लघुकथा : सुख की छाँव

@ साक्षी साहु सुरभि, महासमुन्द, छत्तीसगढ़...
आजकल मन बहुत विचलित हो रहा है पता नहीं क्यों किसी काम में मन नहीं लगता महेश सीता से यह कहते हुए उदास हो गया और उसका गला भर आया। सीता ने महेश को धीरज देते हुए पूछा-क्या बात है आप कुछ दिनों से बहुत परेशान और विचलित रहते है क्या बात है मुझे बताओ न। महेश को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि उसका मन बेचैन क्यों है।
एक दिन गांव से खबर आई कि माँ बहुत बिमार है और बेटे बहू से मिलना चाहती है। महेश नौकरी के सिलसिले मे बाहर शहर में रहता। माँ की खबर सुनकर वह बिल्कुल भी देर किये बिना सीता के साथ गाँव के लिए निकल पड़े।
कुछ घंटों में गाँव पहूंच गये माँ बिस्तर पर लेटी हुई थी। बड़े भैया भाभी काम मे लगे हुए थे। माँ महेश और सीता को देखकर बिस्तर से उठकर बैठ गई और महेश को गले से लगा लिया।
महेश के माँ से गले लगते ही सप्ताह भर की व्याकुलता और
बेचैनी ऐसे गायब हुई मानो कभी थी ही नहीं।

