धी एवं सलामती के लिये मां कष्टहरणी के चरणों में चौबिस घंटे तक अखंड दीपक जलाती है। भक्त रात को मां की चरणों मे गीत एवं नृत्य करती है। पूर्वांचल ही नहीं पूरेे उत्तर प्रदेश मे मां के पुराने स्थानों में से एक प्रमुख स्थान है। जितना अखण्ड दीपक मां कष्टहरणी के धाम में जलाया जाता है शायद पूरे भारत में और कहीं देखने को नहीं मिलेगा, सोमवार को लगभग ग्यारह हजार की संख्या में अखंड दीपक जलाये गये। देश के कोने कोने से लोग आकर मां का दर्शन पूजन करते है, वर्ष भर मां के धाम में शादी मुंडन किर्तन एवं रामायण का आयोजन होता रहता है। मां के दर्शन मात्र से ही मानव का कल्याण हो जाता है। वैसे तो हर साल रामनवमी के दिन मां के धाम पर बिराट मेले का आयोजन किया जाता रहा है, लेेेकिन इस बार लाक डाउन के चलते अभी कुुछ कहा नहीं जा सकता है। मां के मन्दिर के निर्माण में स्व. लाल बाबा का सराहनीय सहयोग रहा है। पुजारी के रूप में लम्बे समय से हरिद्वार पांण्डेय सेवा कर रहे थे लेकिन अब उनके पुत्र राजेश पाण्डेय पुजारी के रूप में एवं किशुनदेव उपाध्याय, महेश्वर पाण्डेय मां की सेवा में लगे है।

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