विवाह : एक डूबती हुई नैया या फिर डगमगाता हुआ पूल
ललित निबंध…
✍️ डॉ. विनय कुमार वर्मा
विवाह कभी केवल सामाजिक अनुबंध नहीं रहा – वह आत्माओं का वहन था, परंपराओं की अनुगूँज थी, और जीवन के साथ-साथ मृत्यु तक चलने वाली एक तीर्थयात्रा का नाम था। भारत की संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मेल नहीं, बल्कि दो कुलों, दो संस्कृतियों और दो संभावनाओं का अद्भुत संगम रहा है। इसमें समर्पण था, त्याग था, एक अनुशासित सौंदर्य था जो जीवन को संतुलन प्रदान करता था। किंतु आज, इस संस्था के चारों ओर जो धुंध छा रही है, वह केवल समय का कोहरा नहीं — वह चेतना की धुंधला होती लौ है।
अब विवाह की बात होती है तो चर्चा पहले प्रेम-विवाह बनाम अरेंज्ड-विवाह की होती है, फिर तलाक की दरों की, और अंत में उन घटनाओं की, जो आत्मा को झिंझोड़ देती हैं। मेरठ में पत्नी द्वारा पति की हत्या हो या मेघालय में रिश्तों की मर्यादा तार-तार हो जाना – ये घटनाएं केवल आपराधिक समाचार नहीं, ये सामाजिक संस्था के टूटते स्तंभ की दरारें हैं। एक समय था जब विवाह को एक ‘बंधन’ नहीं बल्कि ‘बंधन से भी ऊँचा’ माना जाता था। आज वह धीरे-धीरे केवल एक विकल्प बनता जा रहा है – एक ऐसा विकल्प जो सुविधा के साथ बदल भी दिया जाता है।
हमने वर्षों तक सुना कि दहेज के लिए बहुओं को जलाया गया। यह पीड़ा आज भी मौजूद है, लेकिन अब एक नया दृश्य भी उभर आया है – पति की हत्या, प्रेमियों के साथ मिलकर षड्यंत्र, विवाहेतर संबंधों की खुलेआम स्वीकृति, और अंततः एक ऐसा माहौल, जिसमें विवाह एक लाचारी या बोझ लगने लगा है।
इस स्थिति को केवल अपराध या असंवेदनशीलता कहकर टालना असंवेदनशील होगा। इसके पीछे गहरे सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारक हैं। आज का युवा अपने जीवन की स्वतंत्रता चाहता है – यह उचित भी है – किंतु यह स्वतंत्रता जब स्वेच्छाचार में बदल जाती है, जब वह साझेदारी के बजाय स्वामी बनने का रूप ले लेती है, तब विवाह की संरचना चरमराने लगती है। पहले प्रेम और जिम्मेदारी एक ही नाव में चलते थे, आज वे दो विपरीत दिशाओं के यात्री हो गए हैं।
विवाह अब एक आदर्श नहीं, एक ‘संविदा’ बनता जा रहा है। उसमें वे बातें नहीं जो सात फेरों में कही जाती थीं — ‘धर्मेच अर्थेच कामेच नातिचरामी’।
अब तो जैसे विवाह में प्रवेश करते ही दोनों पक्ष अपने अपने “बैकअप प्लान” भी लेकर चलते हैं – यदि यह नहीं चला तो अगला क्या होगा? रिश्ते निभाने की बजाय, अब रिश्ते बदलने की बात पहले आती है।
यह दुर्भाग्य नहीं कि स्त्रियाँ अब अपनी पीड़ा के विरुद्ध बोल रही हैं। बल्कि यह सामाजिक चेतना का सकारात्मक पक्ष है। पर जब यह बोलना ‘बदला’ बन जाए, जब हर समस्या का समाधान ‘तोड़ना’ हो जाए – तब यह विकास नहीं, अवसान का लक्षण है। पुरुष भी सदियों की पितृसत्ता की आदतों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। वे अभी भी स्त्री को बराबर नहीं, अपने अधीन मानते हैं। इस बीच एक तीसरी शक्ति – समाज और परिवार – भी एक दर्शक की भूमिका में आ गई है, जो हस्तक्षेप नहीं करता, न ही समाधान खोजता है।
बच्चों को हम गणित, विज्ञान, कला सब सिखाते हैं – पर क्या हमने उन्हें रिश्ते निभाना सिखाया? क्या उन्हें यह बताया कि विवाह केवल ‘प्यार’ नहीं, ‘धैर्य’, ‘त्याग’ और ‘संवाद’ का दूसरा नाम है? आज के युवक-युवती ‘रिलेशनशिप’ में रहना तो जानते हैं, पर ‘रिलेशन’ को जीवन की कसौटियों पर टिकाए रखना नहीं जानते। जिस दिन विवाह के पहले दोनों पक्ष यह समझ लें कि वे एक-दूसरे को ‘बदलने’ नहीं, ‘समझने’ आए हैं, उस दिन विवाह फिर से एक मधुर राग बन सकता है।
अब ज़रूरत है कि हम विवाह को फिर से पढ़ें – जैसे किसी भूले-बिसरे ग्रंथ को। हमें उसकी उन बातों को फिर से खोज निकालना है जो सात फेरे, सिंदूर, मंगलसूत्र में समाहित थीं — और जो अब महज़ रस्में बन चुकी हैं। विवाह को ‘पुरुष प्रधान व्यवस्था’ कहकर छोड़ देना जितना घातक है, उतना ही खतरनाक है उसे केवल ‘काग़ज़ी समझौता’ मान लेना।
विवाह को आज की पीढ़ी के अनुकूल बनाना होगा – न तो पूरी तरह आधुनिकता के सामने समर्पण करते हुए, न ही परंपरा के कठोर बंधनों में जकड़ते हुए। हमें मध्य मार्ग खोजना होगा – जहाँ स्वतंत्रता भी हो, मर्यादा भी; संवाद भी हो, आत्मीयता भी; अधिकार भी हो, और कर्तव्य भी।
आज विवाह की डगमगाती नैया को फिर से स्थिर करने की आवश्यकता है। यह केवल सामाजिक नहीं, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनिवार्यता है। विवाह टूटे नहीं – बल्कि फिर से जुड़े – इस दिशा में पहला कदम होगा: शिक्षा में रिश्तों की समझ, परिवार में संवाद की परंपरा, और समाज में सहनशीलता की पुनर्प्रतिष्ठा।
क्योंकि अंततः विवाह कोई ताजमहल नहीं, जो संगमरमर से बनता है – वह तो प्रतिदिन की छोटी-छोटी ईंटों से बनती एक संवेदना की दीवार है, जिसे न कोई अकेला बना सकता है, न अकेले बचा सकता है।
अगर हम चाहें – तो विवाह फिर से वही हो सकता है – जिसमें “साथ चलने की जिद” हो, न कि “अलग हो जाने की आज़ादी”।
और शायद तब, ‘मैं’ और ‘तुम’ से ऊपर उठकर, ‘हम’ फिर से जीवित हो उठेगा।
विवाह टूट नहीं रहा है – वह परिवर्तन के दौर में है। यह डूबती नैया नहीं, बस एक झंझावात से गुजर रही है।
सवाल यह नहीं कि विवाह बचेगा या नहीं –
सवाल यह है कि क्या हम विवाह को निभाने के लिए तैयार हैं?
यदि हाँ —
तो “छोटे-छोटे त्यागों” और “थोड़ी-सी सहानुभूति” से हम इस संस्था को फिर से गूँजता हुआ मंदिर बना सकते हैं।
” जहाँ दो आत्माएँ मिलती हैं, वहाँ विवाह होता है
..और जहाँ दो अहंकार टकराते हैं, वहाँ केवल झगड़े।”

