रचनाकार

रचना : “जड़ें”

@ मीनाक्षी गर्ग

भीषण आंधी में भी दम नही ,
उखाड़ कर अस्तित्व मिटा दे ,
उस वृक्ष का, जिसकी जड़ें ,
फौलाद से कम नही ,
पत्तें तो आते भी रहते हैं ,
जाते भी रहते हैं ,
मौसम अनुरूप रंग ,
बदलते भी रहते हैं ,
कभी ऐसा भी होता है ,
काट- काट हर शाखाऐं उसकी ,
छोड़कर उसे इस हाल में ऐसे ही ,
कोई बेहरम चला जाता है ,
लेकिन इरादे और दृढ संकल्प ,
जिन जड़ों के होते हैं मजबूत ,
फिर एक बार वह वृक्ष ,
आसमान छूने लग ही जाता है ।

23/05/2022

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