रचनाकार

विश्व साड़ी दिवस विशेष : अमूमन एक लड़की के जीवन में साड़ी की शुरुवात स्कूल की “फेयर वेल” पार्टी से होती है

( मधु )

मुझे आज ही पता चला कि आज का दिन “विश्व साड़ी दिवस” के रूप में मनाया जाता है । अमूमन एक लड़की के जीवन में साड़ी की शुरुवात स्कूल की “फेयर वेल” पार्टी से होती है। स्कूल के आखरी दिन साड़ी का उड़ता आँचल लहराते हुए सभी क्लासमेट्स के बीच छा जाने की चाहत में महीनों पहले से मम्मी की अलमारी, भाभी या चाची की कलेक्शन में से साड़ियाँ खंगाली जाती है । बड़ी मशक्कत से पसंद की साड़ी और उस मांगे हुए ब्लाउज़ की ऑल्टरेशन, मैचिंग की चूड़ियाँ जैसी ताम झाम की अति व्यस्तता के बीच फेयरवेल के चंद दिनों बाद होने वाले बारहवी बोर्ड के एक्जाम तक की याद न रहती। पहली बार लपेटी हुई साड़ी जाने कैसे ढीली ढीली और कदमों के आगे दब दब जाती है। किसी अनुभवी की मदद से अनगिनत पिन लगाकर पहनाई गयी साड़ी घर के बड़ो के सामने आने पर लज्जाजनक असहज भाव लाती है। सबसे ज्यादा शर्मनाक साड़ी में अपने पिता और भाइयों का सामना करना होता है।

खुद को चाहे साड़ी पहननी नही आती थी लेकिन लगातार पहनाने वाले को एक्सपर्ट सुझाव दिए जाते, पल्ला लम्बा कर दीजिये न थोड़ा, नीचे कितनी चुन्नट आयी, सैंडिल की हिल साड़ी में छिपनी चाहिए। एक आदमकद आईने में घूम घूमकर संतुष्ट हो होते। प्रायः किसी निर्धारित सहेली के घर सबका मिलना तय होता था। यहाँ से ये "साड़ी सेना" स्कूल के लिए कूच करने वाली थी। सभी की शर्त होती कि साड़ी पहनकर स्कूटी नही चलाना है। कोई हमें स्कूल छोड़ दे ।मानो सड़क में पूरा शहर साड़ी पहनी लड़की को देखने उमड़ने वाला है। स्कूल के आखरी दिन साड़ी पहनने का रोमांच भी होता लेकिन स्कूल से बाहर कोई हमें साड़ी में देखे न इस बात का एहतियात भी। खैर सेमीनार हाल में  सभी आत्ममुग्धाए पल्ला लहराती अपनी अपनी सीट पर बैठ जाती। 24 घंटे पहले तक स्कूल कारीडोर में छोटी छोटी स्कर्ट में घूमती किशोर लडकियां यकायक साड़ी में तरुणी नजर आने लगती।

स्कूल के आखरी दिन से शुरू हुआ साड़ी का सफर फिर तो आगे चलकर सरस्वती पूजा, भैय्या की शादी, बीएड की साड़ी, इंटरव्यू की साड़ी, सहेली की सगाई के पड़ाव तय करता  बढ़ने लगता है। लडकियां अपनी शादी के समय भी साड़ियों की खरीददारी बड़े चांव से करती है। कोई भी स्त्री शादी-ब्याह, व्रत -त्यौहार  किसी भी समारोह में साड़ी पहन कर ही व्यक्तित्व की उच्चतम भव्यता को प्राप्त करती है। सोचिये साड़ी न होती तो कितने गीत न बन पाते "हुजूर इस कदर न इतरा के चलिए सरे आम आँचल न लहरा के चलिए" , "छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा", "पल्लू लटके जी मारो पल्लू लटके" , "माँ तेरे आँचल में छिप जाना है"  से लेकर "साड़ी के फाल सा तुझे मैच किया रे"। कभी  साड़ी का आँचल फैला फ़रियाद  माँगती  है, कभी सर पर आँचल रख सम्मान देती है, कभी पल्लू  दाँतो में दबा लाज की सुर्खियां बिखेरती है, कभी तैश में आ पल्लू कमर में कस कर खोचती है, कभी वात्सल्य में डूबी मीठी किलकारियों को आँचल में समेटती है, कभी चाभियों का गुच्छा छोर में बांध आधिपत्य का ठाठ दिखाती है। हमारे यहाँ प्रचलित कई सामजिक तंज भी साड़ी के इर्द गिर्द लिपटे हुए है जैसे.... माँ के आँचल से बाहर न निकला, जोरू के पल्लू से बँधा हुआ है। 

                                                      बॉलीवुड फिल्मों के एक्शन दृश्यों के क्लाइमेक्स  में नायिका को ख़ास तौर पर साड़ी पहनाई जाती थी। हीरो की चोट से बहते लहू का प्राथमिक उपचार तो साड़ी के पल्लू को फाड़ कर ही न किया जाता है ??😂😂😂 जब तक नायिका बर्फीली वादियों में शिफॉन की साड़ी लहरा कर गीत न गाए यश चोपड़ा की फिल्मों का प्रेम अधूरा है । अलग अलग क्षेत्र की साड़ियों की डिज़ाइन, कपडे की विशेषता, धागों की बुनावट और बाँधने के भिन्न भिन्न तरीको की वज़ह से ये और भी लुभावनी हो जाती है। बनारसी साड़ी, तांत की साड़ी, कोटा चेक, मुलमुल, चंदेरी, संबलपुरी साड़ी, ओड़िसा प्रिंट, बंगाली तांत, कांजीवरम, मधुबनी,  मणिपुरी, पटोला, बंधेज की गुजराती साड़ी, कोसा साड़ी, सिल्क साड़ी और हरदिल अजीज रेशमी शिफान ।कोई भी समारोह हो महिलाओं की तैयारी और साड़ी का चुनाव महीने भर पहले से शुरू हो जाता है। मैचिंग के ब्लाउज़ से लेकर चूड़ियाँ तक। अन्य परिधानों के फैशन आते जाते रहेंगे लेकिन साड़ी की गरिमा कभी भी "आउट ऑफ ट्रेंड" नही हो पाएगी। व्यस्त दिनचर्या में सहूलियत को प्राथमिकता देते हुए हम पारम्परिक भारतीय परिधान "साड़ी" से थोड़ा दूर होते जा रहे है लेकिन आज भी पसंद के पैमाने में "साड़ी" ही महिलाओं की सर्वाधिक प्रिय भारतीय परिधान बनी हुई है। वैश्विक सर्वे में महिला परिधानों की खूबसूरती में भारतीय साड़ी को दुनिया का सबसे खूबसूरत परिधान माना गया है।

अपनी 5 मीटर की लंबाई की वज़ह से थोड़ी कम सुविधाजनक होने के बावज़ूद आज़ भी भारतीय साड़ी फैशन और स्टाइल के शीर्ष पर बैठी नज़ाकत से इठलाती उड़ा रही है । पूजा पाठ , शादी -ब्याह , व्रत त्यौहार ऐसे सुअवसर है जो साड़ी के साथ ही सुहाने लगते है। साड़ी की महत्ता को एक पायदान और ऊपर चढ़ाने लिए ही साल में एक दिन विश्व साड़ी दिवस के रूप में निर्धारित किया गया है।

(“मधु” फिल्म राइटर एसोसिएशन मुंबई में लेखिका हैं)

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One thought on “विश्व साड़ी दिवस विशेष : अमूमन एक लड़की के जीवन में साड़ी की शुरुवात स्कूल की “फेयर वेल” पार्टी से होती है

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