रचनाकार

यह धर्म-अधर्म का युध्द नहीं, जीवित रहने का युध्द है

( मनीष गंगा )

जैसे महाभारत या रामायण का युद्ध लड़ा जा रहा हो और तुम पांडव या राम की सेना के साथ हो। भले ही कृष्ण या राम तुम्हारे साथ हो, पर मत भूलो कि सामने भीष्म, कर्ण, द्रोणाचार्य औऱ रावण होंगे। ये लड़ाई भी वैसी ही हैं जैसी वो थी। परन्तु यहाँ धर्म-अधर्म पर युद्ध नहीं हैं जीवित रहने का युद्ध हैं। यहाँ शत्रु अदृश्य हैं। जैसे मेघनाद था। लक्ष्मण से युद्ध करते वक़्त। आक्रमण तो चारो औऱ से हो सकता हैं, पर इस युद्ध मैं तुम अपने धर्म के रक्षक हो, अपने परिवार के रक्षक हो। सो चारो और के आक्रमण का डटकर सामना करो। अपना कवच अपने साथ रखो क्योंकि अदृश्य शत्रु के आक्रमण भी अदृश्य होते हैं और कोई शंका नहीं की युद्ध में जीत किसकी होगी क्योंकि शत्रु त्रिलोक विजेता राणव जैसे की भी युध्द में हार हुई थी। तुम सत्य की राह पर हो चलो और जो सत्य की राह पर होता हैं उसकी जीत निश्चित हैं। इस युद्ध के अंत में जो इतिहास लिखा जाएगा उसके सहभागी हम भी बनेंगे और बड़े गर्व से अपनी जीत की कहानी लिखेंगे।

लेखक-
मनीष गंगा, इंदौर
M.no 8878940271

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