रचनाकार

हमारा तुम्हारा

( प्रज्ञा पांडेय )

खुद को बेतरतीब कर जिस घर को संवारा है,
उस घर पर अधिकार तुम्हारा है।

खुद के रक्त से नौ महीने जिसे कोख में पाला है,
उस बच्चे के साथ भी जुड़ा नाम तुम्हारा है।

देह हमारी पर सब सौभाग्य श्रृंगार तुम्हारा है,
तुम्हारे नाम से ही वाबस्ता वजूद हमारा है।

पूजा पाठ व्रत उपवास हमारा है,
उसका पुण्य फल सब तुम्हारा है।

अश्लील इशारे , फिक्रे तुम कसते ,
पर चरित्र खराब हमारा है।

हर सफलता के तुम ही हो इकलौते हकदार,
और तुम्हारी हर नाकामी के पीछे दुर्भाग्य हमारा है।

( लेखिका वापी गुजरात की रहने वाली हैं )
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