लद्युकथा : छोरी तो गाँव की हूँ

(शब्द मसीहाकेदारनाथ)
“सुसरा छोरी को पढ़ा के तीर मारेगा , बड़ा अपने आप कुं तीसमारखाँ बन रहया है, पता तो तब चलेगा जब जात बिरदरी में कोई छोरा न मिलेगा ब्याहने कुं ।”
गाँव के मुखिया जी के ये शब्द उसके मन को भेद गए थे , और पिताजी एक बार तो गर्दन लटकाकर शायद कुछ सोचने भी लगे थे, मगर माँ ने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया था मनोरमा को आगे पढ़ाने के लिए। दिल्ली में दाखिला लिया। और जब जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया तब माँ ने ही कहा था -“छोरी ! अब तक तो तेरा साथ दिया, पर यू टी वी अखबारों में तेरे कालेज का नाम बहुत ख़राब तरीके से आवे है। नेताजी मत बनिये, अपनी पढ़ाई करती रहिए।”
तब मनोरमा ने कहा था -“अरी माँ ! जो ये म्हारे कालेज की बुराई करें हैं न, इन्हें कुछ पता न है, ग्रेजुएट लोग भी वहाँ लाइन में लगे हैं, तब दाखिला मिले है, और नेता तो होवें ही अंगूठा टेक हैं। नई सोच का विरोध तो होवे ही है। मैं अपनी पढ़ाई पे ध्यान दूँगी, तू चिंता मत न करे।”
आज वही गाँव है। मनोरमा अमेरिका से लौटी है और गाँव जैसे वहीं टिका हुआ है। लोगों के कपड़े जरूर रेंगने लगे हैं, मगर सोच मंदिर की मूर्ति की तरह वहीं खड़ी है। मनोरमा सीधे मुखिया जी के यहाँ गई।
“राम राम ताऊ जी । गाँव का के हाल बना रखा है ?” मनोरमा ने सवाल किया।
“सरकार तो कतई निकम्मी है। और नेता हैं पूरे ऊत, बेटी !सब अपना सोचे हैं, किसी दूसरे की कोई भलाई न चाहता। न स्कूल है, न बिजली आवे है, न फसल के दाम अच्छे मिलते, कहाँ से तरक्की होगी ?” मुखिया जी बोले।
“तरक्की तो तुम और तुम्हारी सोच रोक के बैठी है। हुक्का पियो …बात बनाओ …छोरियों को मारो, पढ़ाओ मत, ब्याह मुश्किल से होगा …. अगर ऐसी सोच रखोगे तो कैसे आगे बढ़ोगे? यो काम मर्दों से न हो पावेगा, पर ये छोरी करेगी।” मनोरमा ने मुस्कुराते हुए कहा।
“बेटी! कहना तो घना आसान है, तू मुझे ताना देने आई है क्या ?” मुखिया जी व्यंग्य को समझते हुए बोले।
“न ताऊ जी , बिजली मिलेगी चौबीस घंटे और वो भी हमारी अपनी। स्कूल बनेगा वो भी हमारा अपना, और सफाई करेंगे हम , खाद बनाएँगे हम । तुम तो बस मजदूर छोरे दे दो , पैसा मैं लगाऊँगी इतना तो कमा ही लिया है ….. मुखिया तो न हूँ …पर छोरी तो गाँव की हूँ ।” मनोरमा अपना संकल्प बताते हुए उठ खड़ी हुई और मुखिया जी उसका चमकता चेहरा देखते हुए सन्न।

