खास-मेहमान

शब्द मसीहा : अनाम रिश्ता

(शब्द मसीहा केदार नाथ)

अपने बड़े और आलीशान घर में वह अकेली बैठी अपने जीवन के विषय में सोचती है और खो जाती है । मयंक में कितनी आत्मीयता थी , कितनी इंसानियत थी । पक्षियों से बतियाना …बेवजह गाना ….किसी को भी दोस्त कहकर मुस्कुराना….ऐसा ही था मयंक ।

अक्सर घर में , बाग में आ जाता । बाबा कहते थे कि छोट जात का है , ज्यादा मुँह मत लगाया करो ।

वह अपनी जात को देख नहीं पाती थी कि उसकी जात कितनी बड़ी है , अलबत्ता वह मयंक के सामने खुद को बहुत छोटा महसूस करती थी । मयंक ने पढ़ाई करने के बाद खेती को ही तरजीह दी थी । गाँव की चौपाल के पास पेड़ के नीचे वह बच्चों को पढ़ाता था । गाँव में पंचायती जमीन को पार्क बना दिया था उसने । नए दौर की हवा ने उसे छूया भी नहीं था ।

मृगा का ब्याह बड़े धूमधाम से ठाकुर जगत नारायण के यहाँ हुआ था । समय ने ऐसा फेर खाया कि सास-ससुर दोनों एक एक्सीडेंट का शिकार हो गए और ननद ब्याहकर अपने घर चली गई । पति का काम ऐसा था कि घर में कम ही रहना होता था । माँ-बाप कभी-कभी आते मिलने को । मृगा पलकें भिगो कर रह जाती । इस बार जब आए थे तब माँ ने ही बताया था कि मयंक ने स्कूल पक्का बनवा लिया है । गाँव के बूढ़े लोगों को भी पढ़ाता है और खेती की नयी-नयी बातें सिखाता है । अब तो कई गाँव के लोग उसके साथ हैं । सरकार ने उसे ईनाम दे रही है ।

“कुछ भी हो माँ …. रहेगा तो छोट जात का ही ।” मृगा ने कहा था।

“हाँ, अब सरकार ईनाम दे के जात तो बादल नहीं सकती ।” माँ ने मुरझाए स्वर में कहा ।

“माँ ! अगर हम ठाकुर साहब से इजाजत लेकर उसका हाथ बंटाएँ तो आपको कोई ऐतराज तो नहीं होगा ?” मृगा ने अपने मन की बात कह ही दी ।

“अगर ठाकुर साहब को ऐतराज नहीं तो हम कौन होते हैं ? हमने तुम्हें ब्याह दिया हमारा फर्ज़ पूरा हुआ ।” माँ ने अपनी बात कह दी ।

ठाकुर साहब से मृगा ने अपने मन की बात कही।

“मृगा ! आप हमारी पत्नी हैं , इस घर की शान हैं । अगर आपको खुशी मिलती है तो हमें ऐतराज नहीं । सच कहें तो आपको हमने यहाँ कैद कर दिया है । अपने दोस्त का हाथ बँटाना हम बुरा नहीं समझते और अपने दोस्त को यहाँ बुलवाओ , ताकि हम भी उसे अपनी जमीन का कुछ हिस्सा देकर यहाँ स्कूल बनवा सकें ।” ठाकुर साहब ने कहा ।

“आप सच कह रहे हैं ?” मृगा ने आश्चर्य से पूछा ।

“हाँ, हम जानते हैं मयंक के विषय में , बहुत नेक इंसान है । अखबार में भी चर्चा है उसकी ।”

“पर ठाकुर साहब ! नेक होने से जात तो नहीं बदलती ?”

“हा हा हा …. आज हम उसकी जात भी बदल देंगे । उसके साथ आज हम खाना खाएँगे । आज हम गले लगाएंगे । अपने पूर्वजों के पाप हमें ही धोने होंगे । हम चाहते हैं कि आज आप रसोई में उनकी पसंद का खाना बनवाएँ ।” ठाकुर ने कहा ।

मृगा की उदासी का आवरण जैसे इस एक वाक्य ने उड़ा दिया था । मृगा ने ठाकुर को बाहों में भर लिया ।

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