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मऊ के राहुल राय की 12 कविताएँ

मर्द का दर्द…

कई दिनों से सोच रहा हूं ,
कि ऐसा मैंने क्या कर डाला।
दोषी बना कर दिया गया है ,
मुझको जैसे देश निकाला ।

नारी शक्ति की बात कही तो ,
बाछे सबकी खिल जाती हैं।
पुरुषों की जो पीड़ा कह दी,
सारी इज्जत मिट्टी में मिल जाती है।

लेखक कवि या फिल्मकार,
ये समाज का आईना होते हैं।
ये जागते रहते हैं तब भी जब,
आप चैन से सोते हैं ।

तुम क्या जानो ये आईना भी,
झूठी तस्वीर बनाता है ।
सच में जैसे आप है दिखते ,
उसको उल्टा करके दिखाता है।

लेकिन एक कवि या लेखक,
उसी बात को लिखता है ।
लाग लपेटो से बंधन मुक्त हो,
जैसा समाज में दिखता है ।

चीटा और चींटी को लेकर ,
जिस बात को मैंने बताया है ।
कम शब्दों में अधिक हो समझे ,
ऐसा मैंने पाया है ।

मर्द को दर्द भी होता है ,
पिछली कविता में समझाया।
क्यों मौन हो गए सारे श्रोता,
केवल एक कमेंट ही आया ।

कविता तुम्हारी गर्म है ज्यादा ,
इस पर थोड़ा आइस डालो ।
जो सब सुनना चाहते हैं ,
बातों का बस वही अर्थ निकालो।

औरत रोए तो दिखता है ,
क्या ये मर्दों का काम नहीं ।
दिन में ड्यूटी रात में ड्यूटी ,
क्यों मर्दों को आराम नहीं ।

सभी मर्द एक से होते हैं ,
ये नारी ही क्यों कहती है ।
पीड़ा सहकर मर्द चुप रहे ,
यही सही समझती रहती है ।

नर की पीड़ा औरत का दर्द ,
एक तराजू में तोलो,
नारी पीड़ा पर इतने कमेंट।
कुछ तो नर के दर्द पे बोलो।

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है अभी मुझे जागना नहीं…

माना यह सारा जग सपना,
कोई यहाँ नहीं है अपना।
है विरह अंत हर मिलने का,
मुरझाना हिस्सा खिलने का।
कितनी मुश्किल से सोया हूँ,
सपनों में तेरे खोया हूँ ।
हैं कितने तृषित अधर मेरे,
मधु प्याला हाथों में तेरे।
संभव है यह सब झूठा हो,
पर मुझे अभी जांचना नहीं।
है अभी मुझे जागना नहीं।

हो अभी अभी तो तुम आये,
हैं नयन नयन से टकराये।
मैं देख तुझे लूँ जी भर कर ,
लूँ प्यास बुझा मधु रस पीकर।
है अभी निशा भी यौवन पर,
चांदी बरसी है धरती पर।
जूही,चम्पा और पारिजात,
लेकर सुवास झूमती वात।
क्षण मात्र सही, किंतु यथार्थ,
ये मिलन प्रिये कल्पना नहीं ।
है अभी मुझे जागना नहीं ।

हमसे पहले कितने प्रेमी,
मिल चुके यहाँ और बिछड़ चुके।
कितने बसंत, कितने पतझड़,
कितने प्रसून खिल, बिखर चुके।
ये खेल अनादि अनंत प्रिये,
बस पात्र बदलते रहते हैं।
ये रंगमंच शाश्वत प्रियतम,
बस पर्दे उठते गिरते हैं।
पर्दा गिरने तक प्रणय प्रिये,
फिर हमें यहाँ लौटना नहीं।
है अभी मुझे जागना नहीं ।

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मैं हिन्दी हूं…

हां! मैं हिन्दी हूं,
चौदह सितम्बर वाली हिन्दी
साल में एकबार आती हूं,
व्यथित हो अलख जगाती हूं।
तामझाम रंग-रोगन से
मंचासीन अभिभाषण से।
मेरे इतिहास भूगोल दर्शन
मनोविज्ञान राजनीति पर,
जमती है विद्वानों की भीड़।
मन वचन धूंआधार प्रवचन
वेदव्यास की तरह रचते हैं,
पदाधिकारी, पदपूजारी
अष्टादश अध्याय महाभारत का।
फिर डालते हैं, अपनी तस्वीर
अखबार, इंस्टाग्राम, फेसबुक पर।
सीना तान, मूंछें फरकाकर।
लाईक एवं कमेंट की आशा,
अपने गर्दाझार भाषणों पर।
पन्द्रह सितम्बर से फिर
अगले तेरह सितम्बर तक,
मैं जार-जार आंसू रोती हूं।
विधवा बहन की तरह
पुत्र हीन माता की तरह
देश के कई प्रदेशों में,
अधिकारी के निर्देशों में।
न्यायालयों में, कार्यालयों में
विदेशी सोच,न्यायादेशों में।

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मैंने फेंक दी थी बात पानी में…

अभी कोई हलचल नहीं है पानी में,
अभी मत डालो नाव पानी में.

वह मेरे साथ था भी और नहीं भी,
मैंने फेंक दी थी बात पानी में.

क्यों किसी से लड़ना, किसलिए झगड़ना,
देख रहा हूँ मैं अपनी राख पानी में.

अभी तो यहीं तैरते देखा था उसे,
अचानक कैसे खो गया पानी में?

वे जो मिले तो कुछ इस तरह मिले,
पानी जैसे मिल जाय पानी में.

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मुट्ठी भर रेत लेकर आया हूँ…

माना कि दरिया होना गुनाह है,
डूब के देख मुझमें आब बेपनाह है;
दास्तानें पहन
निकला करो बाहर
कचरे बिखरे सरे राह है।
डब्बे न खाली उगल रहे
अब और न कचड़े डालो जी
घर घर क्यूँ इतना कबाड़ है?

नहीं हो सका है शिनाख्त
तब हो चुका बहुत अंधेरा था
उजाले में खिलवाड़ कर
अंदर गुल खिला दिये
बाहर गवाह का डेरा था।
कोई न था वहाँ
सिवा तुम्हारे
शायद वहाँ हवा भी न थी
उस दिन का इंतजार रहेगा
जब दरवाजा खोलोगे
बाहरी हवा जब अंदर आयेगी।

तब था कौन वहां
यह हवा का रुख बतायेगी
तय करेगी हवा
कितने अंदर तक तुम हो?
जबर्दस्ती की कितनी
गरमी है?
दुनिया को दिखाने
दास्तानें उतार दिये
पर मुखौटा अभी नहीं उतरा।
उठ तड़के सुबह
मोहब्बत में फिसलन तेरा
मैंने तो सच माना था।
मुस्कान भरे अदाओं को
बस अपना ही जाना था।
हो सके तो
मेरे नाम का दीया जलाना देना।
मुट्ठियों मे बंद रखना खुशबू,
पहाड़ों पर भी फूल लगा ना देना।
आकाश का रंग लाल हुआ
तुम धीरे धीरे उजाले से घिरते गये
मैं रात के आगोश में डूबा
उसकी सिसकियां टकराकर।
अब भी वापस लौटती हैं
दीवारों से टकराकर
वापस उस तक
इक खत लिखना भुल गया ,
जब से अंदर लहर जम गया ,
शिकायत सूरज से न करना,
दीया खूद ब खूद जल गया,
उजाले से नहा रहे हो
अब धूप से
खिलवाड़ कर रहे हो
गरम हो रहे तुम
तप रहे हो तुम
तुम्हारे साथ
तुम्हारा हवा
तप रही है
झुलस रही है
जल रही है
तुम तप रहे हो…
माचिस की तीलियों को बुझा कहूंगा
हर कमरे के छत को आसमां कहूंगा
अब पाकेट मे
दास्तानें महफूज हैं
एक और रात का इंतजार कर रहे हो…
तेरे आंचल से कालिख पोछने आया हूँ,
अजी, मेरी प्यारी मुट्ठी भर रेत लेकर आया हूँ ,

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चांद पहले भी यही था, फिर नया सा क्यों लगे?

कुछ अलग सा आसमा है,
और सितारे हैं नए।
चांद पहले भी यही था,
फिर नया सा क्यों लगे?

हाथ में ले हाथ प्रियतम,
जिस तरफ हम चल पड़े।
सौ नजारे झूम कर,
शानो अदब से झुक गए।

गुनगुनाते पंछियों का,
राग ही अब और है।
इन बहारों का प्रखर,
उल्लास ही कुछ और है।

मन मधुर उन्माद भर के,
मिल रहा नभ के गले।
प्रेम के मधुरस में डूबा,
ह्रदय मानो यूं कहे ।….

“कुछ अलग सा आसमा है,
और सितारे हैं नए।
चांद पहले भी यही था,
फिर नया सा क्यों लगे?”

चांद पहले भी यही था,
फिर नया सा क्यों लगे? !

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उजालों में बिकती है अक्सर रईसी, अगर पकड़ी जाए कह दे सनम है…

न इंसानियत है न कोई शरम है
उजाले शहर के महज़ इक भरम है।

अंधेरों से जंग है कहीं जुगनुओं की
कहीं रोशनी में चमकते *फ़हम है।
*कोयला
दिखावा है केवल चकाचौंध इतनी
असल तो दिलों में भरे कु-करम है।

अंधेरों में लुट जाए अबला कभी भी
है महफूज़ कलियां तुम्हारा वहम है।

उजालों में बिकती है अक्सर रईसी
अगर पकड़ी जाए कह दे सनम है।

सुकूं ना शहर में मिला दीप इतना
मिला गांव में बस यहां ग़म ही ग़म है।।

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जतन…

क्या क्या जतन किये हैं मैंने,
प्रियतम तुझे भुलाने को।

जब असह हुई पीड़ा मन की,
ली राह पकड़ इक उपवन की,
यौवन उन्मुख कलियाँ देखीं,
फूलों की रंग रलियाँ देखीं,
सर्वत्र व्याप्त निर्मल सुवास ,
भौरों का कलियों संग विलास,
रुक गया समय भी प्रिये जहाँ,
कुछ बोध स्वयं का कहाँ वहाँ,
क्या हुआ अचानक मगर तभी!
क्षण में परिवर्तित दृश्य सभी,
हर फूल बन गया दर्पण प्रिय,
तेरा मुखड़ा झलकाने को।
क्या क्या जतन किये हैं मैंने,
प्रियतम तुझे भुलाने को।

बैठा था इक दिन हो उदास,
फिर तभी अचानक आस पास,
था साज़ कहीं कोई छेड़ गया,
कानों में मधु रस घोल गया,
मन मृग को करके स्वरासक्त,
प्रत्यक्ष किंतु फिर भी अव्यक्त,
मन के, वाणी के भी अतीत,
छिड़ गया हृदय में कोई गीत,
ये गीत वही था, याद आया,
जो हमने मिल कर था गाया,
फिर कूक कोकिला तुम अपनी
आ जाओ मुझे सुनाने को।
क्या क्या जतन किये हैं मैंने,
प्रियतम तुझे भुलाने को।

संगी, साथी, महफ़िल,हाला,
साकी छलकाती मधु प्याला,
गज़लें,कविता,शायरी,कला,
पल दो पल को देती बहला,
मंदिर,आश्रम, मेला, दुकान,
धन,पद, लोगों से मिला मान,
जग ने कितने खोज़े उपाय
कि याद न तेरी आ पाये,
पर कौन मिटा पाया इसको,
लघु दीप किंतु चीरे तम को,
तू बन कर मेघ बरस ही जा ,
प्राणों की प्यास बुझाने को।
क्या क्या जतन किये हैं मैंने,
प्रियतम तुझे भुलाने को।

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‘भूख’ कविता का कुछ अंश …

जिम्मेदारियों भरा एक जीवन था
एक जोड़ी बैल और एक हल था ।।
बिन बरसात की मिट्टी सूख चुकी थी,
आंसू भी अब साथ छोड़ चुका था ।
कीचड़ से सनी हुई जवानी थी
भूख से तरफ थी तब की कहानी थी ।।
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मायूस बेटियाँ नाशाद है…

यह कैसा देश आजाद है,
मायूस बेटियाँ नाशाद हैँ।

लूट रही है रोज अस्मतें,
कलियाँ हो रही बर्बाद हैं।

कैसे बचाएँ लाज लज्जा,
छिंटाकशी भरे संवाद हैं।

घर हो या बाहर पल में,
सीमाएं हुई अतिवाद है।

निगाहों में भरी वासना,
बातें उल्टी जनवाद है।

ये आबरू कैसे बचेगी,
हर तरफ तो अवसाद है।

कोरी बकवास सरकारें,
कहीं सुधार अपवाद है।

मनसीरत बिगड़ैल पीढ़ी,
चंगुल मे नहीं औलाद है।
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माँ का घर…

मुद्दतें बीत गयीं उस घर से बिदा हुए
बरसों हो गए नया घर बसाये हुए
ढेरों जिम्मेदारियाँ,
बच्चों पर समय बिताते हुए
कहाँ अपनी याद में
बस घर परिवार बच्चों की ख़ुशी में
ढूँढ़ लेती हूँ ख़ुद को
अपना वजूद और अपने आपको
पर
फिर भी भूल नहीं पाती
वो घर, मेरी माँ का घर
जब देखो खो जाती
याद बहुत है आती
ज़िंदा है ज़ेहन में वो पुरानी बातें
कुछ लोग, कुछ रिश्ते-नाते
कुछ हँसी ठिठोली,
कुछ कड़वी किसी की बातें
छींक आने पर, माँ का नज़र का टीका
एक रोटी कम खाने पर,
माँ का टोटका…
जी चाहता है उड़ान भरकर वहीं पहुँच जाए
वही ज़िंदगी फिर से जीना चाहे
कितना भी रमने की कोशिश करूँ
माँ का घर नहीं भूल पायी
रहती हूँ यहाँ अपने घर में
फिर भी दिल माँ के घर रहना चाहे
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दूर रह मेरी हदों से…

सुंदर गांव था मेरा दूर पहाड़ पर
न जाने किस की नज़र लग गई
देखते ही देखते बह गया सब कुछ
श्मशान पर अर्थियों की दुकान सज गई

हर तरफ चित्कार थी हाहाकार थी
नज़रें ढूंढ रही थी अपनों को पर लाचार थी
समझ नहीं आ रहा था तरक्की का मतलब
कुदरत की गलती थी या मानवता गुनहगार थी

सदियों से चल रहा झूमता मुस्कुराता उसी रास्ते
दरिया ने आखिर क्यों बदला अपना रास्ता
समेट कर रख दिया था दरिया को सीमाओं में
पड़ा ही नहीं था मानव का अभी उससे वास्ता

अपना अस्तित्व बचाने को दरिया ने जोर लगाया
अतिक्रमण जो किया था एक ही बार में हटाया
अपने दायरे में उसके जो आता था सब ले लिया
मत समझ मुझे कमज़ोर यह मानव को समझाया

दूर रह मेरी हदों से मत कर इनसे छेड़छाड़
मेरे अस्तित्व पर जो वार करेगा दूंगी उसको फाड़
यह तो मेरा केवल ट्रेलर था जो तुमने अभी देखा है
अभी तो देखा कहाँ तूने मेरा गुस्सा और दहाड़

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