खास-मेहमान

पालिका चुनाव :व्यक्तित्व या रणनीति की होगी जीत

मेरे शहर में…

संजय दुबे (वरिष्ठ पत्रकार )

0 शहर पा जायेगा : पालिका का नया नवाब वोटिंग खत्म,

परिणाम की प्रतीक्षा। जो आज समाप्त हो जाएगी। सबने खूब मेहनत की। वोटरों से लगाए प्रत्याशियों तक का खूब पसीना बहा। किसी का वोटरों को बूथ तक लाने में बहा, तो किसी का उनको जिताने के लिए कतार में खड़े होने में।अब, परिणाम के लिए उत्सुकता जगी हुई है। अभी,हर दल जीत रहा है। 12की रात तक सभी जीते,बस! कुछ ही घंटो की बात है, शाम तक़,शहर पा ही जायेगा-“अपनी पालिका का नया नवाब “। इस बार चुनाव काफ़ी दिलचस्प रहा है। ये अबकी कुछ अलग ही रंग में दिखा।प्रचार -प्रसार और जनसंपर्क के मामले में काफ़ी कुछ बदला -बदला सा दिखा।अरशद जमाल ने अपने बदले टिकट के बाद खुद को प्रचार में सबसे अव्वल रखा। यहां तक की चायखानों की चकल्लस से लगाए चट्टी चौराहों की चर्चा तक।हाथी की ही बात होती रही। ज़बकि उनकी पुरानी पार्टी सपा, टिकट कटने और पाने के ही जुगाड़ और विश्वासघात की ही चर्चा करती रही। यहां एक बात गौर करने लायक दिखी कि बसपा से ज़्यादा अरशद जमाल को लोगों ने तरजीह दी। ये, उनके 1+1 बार चेयरमैन होने का ही नतीजा रहा कि वो चर्चा में बने रहे। राजनीति में इसके क्या मायने है ? इससे सब वाकिफ़ है। आजकल की राजनीति का ट्रेंड है – “चर्चा, परचा, खरचा। ” इसलिए लगभग हर दल ने इसमें जी तोड़ मेहनत की। भाजपा, सपा की भी चर्चा कहीं से कमतर नहीं रही। फ़र्क बस ये दिखा कि भाजपा के वोटरों ने जहाँ पहले कुछ दिनों तक अपने को चुनावी बहसों की सक्रियता से दूर रखा वहीं,बाद में उतनी ही तेजी से अपने मूल स्वरुप में वापसी कर ली । मूल स्वरुप का मतलब माहौल बनाना। वो भी ऐसा कि दूसरे दल डर जाय या सकते में आ जाय। इसमें भाजपा सपा से बाजी मारती दिखी। सपा की सायकिल को जिस रफ्तार से चलना चाहिए था, उतनी तेज, वो प्रचार में चली नहीं। जनता के बीच उसके प्रत्याशी के नए होने की बात को पार्टी,उस तरह से ख़ारिज नहीं कर पायी जिस तरह करनी चाहिए।
जनता के बीच जो सपा एक समय अपनी जगह जितनी तेजी से बनाती दिखी उतनी रफ्तार से उसने वोट पाये कि नहीं अभी कुछ देर में ही फैसला हो जायेगा। पर, जनता के बीच ऐसा चमत्कार होने की आशंका की धारणा न के बराबर होने की है। बहरहाल, पालिका का नया नवाब कौन होगा? ये बस कुछ घंटो की ही बात है। हाँ! इतना तय है अगर, अरशद जमाल ने जीत दर्ज की तो निःसंदेह वो जीत उनके व्यक्तित्व की होगी। क्योंकि आम जनता के बीच उनकी पूर्व चेयरमैन की काम करने वाली छवि की ही भूमिका होगी। जिसकी गूँज नये शामिल इलाकों में पहले से ही बनी हुई है इससे,किसी को कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए।
अगर, अजय कुमार चुनाव जीतते है तब इसका श्रेय पूरी तरह से भाजपा की रणनीति को ही जायेगा। क्योंकि जिस तरह से सामान्य सीट पर भाजपा ने उससे इतर प्रत्याशी उतार जो दांव खेला है, वो कितना कारगर है इसकी भी जांच कुछ ही घंटो में हो जाएगी। अगर, ये प्रयोग भाजपा का यहां सफल रहा तो भाजपा इस रणनीति को कहाँ -कहाँ आजमायेगी ये, देखने की बात होगी। या इसके बाद इसे ठंडे बस्ते में डालेगी ये भी, आज के चुनाव परिणाम से,तय हो सकता है। क्योंकि भाजपा ने ये टिकट अपनी एक नयी छवि, बिना जाति -पांति की पार्टी वाली गढ़ने की कोशिश की है। इसे जनता का कितना समर्थन मिला ये भी कुछ देर में ही तय हो जायेगा।
बहरहाल, जीत व्यक्तित्व की हो या रणनीति की, जनता को अपने नये चेयरमैन से विकास की आस- थी, है, रहेगी। बस!… और क्या?…. बहरहाल नये चेयरमैन के इस्तक़बाल को शहर है तैयार….।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *