जरा याद करो कुर्बानी

101 साल : जलियांवाला बाग हत्या कांड

डॉ गुलाब चंद पटेल…

17 वी सदी में एक शिख हिमत सिंह के वतन में 26 हजार स्क्वेयर मीटर मे फैला हुआ मैदान था, वह मैदान समय के होते जाल्लवाला और बाद में जलियांवाला मैदान से पहचाना गया, बाग की तरह दिखते यह मैदान का नाम बाग के नाम से प्रख्यात हुआ, यहा साल में एक बार वैशाखी यहा शिखो द्वारा मनाई जाती थी,
जालंधर से 80 की मी दूर से काम चलाऊ बने हुए ब्रिगेडियर जनरल रेजिनलड डायर को अमृत सर माइकल ने बुला लिया, अमृत सर की स्थित बहुत हिंसक थी, स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान ब्रिटिशसर भारतीय प्रजा के ऊपर रोज रोज एक या दूसरी रित से जुल्म गुजारते थे, किसी को काले पानी की सजा सुनाई देते थे, तो किसी को गांव के चौराहे पर फांसी पर लटका देते थे, यह सभी जन संहार मे जलियांवाला बाग हत्या कांड के वक्त तो अंग्रेज लोग ने रही सही मानवता भी खो दिया था, 1919 अप्रैल को उनके मौत की शताब्दी के बाद 101 वे साल मे उनके बलिदान को स्मरण करते हुए वंदन…
माइकल ने जालंधर से ब्रिगेडियर जनरल को बुलाया, उसने 11 अप्रैल को शाम अमृत सर में प्रवेश किया, 12 दिनांक का दिन शांति से पसार हुआ, दिनांक 13 को वैशाखी का त्योहार होने से लोग जलियांवाला बाग में इकठ्ठे होने लगे, वैशाखी मनाया जाय एसी स्थिति तो थी ही नहीं लेकिन स्वतंत्रता की लड़ाई में गांधीजी सहित के नेता ओ को केसे मदद की जाय उस के लिए चर्चा भी करनी थी, विविध संप्रदाय के हजारो लोग उस मैदान में इकठ्ठे हुए थे, सात फिट की गली वाले प्रवेश द्वार से मैदान में आने जाने के लिए कठिन था,
थोड़ी देर बाद डायर और उसके सैनिक दाखिल हुए क्रांति कारी ओ ने कुछ ध्यान दिया नहीं, भाषण चालू था, डायर ने भी कुछ ध्यान दिया नहीं और फायर का हुक्म दे दिया, पंद्रह मिनट बाद गोलीबार रुक गया क्यो कि कार्टूस खाली हो गया था, डायर के आदेश से सैनिक बाहर निकल गए, उस सैन्य मे कितने लोग हिंदुस्तानी भी थे, जो लोग ब्रिटिश शासन मे नौकरी करते थे,
हत्या कांड के बाद देश भर में रोष फैल गया, रवींद्र नाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार ने दिया हुआ खिताब वापस कर दिया, नाइट टू हुड खिताब सरकार को वापस कर दिया, गांधीजी, सुभाष बाबू, और नेहरू सहित नेता ओ ने अपनी ओर से विरोध प्रकट किया, लोग रास्ते पर उतर आए और अंग्रेज पर अपना रोष व्यक्त किया, हिंदुस्तान का रोष शांत करने के लिए अंग्रेज ने डायर को कंपल्सरी निवृत कर दिया, उसे लंडन भेज दिया गया, डेढ़हजार से ज्यादा निर्दोष लोगों के मौत लेने की सजा बहुत बड़ी सजा थी,
1864 मे डायर का जन्म भारत में ही हुआ था, जिंदगी की आधी सदी उसने भारत में गुजारी थी, वो डायर को कायम के लिए यहा से बिस्तर पॉटलिया यहा से उठाना पड़ा, वो ब्रिटिश पहुचा तो 26 हजार पाउंड की राशि भरी बेग से उसका स्वागत किया गया, वो हीरो बन गया, बंगाल में रहती हुई 6250 अंग्रेजी महिला ओ ने ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर बताया कि आपका निर्णय डायर को नुकसान पहुंचाता है, इस लिए निर्णय वापस ले लिया जाय, ब्रिटिश शासन मे संसद में डायर की साथ माइकल भी बैठता था और डायर को मदद करता था क्यू की अमरुत सर के जलियांवाला बाग कांड में वो भी फस सकता था, भारतीय क्रांति कारी उधम सिंह ने 21 वर्ष के बाद लंदन जाकर माइकल को गोली मार दी और जलियांवाला कांड का बदला अकेले हाथ लिया,
जलियांवाला बाग में जहा अंग्रेज के द्वारा अंधा धुंध गोलीबारी कर के हजारो निर्दोष लोगों के जीव लिया गया था उस के गोली ओ के निशान आज भी मौजूद है, उसे लकड़ी की फ्रेम से रक्षित किया गया है, उस दिन 1650 राउंड फायर करने मे आए थे, प्रवासी भारतीय आज भी उसे देखने के लिए जाते हैं,
उस समय अंग्रेज की अंधा धुंध गोलीबारी से बचने के लिए लोग अपने बच्चे स्वजन के साथ बचने के लिए रास्ता खोजने लगे थे लेकिन रास्ता नहीं था इस लिए लोग गोली से बचने के लिए कुए मे गिरना लोगो ने पसंद किया, हत्या कांड के बाद 120 लाशें उस कुए से बरामत हुई थी, वो कुआ आज भी बलिदान की गवाही दे रहा है, वो शहीदी कुआ आज भी उस हत्या कांड की गवाही देने के लिए खड़ा हे,4 जून 1940 को डायर की हत्या के लिए उधम सिंह को फांसी की सजा दी गई थी, उनके अस्थि लाने के लिए भारत सरकार को सफलता प्राप्त हुई थी,
2017 को लंदन के मेयर सादिक ख़ान भारत आए थे और उन्होंने अमृत सर की मुलाकात के दौरान जलियांवाला बाग में गए थे, उन्होने शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी, यह घटना के लिए दुख जताया था लेकिन माफी नहीं मांगी थी, उस के पहले ब्रिटिश प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर, डेविड केमेरोंन, ब्रिटिश रानी एलिजाबेथ भी आई थी, लेकिन उनमे से किसी ने भी अपने पूर्वजों के अपक्रूत्य के लिए माफी मांगने की नम्रता नहीं दिखाई गई थी,
जलियांवाला बाग के हत्या कांड के लिए अमृत सर में पार्टीसन म्युजियम उन शहीदों की याद में बनाया गया है, 2017 को उसे खुल्ला रखा गया है. आज 101 वी पुण्य तिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं!

डॉ गुलाब चंद पटेल
कवि लेखक अनुवादक
नशा मुक्ति अभियान प्रणेता
ब्रेसट कैंसर अवेर्नेस प्रोग्राम
Mo 8849794377

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