उत्तर प्रदेश

स्वस्थ जनजीवन के लिए वनों का संरक्षण तथा संवर्धन वर्तमान की जरूरत

@ कल्याण सिंह, शोध छात्र, स्वतंत्र लेखक, बांदा कृषि एंव प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा, ( उत्तर प्रदेश)

“ वन जब नष्ट होते हैं तो जल नष्ट होता हैं, मत्स्य और जीवन नष्ट होता हैं, फसलें नष्ट होती हैं , पशु नष्ट होते हैं, मृदा की उर्वरा शक्ति विदा ले लेती हैं, और तब वे पुराने प्रेत एक के पीछे एक प्रकट होने लगते हैं, बाढ़, सूखा, आग, अकाल, और महामारी”… राबर्ट चैंबर्स विज्ञान लेखक
“मैं ही द्वार कुटी का तेरे, और मनुष्य का चीर साथी, शैशव में पलना हूँ सबका, साँसों का अंतिम साथी ।
मैं उदार, भोजन, भूखों का ,सुषमा का साकार सुमन, मानव एक निवेदन तुमसे, नष्ट न करना मम जीवन” ॥
सारांश: पर्यावरण को रमणीय, सुगंधित, हरियाली युक्त तथा मानव जीवन के अनुरूप बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के निर्देश पर पूरे प्रदेश में जन सहयोग की भावना से वनों की समृद्धि, के लिए आशातीत प्रयास किये जा रहे हैं । इस भू- धरा पर जीवन की सफल संकल्पना के लिए प्राकृतिक प्रदत जल, वायु, वनस्पति, भूमि, तथा वनों का मानव जीवन में उपयोग करते हुए उसके संरक्षण तथा संवर्धन की नैतिक जिम्मेदारी भी मानव की है परंतु बढ़ती जनसंख्या, वातानुकूलित जीवन शैली ने मानवीय उपभोग को इस कदर बना दिया कि उसने सिर्फ प्रकृति का दोहन किया तथा मानव तथा प्रकृति के बीच संतुलन को बनाये रखने के प्रति ध्यान नहीं दिया जिसके भयावह परिणाम आज सूखा, बाढ़, अत्यधिक गर्मी , बाढ़ के रूप में जीवन के विनाश के लिए दृष्टिगत हो रहे है । माननवीय जीवन सुन्दर तथा आरामदेह तभी होगा जब हम प्रकृति के समीप रहकर उसके अनुकूल अपना और उसके कल्याण तथा समृद्धि के लिये दूसरे के प्रति काम करेंगे । जीवन शब्द मूल रूप से दो शब्दों से मिलकर बना है, जीव तथा वन । हम हैं, हमारी प्यारी धरती माता हैं, तथा हमारा आकाश । इस बसुंधरा पर जड़ तथा चेतन का अपना संसार है । प्रत्येक वस्तु एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं, एक दूसरे पर आधारित है, तथा एक दूसरे पर प्रभाव डालती है । इस लिए पर्यावरण के अवयवों का आपस में संतुलन नितांत आवश्यक है । जहा प्रकृति तथा मानव के बीच संतुलन की स्थिति बना हुआ है, वहाँ प्रकृति के समस्त वरदान मिले हुए हैं – शुद्ध हवा, धूप , पानी और शांति । जहा प्रकृति में संतुलन शेष नहीं रहा, वहाँ हमारी मानवीय गलतियों का ही परिणाम है कि आज अशुद्ध हवा , दूषित जल, अनावृष्टि, अतिवृष्टि, भूस्खलन, कोलाहल वातावरण के साथ -साथ वन्य प्राणियों व मनुष्यों के बीच द्वन्द के रूप में परिलक्षित हो रहा है । पृथ्वी को माता की तथा मानव को पुत्र की संज्ञा से विभूषित किया गया है, जैसा की हमारे वेदों में वर्णित है। अथर्ववेद का उद्घोष है कि “ माता भूमि”: पुत्रों अंह पृथिव्या :। अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं … यजुर्वेद में भी कहा गया है- नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्या :। अर्थात माता पृथ्वी ( मातृभूमि) को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है । धरती माता के समान हमारा पालन – पोषण करती है , मानव ही नहीं समस्त जीवधारियों का वासस्थान भूमि ही है जिसपर रहकर ही वह अपने जीवन को सफल तरीके से संचालित कर सकते है । भू- धरा पर उपस्थित वनस्पति, पेड़- पौधे, ही मानव तथा वन्य प्राणियों के जीवन की धड़कन का आधार है। मानव सभ्यता के विकास क्रम के पूर्व कालखंड से लेकार वर्तमान कालखंड में भी मनुष्य अपनी आवश्यकतावों की पूर्ति के लिए वनस्पतियों, पेड़ों पर आश्रित रहा है । पेड़ – पौधों तथा वनों से मानव तथा समाज को आदिकाल से लेकर आज तक प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होता है । आज का युग औद्योगिकरण का हो चला है जिसमे मनुष्य तथा पशुओँ के लिए भोज्य पदार्थ, चारा, ईंधन , ईमारती लकड़ियों की प्राप्ति , विभिन्न औषधियों के श्रोत, रेशे , फल – फूल , कृषि उपकरणों के लिए लघु काष्ठ तथा पेपर उद्योग के लिए कच्चे माल की आपूर्ति वनों के माध्यम से ही सुनिश्चित होती है । इसके अलावा वन तापक्रम को नियंत्रित करने के साथ – साथ वर्षा की निरन्तरता को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते है । जीवन के लिए हानिकारक हरित गृह गैसों यथा कार्बन डाईआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, को प्राणदायिनी आक्सीजन में परिवर्तित करने में अपनी महती भूमिका निभाते है, जिससे जीवन की कल्पना सुनिश्चित और चलायमान है । पेड़- पौधे तथा वन तेज तथा गर्म हवा से मानव तथा फसलों की रक्षा करते है ।
अमेरिका के कृषि वैज्ञानिक पाब्लों के अनुसार – भारत देश में शुद्ध आक्सीजन के लिए प्रति वृक्ष 16-18 व्यक्ति निर्भर है । यह निर्भरता बिहार राज्य के पटना शहर में प्रति वृक्ष 3500 व्यक्ति तथा पश्चिम बंगाल के कोलकत्ता जैसे महानगरों में 15,000 का आंकड़ा भी पार हो चला है । वर्ष 2011 की एक जनगणना के अनुसार वर्ष वर्ष 2001 से वर्ष 2011 के बीच एक दशक में जनसंख्या वृद्धि की दार 17.64 प्रतिशत है । आँकड़े यह दर्शा रहे है कि जनजीवन कितना अस्त – व्यस्त हो गया है । अतः अब आवश्यक हो गया की पर्यावरण से निरंतर सेवाये प्राप्त करते रहने के लिए हम सभी को अधिक से अधिक वनों को लगाना चाहिए ।
प्रो . टीo एमo दास द्वारा वर्ष 1980 में भारतीय विज्ञान काँग्रेस में प्रस्तुत किये गये अपने शोध पत्र के अनुसार – एक मध्यम आकार का वृक्ष 50 वर्ष की आयु तक आक्सीजन का उत्पादन , जन्तु प्रोटीन का संरक्षण , मृदा क्षरण नियंत्रण ,जल चक्र बनाए रखना, वायु प्रदूषण नियंत्रण का कार्य करता है। एक हेक्टेयर में लगाए उष्ण कटिबंधीय वन से 128.74 लाख रुपये की पर्यावरण सेवाये प्राप्त होती है । समस्त जीवधारी तथा वनस्पति एक दूसरे के पूरक हैं । वनस्पतिया ही इस धरा पर हमारे द्वारा निकाले गए कार्बन डाईआक्साइड गैस को ग्रहण करके जल तथा प्रकाश की उपास्थि में अपने भोज्य पदार्थ का निर्माण करती हैं तथा हमें साँस लेने हेतु प्राण वायु आक्सीजन गैस उपलब्ध कराती है ,जिससे सभी वाणी प्राणी के साथ इस धरा पर जीतने जीव- जन्तु व्याप्त है वह अपना जीवन चलाते है । एक हेक्टेयर भूमि में लगे वन प्रति वर्ष औसतन 3-4 मैट्रिक टन अशुद्ध वायु ग्रहण करके एक मैट्रिक टन शुद्ध वायु का उत्पादन करता है । वही दूसरी तरफ वक वृक्ष के द्वारा प्रति दिन 400 लीटर जल वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया के द्वारा वातावरण में भेजता है जिससे गर्म वायु आद्र बनी रहती है तथा वायुमंडल का तापमान एक समान रहता है । कोरोना नामक वैश्विक महामारी में लोगों ने शुद्ध वायु की सुचिता के बिना दम -तोड़ दिया था । घरों तथा बाजारों में आक्सीजन के बॉक्स की भारी मांग अपने जीवन को बचाने के लिए आमजन के द्वारा लगातार मांग की जा रही थी परंतु उसकी सूचित भी उपलब्ध नहीं हो पा रही थी कि लोगों के जीवन को बचाया जा सके । उस समय लोगों ने खेती- के साथ बारी की पुरानी अपनी विरासत रुपि अवधारणा को निश्चित रूप से अपनाने के लिए वर्तमान के साथ ही भविष्य के लिए संस्मरण किया है । निश्चित ही यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी की बिना खेती – बारी को साथ लिए हम जीवन की सफल कल्पना मात्र भी नहीं कर सकते है । एक अनुमान के अनुसार यह तथ्य आम जनमानस के सामने आया है कि एक मनुष्य सांस लेने के लिए 1.752 टन आक्सीजन प्रतिवर्ष उपयोग करता है तथा एक मध्यम आयु का वृक्ष, एक वर्ष में लगभग 1.6 टन आक्सीजन उत्सर्जित करता है अर्थात एक वृक्ष अपने जीवन काल में लगभग उतनी ही आक्सीजन देता है, जितनी एक व्यक्ति को अपने जीवन काल में सांस लेने के लिए आक्सीजन की आवश्यकता है । वृक्ष की अंधाधुंध कटाई तथा शहरीकरण के कारण आज पर्यावरणीय असंतुलन के ककारण ही ग्लोबल वार्मिंग जैसी विश्वव्यापी समस्या के साथ ही ओज़ोन गैसों के बढ़ते प्रभाव के कारण ओज़ोन परत में छिद्र होने की संभावना बढ़ती जा रही है, जिससे भविष्य में परा-बैगनी किरणों के सीधे प्रभाव के कारण त्वचा कैंसर संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ेगा साथ ही लगातार बढ़ते तापमान के कारण ग्लैशियर के पिघलने की संभावना के कारण समुद्री तटीय स्थानों पर बसे शहरों में बाढ़ की समस्या के कारण उनके डूबने की संभावना भविष्य में दिखाई दे रही है । एक अध्ययन के अनुसार पूरे विश्व में ऊर्जा उत्पन्न करने में करीब 24.6 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है । ऊर्जा क्षम उपकरणों का उपयोग व प्रदूषित गैसों के प्राकृतिक अवशोषक, वनों के आवरण में वृद्धि कर वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा काम की जा सकती है । वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ने का एक मुख्य एक मुख्य कारण वनों की निरंतर हो रही कटाई है । आज वायुमंडल में कार्बन डाईआक्साइड की सांद्रता 450 पीपीएम है जिसमे निरंतर वृद्धि जारी है तथा भविष्य में 540 पीपीएम तक सांद्रता पहुचने की संभावना है । एक अनुमान के अनुसार प्रति वर्ष कई एकड़ वन को काट दिया जाता है अथवा जला दिया जाता है । यह कुल कार्बन उत्सर्जन के 20 से 25 प्रतिशत भाग के लिए उत्तरदायी है । वनों की महत्ता तथा उसकी रक्षा के प्रति अपने दृढ़ संकल्पों के साथ भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी तथा उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने इसे लोक आस्था का विषय बताया है ।
“ हमारे लिए पर्यावरण की रक्षा आस्था का विषय है । हमारे पास प्राकृतिक संसाधन है, क्योंकि हमारी पिछली पीढ़ियों ने इन संसाधनों की रक्षा की । हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ऐसा करना चाहिए । पेड़ों की संख्या बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार का यह सराहनीय प्रयास है । श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी प्रधानमंत्री भारत सरकार ।
“नये भारत के नए उत्तर प्रदेश में पौधरोपण लोक पर्व का रूप ले चुका है । प्रकृति के कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उत्तर प्रदेश में 22 जुलाई, 2023 को 30 करोड़ से अधिक पौधरोपण का कीर्तिमान बनाया गया । ‘ माता भूमि : पुत्रोंह पृथिव्या: के भाव को आत्मसात कर सभी 75 जनपदों में अपूर्व उत्साह – उमंग – उल्लास के साथ जन – जन ने इस पुनीत कार्य में सहभाग किया । यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों को “ स्वच्छ- समृद्ध – हरित” परिवेश प्रदान करने में सहायक होगा । योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री , उत्तर प्रदेश सरकार । उत्तर प्रदेश में कुल वनावरण व हरित आवरण की वर्तमान स्थिति – उत्तर प्रदेश में हरियाली बढ़ाने की दिशा में चल रहे अभूतपूर्व प्रयासों के सुखद परिणाम अब सामने आने लगे है वर्ष 2017 से चल रहे अभियान का ही असर है कि प्रदेश का हरित क्षत्रफल बढ़ गया है । स्टेट आफ फॉरेस्ट रिपोर्ट – 2021 के अनुसार उत्तर प्रदेश में वनावरण तथा वृक्षावरण में 794 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है। उत्तर प्रदेश में कुल वनावरण 14,818 वर्ग किलोमीटर, कुल वृक्षावरण7.421 वर्ग किलोमीटर तथा कुल हरित आवरण 22,239 वर्ग किलोमीटर है, जो कि प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 9.23 प्रतिशत है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में 9.23 प्रतिशत हरित आवरण है जिसको आने वाले विगत पाँच वर्षों में 15 प्रतिशत करने का टारगेट है । इसके लिए पाँच वर्षों में 100 करोड़ पौधे कृषि वानिकी में लगेंगे जिससे हर साल 18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हरियाली की बढ़ोतरी होगी, इसके अतिरिक्त 75 करोड़ पौधे वन, सामुदायिक एंव राजकीय भूमि में रोपे जाएंगे जिससे पाँच साल में 5 लाख हेक्टेयर में हरियाली और बढ़ जाएगी । अभी उत्तर प्रदेश में 22,239 वर्ग किलोमीटर हरित आवरण है । अगले पाँच वर्षों में 14 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक हरियाली और जुडने पर कुल 36 हजार वर्ग किलोमीटर हरित आवरण हो जाएगा ।
उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा पौधारोपण अभियान को गति प्रदान करने में सहायक योजनाये
विरासत वृक्ष अंगीकरण योजना : उत्तर प्रदेश सरकार ने पीढ़ियों पुराने पेड़ों को विरासत वृक्षो का दर्जा दिया है । इस योजना के अंतर्गत कुल 948 विरासत वृक्षो को सँवारने तथा सजाने की तैयारी है। पौराणिक व ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्मारकों, धार्मिक स्थलों , अति विशिस्ट व्यक्तियों, व मान्यतावों से जुड़े करीब 100 वर्ष से अधिक पुराने पेड़ों को संरक्षित कर इसके प्रति आम जनमानस में जागरूकता पैदा करने के लिए प्रतिबद्ध है । यह वृक्ष प्रदेश के 75 जनपदों में स्थित है ।

 

पिछले 6 वर्षों में जनसहयोग और जनभावना तथा सरकार के संयुक्त प्रयासों से पौधारोपण अभियान एक जन आन्दोलन का रूप ले चुका है जिसका परिणाम यह है कि हरियाली में वृद्धि के साथ- साथ जैव विविधिता में भी आशातीत वृद्धि दर्ज की गई है । विगत पाँच वर्षों में वाणी जीवों यथा बाघ, हाथी, सारस, और गिद्धों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है । राष्ट्रीय पशु बाघ की संख्या विगत पाँच सालों में 118 से बढ़कर 173 हो गई है । इसी प्रकार हाथियों की संख्या भी 265 से बढ़कर 352 हो गई है । राज्य पक्षी सारस की संख्या 13,670 से बढ़कर 17,586 हो गई है । उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जनपद में टाइगर रिसर्व में बाघों की संख्या 25 थी, लेकिन अब बढ़कर 65 हो गई है ।
मुख्यमंत्री कृषक वृक्ष धन योजना के अंतर्गत पौधारोपण अभियान को गति प्रदान करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने इस योजना के अंतर्गत मनरेगा कार्यक्रम के तहत निजी खेत की मेड़ पर पौधारोपण करने के लिए यह योजना चलाई है । मनरेगा का लाभार्थी यदि अपनी भूमि पर कम से कम 200 पौधे लगाकर उनका संरक्षण करता है तो सरकार उसे तीन वर्षों में 50 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान करेगी । हरीतिमा गंगा योजना के द्वारा गंगा, यमुना, सरयू सहित विविध नदियों के तटवर्ती क्षेत्रो में सघन पौधारोपण अभियान के तहत बिजनौर से बलिया जिले तक 1140 किलोमीटर एरिया में 27 से अधिक जिलों में पौधे लगाकर ग्रीन वेल्ट बनाई जा रही है । सामाजिक वानिकी तथा कृषि वानिकी का वानावरण बढ़ाने में उपयोगिता — सामाजिक वानिकी समाज के लिए , समाज के द्वारा, समाज की भूमि पर वनीकरण है । देश को 25 प्रतिशत ऊर्जा की प्राप्ति लकड़ियों को जलाने से होती है । प्रति वर्ष 1.3 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र के वनों को काटा जाता है।

लेखक:- कल्याण सिंह स्वतंत्र लेखक हैं तथा सब्जी विज्ञान विभाग, बांदा कृषि एंव प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा में शोध छात्र हैं

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