रचनाकार

डॉक्टर बनाम भगवान

( नीलम रानी गुप्ता )

एक खबर फिर से आई,
एक डॉक्टर की हुई पिटाई।
फिर एक डॉक्टर और पिटा,
ये कैसी है घनघोर घटा?

यही बस उनका दोष था,
कि जनता में रोष था।
ये वो जां ना बचा सका,
क्योंकि ये भगवान ना था।।

मृत्यु जीवन का सार है,
जिंदगी केे पार है।
नहीं किसी के हाथ है,
और शर्मसार है।।

देखो कलयुग की कैसी ये,
तूफ़ां आँधी आयी है।
जान बचाने वाले की ही,
इज्जत भी ना बच पाई है।।

जब देखो पीटे जाते हैं,
और देखो,पिट जाते हैं।
क्योंकि औरों जैसे इनके,
नहीं हाथों में हथियार है।।

ये छोटी कैंची, चाकू लेकर,
रणभूमि में आते हैं।
भेद ना कर कोई बीमारों से,
मृत्यु से लड़ जाते हैं।।

एक तरह से ईश्वर को ये,
खुली चुनौती देते हैं।
फिर भी लोग नहीं समझते,
कैसे जीत ये सकते हैं?

एक तुम्हारी जान की खातिर,
एक उससे मौका लेते हैं।
और विडम्बना कि तुम्हारे,
हाथों ही पिट जाते हैं।।

एक बहाना बनकर आती,
मृत्यु लीला को समझो।
कुछ तो लाज शर्म करो और,
इनको अब बख्श तुम दो।।

एक बार नहीं बार-बार ये,
बात सदा दोहराई है।
ये भी इंसां हम जैसे हैं,
नहीं खुदा, कसाई हैं।।

पहले भी लिखा है मैंने,
आज मैं फिर से लिख रही।
आज अगर मैं जीवित हूँ तो,
ये है महिमा एक डॉक्टर की।।

ये तपस्वी,योगी,साधक,
ये समझ लो तुम जल्दी।
वर्ना पछताओगे ऐसे कि,
मांगोगे जीवन मुक्ति।।

ये खुशी, ख्वाब अपनों से सींचे,
तुम्हारे जीवन की माटी।
अपने जीवन से लिखते ये,
हमारी जीवन परिपाटी।।

नहीं समझते डॉक्टरी तो,
इतना ही समझ लेते।
आज हुआ जो संग तुम्हारे,
है वो ईश्वर मर्जी से।।


नीलम रानी गुप्ता, बरेली की रहने वाली हूं औररूह से पब्लिकेशन की मालिक हैैं।

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