रचनाकार

लद्युकथा : जनता के गट्स

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…

अरुणा कश्यप आज कोर्ट में नेताजी के रेपिस्ट लड़के के केस की कवरेज करने के लिए पहुँची थी। अपने चैनल के रसूख़ का इस्तेमाल करते हुए उसे कोर्ट में कार्यवाही के दौरान कैमरे के बजाय मोबाइल से और बिना बोले शूट करने की इजाजत मिली थी। वह समय से पहले ही कोर्ट के अंदर पहुँच गई थी और वहाँ पर बैठी हुई एक दूसरे केस की सुनवाई को देख रही थी।

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“मिस्टर शंकरलाल! आप भारतीय फौज में हैं, आपसे तो देश की रक्षा की उम्मीद की जाती है। अदालत आपसे उम्मीद करती है कि आप लोग इस देश की रक्षा करेंगे, इस देश के कानून को मानेंगे, लेकिन मैं यह क्या देख रहा हूँ कि आपके ऊपर पाँच लोगों की हत्या का आरोप है।” जज ने अपने सामने पड़ी हुई केस फाइल को देखते हुए कहा।

“जी सर, यह आदमी फौजी है, लेकिन इसने पाँच लोगों की निर्मम हत्या की है। जिनमें सरकारी आदमी भी हैं।” सरकारी वकील ने कहा।

“यह अदालत शंकरलाल से जानना चाहेगी कि उसने इन लोगों की हत्या क्यों की?” जज साहब ने कहा।

“जज साहब! आपकी बेटी का अभी चार गुंडों ने बलात्कार कर दिया है। आपका फोन आप अपने साथ नहीं लाए हैं। आप अपने घर फोन कर के जरा मालूम कीजिए।” शंकरलाल ने कहा।

जज साहब एकदम से अपनी कुर्सी से उछल पड़े। वह अपनी जेब टटोलने लगे लेकिन उनकी जेब में सचमुच फोन नहीं था। वह एकदम से घबरा गए। उनकी बुरी हालत और बेबसी को देख कर शंकरलाल ने कहा-

“जज साहब! यह खबर झूठी है। इसमें सिर्फ इतना ही सच है कि आपके पास मोबाइल नहीं है। आप पानी पी लीजिए।”

जज साहब घबराते हुए अपनी कुर्सी पर बैठे और टेबल पर रखे हुए गिलास से पानी पीने लगे। कुछ देर बाद जब जज साहब अपने आपे में लौट आए, तब शंकरलाल ने फिर से उनकी तरफ देखते हुए कहा-

“जज साहब! अखबार आपके घर भी आता है। रोज ऐसी खबरें अखबार में छपती हैं, लेकिन आपको बाकी लोगों की तरह कोई फ़र्क नहीं पड़ता। आप भी चाय पीते हुए अखबार पढ़ते हैं, और फिर उसे रद्दी की तरह फेंक देते हैं। मजेदार बात यही है कि अब इस देश के अंदर रद्दी ही इकट्ठी हो रही है। आपके यहाँ हजारों केसों की जो फाइलें हैं, वे भी सिर्फ रद्दी हैं। रद्दी के पीछे का सच हमारे और हमारे जैसे लोगों के लिए सिर्फ इतना ही है जितना कि आप के लिए तब तक था, जब तक मैंने आपसे यह नहीं कहा था कि आपकी बेटी के बलात्कार की खबर झूठी है।” शंकरलाल ने कहा।

“आप यह बेकार की बातें बताना बंद कीजिए, कोर्ट का समय बहुत कीमती है। आप यह बताइए कि आपने उन पाँच लोगों का खून क्यों किया?” वकील ने शंकरलाल की तरफ घूरते हुए कहा।

“वकील साहब! आपकी बीवी का सचमुच कार एक्सीडेंट हो गया है। आपको छोड़ने के बाद सरकारी गाड़ी आपकी बीवी को शॉपिंग कराने गई थी, जिसे एक पियक्कड़ ट्रक वाले ने टक्कर मार दी। आपकी बीवी को अस्पताल वाले बिना पैसा लिए दाखिल नहीं कर रहे हैं।” शंकरलाल ने कहा।

“तुम ऐसा मजाक जज साहब के साथ कर सकते हो, मेरे साथ नहीं।” वकील ने कहा।

“आप तो कोर्ट की बात को नहीं मानते हैं, फोन आपकी जेब में है। जो कुछ मैंने कहा है आप उसकी तस्दीक कर लीजिए।” शंकरलाल ने वकील की आंखों में देखते हुए कहा।

वकील साहब अपने काले चोंगे के नीचे से अपनी जेब में फोन टटोलने लगे।

“माफ कीजिएगा माय लॉर्ड ….. मुझे कंफर्म करना पड़ेगा।” और वकील साहब ने अपनी जेब से फोन निकालकर पत्नी को लगा दिया।

“जज साहब! इनकी भी पत्नी का एक्सीडेंट नहीं हुआ है। लेकिन एक बात तो पक्की है कि सरकारी गाड़ी इनकी बीवी इस्तेमाल कर रही है। ठीक ऐसे ही सारा सिस्टम नियम और कानूनों का मजाक उड़ा रहा है। मैं भारतीय सेना का सिपाही, अपने देश की सीमा की रक्षा के लिए हर वक्त, हर मौसम में, हर तरह की परिस्थिति में अपने देश की रक्षा के लिए मरने और मारने को तैयार हूँ। मगर मैं रक्षा किसकी कर रहा हूँ? ऐसे वकीलों की? जो देश और जनता के पैसे का नाजायज फायदा उठा रहे हैं। ऐसे लोगों की जो किसी बहन बेटी को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं, या फिर ऐसे नेताओं की जो इस देश को, इस देश के लोगों को आपस में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ा कर इस देश की ऐसी-तैसी करने पर तुले हुए हैं, धर्म की जगह धार्मिक भावनाएँ भड़काकर।” शंकरलाल ने कहा।

“देखिए! आप अपराधी के रूप में कोर्ट में हाजिर किए गए हैं, इस तरह की नेतागिरी की बातें करनी बंद कीजिए।” जज साहब ने कहा।

“अभी कुछ देर पहले जो आपके अंदर बहुत कुछ जागा था, एक बाप या शायद एक पति, उसी तरह से मेरे अंदर भी एक भाई जागा। अगर आपके हाथ में पिस्तौल होती, और किसी ने सचमुच आपकी बेटी का रेप कर दिया होता तो क्या आप पुलिस और कानून का दरवाजा खटखटाते या फिर अपनी बेटी को बचाने के लिए उन लोगों को गोली मार देते?” शंकरलाल ने कहा। जज साहब कुछ देर के लिए खामोश हो गए।

“जज साहब ! ये जो मेरा देश है, मुझे सिखाया जाता है कि यह मेरा परिवार है। मुझे नहीं मालूम कि आप की ट्रेनिंग में यह सिखाया जाता है या नहीं। हम लोग तो हाइट में आधा इंच कम हो जाएँ तो हमें चुना नहीं जाता। अगर आधा इंची सीना कम फूले तो हमें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। देश के लिए मरने वालों का हर तरह से चेकअप और परीक्षण होता है, लेकिन इस देश को चलाने वालों के ऊपर कोई अंकुश नहीं होता, एक सड़कछाप गुंडा भी इस देश को चलाने के लिए मंत्री और मुख्यमंत्री बन सकता है। उसके लिए कोई परीक्षा नहीं है, कोई इम्तहान नहीं है। इन लोगों को बचाने के लिए आपके वकील साहब और इनके जैसे लोग सिर्फ और सिर्फ पैसे के लिए खुलेआम गद्दारी करते हैं देश और समाज से और आप उम्मीद करते हैं कि सब कुछ सही होगा। अपराधियों को बचाना इन वकील साहब का पेशा है। ऐसे में हमारे घर और परिवारों की सुरक्षा का जिम्मा किस पर है? क्या पुलिस पर है, जो रेप की खबर लिखाने आई बच्ची का थाने के अंदर ही बलात्कार करती है, या फिर उस कोर्ट पर है जो कार्यवाही के नाम पर कोर्ट में अपने शब्दों से तारीख पर तारीख डालकर बार-बार बलात्कार करती है? या फिर उस नपुंसक समाज पर जो मंदिरों और मस्जिदों के लिए, पत्थरों की इमारतों और मूर्तियों के लिए एक-दूसरे के खून का प्यासा तो हो जाता है…. मगर सामने सोते हुए अत्याचार पर उसके जुबान नहीं खुलती, उसका मुँह सिल जाता है, और अपराधी अपने नाजायज पैसे के बल पर ऐसे काले कोट वालों को खरीद लेते हैं। हम लोग जो अपनों से दूर हैं, अनजाने लोगों को अपना मान कर बैठे हैं, हमारे अपनों की सुरक्षा कौन करेगा?” शंकरलाल ने कहा।

” तुम्हारे सवाल सही है लेकिन यह अदालत सिर्फ तुम्हारे बारे में जानना चाहती है। तुम इधर उधर की बातें छोड़ो और सिर्फ अपने केस के बारे में बात करो।” वकील साहब ने कहा।

“यह पूरा देश एक बड़े पेड़ की तरह है। हम सब इसकी शाखाएं, पत्तियां, फल और फूल हैं। आप ऊंचे हैं, इस सिस्टम के टॉप पर हैं, आप किसी फूल की तरह हैं, आपसे भी उम्मीद की जाती है कि आपसे जो फल बनेगा, उससे जो बीच उगेगा वह उत्तम क्वालिटी का होगा, लेकिन ऐसा नहीं होता है। हमारे देश के नेताओं को सिर्फ अपनी कुर्सियों की पड़ी है, इस देश के धर्म और जातियों के नाम पर टुकड़े किए जा रहे हैं, इस देश को कर्ज में डुबोया जा रहा है, लोगों को बेरोजगार किया जा रहा है, ऐसे में अपराध और अपराधी ही पैदा होते हैं, सो हो रहे हैं। जिसके लिए मैं लड़ा हूँ, जिसके लिए मैंने पाँच लोगों को मौत के घाट उतारा है, वह मेरी मुँहबोली बहन है। गरीब है, एक फैक्ट्री में काम करती थी। उसके मालिक और उसके चमचों ने उस की देह को अपवित्र किया। उसे अपने परिवार में भी कोई दिखाई नहीं दिया। और देखती भी कैसे? गरीब है, मजबूर है, और सबसे बड़ी बात कि वह औरत है, जिसकी इज्जत पर हाथ डालने वाले चाहे सोचे या न सोचें लेकिन यह समाज जरूर सोचता है। इस समाज को पत्थर फेंकने में मजा आता है, इसके दिमाग में खुजली होती रहती है कि कैसे किसी दूसरे का मजाक बनाया जाय। मैं छुट्टियों पर आया था, तब मुझे पता चला। मैं पुलिस के पास पहुँचा तो वहाँ ऐसा व्यवहार किया गया जैसे कि वह मेरी बहन नहीं कोई चकले वाली हो। पुलिसवालों ने पैसे खा कर उसे शारीरिक संबंधों की अभ्यस्त घोषित कर दिया। मैंने उस केस के इंचार्ज को, डॉक्टरी रिपोर्ट देने वाले डॉक्टर को, और उन तीन लोगों को अपनी तरह से सजा दे दी है। मैंने अपने भाई होने का फ़र्ज़, इस देश की रक्षा करने का फ़र्ज़ निभा दिया है। लोग यही सोचते हैं कि हम और कोई काम नहीं कर सकते, इसलिए मरने के लिए चले जाते हैं फौज में भर्ती होने के लिए। ऐसा इस देश के नेता भी कहते हैं। लेकिन मैं इस अदालत से पूछना चाहता हूँ कि इस देश के नेता लगातार इस देश को कर्ज के जाल में फंसाकर, अपने लिए बढ़िया से बढ़िया सुविधा जुटाकर, इस देश के लोगों का जीना हराम क्यों कर रहे हैं? जब तक घर अंदर से सुरक्षित नहीं होगा, हम सीमाओं की रखवाली करने वाले ऐसे ही मरना पसंद करेंगे। आज मैंने यह कदम उठाया है, कल को कोई और पैदा होगा। क्या आप में हिम्मत है कि आप सरकारी वकील साहब को कोई सजा दे सकें? क्या आप में हिम्मत है कि आप मेरे साथ, एक भाई के साथ, एक देश से प्यार करने वाले के साथ, एक आम नागरिक के साथ न्याय कर सकें।” शंकरलाल ने कहा और कोर्ट सन्नाटे में डूब गया ।

पत्रकार अरुणा कश्यप इस सारे वार्तालाप को अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर रही थी। वह अपनी सीट से उठी और कोर्ट से बाहर निकल गई। बाहर जाकर उसने अपने दो-तीन साथियों को फोन लगाया और इस केस की सारी जानकारी जुटाने के लिए कहा।

“हैलो! अरुणा, ये क्या कर रही हो? तुम्हें हमने हाई प्रोफाइल केस की कवरेज के लिए बोला था, और तुम यह बेकार के केस की पड़ताल कर रही हो।” एडिटर ने कहा।

“हाँ सर, आपकी बेटी और आपकी बीवी का रेप रोकने के लिए जरूरी है कि हम रेप करने वालों का नहीं, बल्कि उसके खिलाफ खड़े होने वालों का सहारा बनें, उनकी आवाज बनें। और हाँ सर, मैं बहुत दिनों से आपके यहाँ काम कर रही हूँ, मुझे इस बात का भरोसा हो गया है कि आपके अंदर इतने गट्स नहीं है कि आप सच्चाई दिखा सकें। मैं अपना प्राइवेट चैनल शुरू कर रही हूँ। इस केस की पूरी कवरेज के साथ ही उसका शुभारंभ होगा, आप जरूर देखिएगा … चैनल का नाम है… जनता के गट्स।” और उसने फोन काट दिया।

शब्द मसीहा

One thought on “लद्युकथा : जनता के गट्स

  • Dr Gulabchand Patel

    लघु कथा बहुत ही उम्दा थी हार्दिक बधाई

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