काम की बात

एक देश एक शिक्षा क्या हो सकेगा संभव

@शालिनी सिन्हा…

आज हर तरफ एक समान नागरिक संहिता की चर्चा है। काश की एक देश एक शिक्षा की भी बातें उठती। बिना शिक्षा के इंसान का जीवन व्यर्थ है और बिना समावेशी शिक्षा के समानता कैसे आएगी? जब शिक्षा में समानता का भाव सन्नीहित नही, तो पूरे देश में आखिर किस आधार पर एक क़ानून पर सहमति बन सकेगी?
समानता लाने का प्रथम आधार है शिक्षा। भेदभाव पूर्ण शिक्षा से क्या हम समानता के स्तर तक पहुंच सकते है? शिक्षा ही वह माध्यम है जहाँ से समानता की शुरुआत होती है। परन्तु देश का दुर्भाग्य है कि जिस शिक्षा से भेदभाव को समाप्त किया जाना था, आज उसी शिक्षा में सबसे अधिक भेदभाव मौजूद है। विभिन्न माध्यमों और उनके स्तरों पर तो भेदभाव विद्यमान है ही। साथ ही शहरी तथा ग्रामीण स्तरों पर स्थापित विद्यालय तथा कॉलेज भी व्यापक स्तर पर असमानता के शिकार है।
आज बेहतर स्वास्थ्य हो या फिर अच्छी शिक्षा सभी बड़े शहरों में ही उपलब्ध है। बड़े-बड़े इंजिनियरिंग और मेडिकल कॉलेज एवं उनकी शाखाएं केवल और केवल बड़े शहरों में ही स्थापित है। ऐसे में ग्रामीण परिवेश में रह रहे क्या सभी बच्चे इतने बड़े संस्थानों में जाकर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकेंगे? अगर जवाब नहीं है तो फिर समवेशी शिक्षा की बात कहाँ तक सार्थक है।
अच्छे कॉलेज तक पहुंच केवल कुछ मुट्ठी भर बौद्धिक और आर्थिक रूप से संपन्न लोगो तक ही सीमित है। ऐसे में शिक्षा तक सभी की सामान पहुंच की बातें बेमानी है। जब कुछ लोग ही बेहतर शिक्षा पाएंगे तो रोजगार भी कुछ लोगो को ही मिलेगा। और जिन्हें रोजगार मिलेगा वे ही आर्थिक रूप से सशक्त रहेंगे और देश की जीडीपी में भी केवल उन्हीं का योगदान रहेगा। बाकि तो लापरवाह और बेकार जनशक्ति के रूप में देश और उनकी आर्थिक व्यवस्था में एक दुष्चक्र की तरह फंसे रह जायेंगे । अंततः वे गरीब ही रह जाएंगे जो कि किसी भी विकासशील देश के लिए ठीक नहीं है।
ये ठीक बात है कि गावों में संसाधनों की भारी कमी है, माँग भी नहीं है, ना ही क्वालीफाईड फैकल्टी ही है। परन्तु क्या हम गाँव की शिक्षा के भरोसे उन करोड़ों के बच्चों के भविष्य के साथ समझौता कर सकते है? बच्चों के भविष्य पर जो खतरा उत्पन्न होगा उसे छोड़ भी दें तो क्या हम अंततः देश की जीडीपी के डाउनफाल को संभाल सकेंगे?
शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में भी राज्यों पर शिक्षा का दायित्व डाला गया है। बावजूद इसके शिक्षा की अलग-थलग व्यवस्था की वजह से छात्रों का जीवन नष्ट होता चला जा रहा है। वर्तमान युग में शिक्षा सबसे बड़ी इंडस्ट्री के रूप में उभरी है। लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी देश के चुनिंदा संस्थानों में ही उपलब्ध है। शायद यहि वजह है उच्च शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग (एनआईआरएफ रैंकिंग 2023) में सौ कॉलेजों की सूची में 35 कॉलेज केवल तमिलनाडु के है। अन्य राज्यों में सिर्फ दिल्ली, केरल और वेस्ट बंगाल के ही कॉलेज शामिल है। यानि देश के 28 राज्यों की सूची में से केवल इन्हीं चार राज्यों का प्रतिनिधित्व शामिल है बाकि के 24 राज्य अपने ही देश की ही रैकिंग से नदारद है। इसी बात से आप अन्य कॉलेजों की शिक्षा, उसकी गुणवत्ता और उनमें अध्ययन छात्रों के भविष्य का अंदाजा लगा सकते है। एक और बात हैरान करने वाली है कि देश के कॉलेजों और विश्व-विद्यालयों की रैकिंग हो या फिर विश्व के , सभी में आईआईटीज़ ही शीर्ष पर है। इसका अर्थ यहि है कि सरकारी या गैर सरकारी मदद केवल आईआईटीज़ को ही है। आईआईटीज़ में गरीब छात्रों को मात्र कुछ सीटे आरक्षण के रूप में उपलब्ध करवा देने से देश की शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता नहीं आ सकती। सर्वे बताता है कि गरीब पृष्ठभूमि के छात्र भले ही आईआईटीज़ में प्रवेश पा जाए, परन्तु अंत में वह असफल ही रह जाते है। इसका एकमात्र कारण है कि उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि। माध्यम भी कमजोर पृष्ठभूमि वालें विधार्थियों के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। ज्यादातर अच्छे कॉलेजो में पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी है, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि में पढ़े छात्रों के लिए एक कठिन समस्या है।
आज शिक्षा में युद्धस्तर पर बदलाव की जरुरत है। नई शिक्षा नीति को जल्द से जल्द पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए। साथ ही जिसतरह भारत में विदेशी स्कूलों की शाखाएं खोलने का काम होने जा रहा है ठीक उसी प्रकार उच्च रैकिंग वाले देशी स्कूलों की भी शाखाएं ग्रामीण स्थानों पर खोला जाना चाहिए। एपीजे अब्दुल कलाम जी की “पूरा”की अवधारणा पर आज विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
आपको बता दूँ कि आज देश के पास सबसे बड़ी चुनौती है कि यहाँ के युवा शिक्षित तो है मगर कौशलयुक्त नहीं है। देश में कौशल विकास कार्यक्रम चलाये जाने के बावजूद हम उस बदलाव तक नहीं पहुंच सकें है जो आने वाले युग की आवश्यकता है। अतः युवाओं के लिए रोजगार की समस्या लगातार बनी हुई है। देश के पास युवा शक्ति तो है लेकिन वह ना तो कौशलयुक्त है और ना ही उनके पास रोजगार ही है। साथ ही भारत का श्रम भागीदारी दर भी मात्र 39.9%(2022-23) ही है। यानि की काम करने की भूख भी जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं है। ऐसे में अगर इन युवाओं पर जल्द ध्यान ना दिया गया तो ये देश के लिए अनुत्पादक सिद्ध होंगे।
आपको बता दूँ कि आमतौर पर इंटरमीडिएट या ग्रेजुएशन के बाद युवा सरकारी नौकरी की तैयारी में जुटते है। जिसमे तक़रीबन उनका 5-8 साल अगर सफल ना हुए तो बेकार चला जाता है। ऐसे में लगभग 30 की उम्र होने के बाद भी उनके पास ना तो कोई एक्स्ट्रा कौशल होता है ना ही अनुभव। विकल्प के रूप में उसके पास एकमात्र स्कूल टीचर या टयुशन का रास्ता बचता है। और यह विकल्प युवा अकसर मज़बूरी में में चुनते है। बाद में इसे छोड़ वह छोटा मोटा व्यवसाय स्थापित करने की तरफ रुख करते है। जिससे वह मात्र अपने और परिवार के भरण पोषण करने तक ख़ुद कों सीमित कर लेते है। ऐसे में जो युवा देश के लिए बहुत कुछ उत्पादक कर सकता था वह सीमित होकर सिकुड़ जाता है और उसकी प्रतिभा भी सिकुड़न के चलते दम तोड़ देती है।
सरकारी तथा गैरसरकारी संगठनों को यह प्रयास करना चाहिए कि स्कूली पढ़ाई के दरमियान ही कम्पटीटिव एग्जाम की तैयारी सुनिश्चित हो सके तथा उचित कॉउंसलिंग व्यवस्था के जरिये बच्चों को भविष्य का विकल्प चुनने में उनकी मदद हो और ग्रेजुएशन के साथ-साथ अप्रेन्टिशिप की व्यवस्था करनी चाहिए, जिसमे युवाओं को पढ़ाई के साथ व्यवहारिक ज्ञान तथा आर्थिक मदद दिया जा सके। ताकि ग्रेजुएशन के बाद हर युवा के पास कंपनी के अनुरूप 3 साल का अनुभव प्राप्त हो। पढ़ाई भी कंपनी या आने वाले भविष्य के कौशल मांग के अनुरूप प्रैक्टिकल माध्यम से करवाया जाना चाहिए।

शालिनी सिन्हा
पूर्व-रिसर्च एसोसिएट
केन्द्रिय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ
गेस्ट फैकल्टी
एज़ाज़ रिज़्वी कॉलेज ऑफ जॉर्नलिज्म
एवं फ्रीलान्स लेखिका

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