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ऐतिहासिक है आज़ादी के अमृत पर्व पर द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना!

@ डॉ. कन्हैया त्रिपाठी…

( लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व सम्हाल चुके हैं और अहिंसक सभ्यता के पैरोकार हैं )

परिवर्तन तो हमेशा होता रहा है. आने वाले समय में भी हम अनेकों परिवर्तन के साक्षी बनेंगे. लोकतंत्र में सहभागिता का जो परिवर्तन आज़ादी के अमृत पर्व पर दिख रहा है वह भी अपने आप में उदाहराणीय है.

देश में राष्ट्रपति चुनाव चल रहा है और देश के सभी रहवासी इस बात को लेकर कयास लगा रहे हैं कि अगला राष्ट्रपति कौन होगा. हम जानते हैं कि देश के दो लोग ही चुनाव में अपनी-अपनी दावेदारी के लिए देशव्यापी दौरे कर रहे हैं. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन व बीजेपी की ओर से झारखण्ड की राज्यपाल रह चुकी श्रीमती द्रौपदी मुर्मू और विपक्ष की ओर से श्री यशवंत सिन्हा. दोनों की अपनी-अपनी दावेदारी कई मायने में दिलचस्प हो चुकी है. लेकिन जिस देश की जनता यह जानती है कि उसका सम्मान किसके राष्ट्रपति बनने में है, वह उसी अनुसार अपने-अपने उत्तर की तलाश भी कर रही है.

@ डॉ. कन्हैया त्रिपाठी…

देश की आज़ादी के 75वें साल में हमारे नए राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा है जो ऐतिहासिक चुनाव कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारत अपने 75वें साल का सौभाग्य लिखे. लेकिन यह कहा जा रहा है कि देश में जनजातीय लोगों को सम्मान क्यों नहीं मिलना चाहिए?  द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति बनती हैं तो देश के इतिहास में अपने देश के नेतृत्त्व के साथ दरअसल वह एक इतिहास रचने जा रही हैं. जनजातीय समाज के लोगों से आती हैं. जनजातीय लोगों के दुःख-दर्द को जानती समझती हैं. उनके सरोकारों से वह वाकिफ हैं. अब देश में समझा गया है और देश द्रौपदी मुर्मू की जीत के साथ अमृतकाल में निःसंदेह उन्हें अपने गौरवबोध को दिलाना है. जिन्हें यह महसूस होता रहा है कि हम आमलोग हैं और हमारा तो कोई ऐसे बड़े दावे बनते ही नहीं हैं, तो वह गलत है.

भारत के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने द्रौपदी मुर्मू को फोन करके जब उनके नाम पर मुहर लगाईं तो यह द्रौपदी जी के लिए आश्चर्यजनक था. लेकिन यह एक सच जो राष्ट्रपति के चुनाव के साथ सच होने जा रहा है वह एक सच है, जो इसी भारत का सच है. आधिकारिक रूप से चुनाव होने के बाद द्रौपदी मुर्मू इसी जुलाई माह में भारत के राष्ट्रपति का दायित्व सम्हाल लेंगी और देश को अपने अनुभव के अनुसार संविधान की गरिमा के अनुसार नेतृत्व भी देंगी. प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वह राष्ट्र को गति प्रदान करेंगी. जनजातीय समाज के लोग इससे प्रसन्नता और गौरव की अनुभूति करेंगे. यह उनका गौरवबोध भगवान बिरसा मुण्डा को स्मरण दिलाएगा. आज़ादी के महासमर में भगवान बिरसा, सिदो और कानू ये ऐसे नाम हैं जिन्होंने इसी जनजातीय समाज का नेतृत्व करके आदिवासी समाज के मान को बढ़ाया. द्रौपदी मुर्मू उनकी ही कड़ी में शामिल होने वाली स्त्री नेत्री होंगी. अब अप सोचिये कि उनका राष्ट्रपति बनना कितना आवश्यक है.

भारत में सच्चे मन के लोगों को राष्ट्रपति बनना आवश्यक है. दुनिया के जनजातीय लोगों का इतिहास है कि जनजातीय समुदाय को अच्छा और सच्चा कहा गया है. मैं खुद अपनी पुस्तक आदिवासी समाज और मानव अधिकार में उन्हें सौम्य समाज कहता हूँ. आज जब देश के आज़ादी का हम 75वां जश्न हम मना रहे हैं तो जनजातीय समाज से कोई राष्ट्रपति बने तो इसमें ज्यादा खुश होने की बात है. यह चुनाव एक ऐसी सभ्यता का बीजारोपण है जो आने वाले समय में यह साबित करेगी कि हमारे देश में सबका सामान हक था और उसका समान सम्मान हुआ. एक बार जनजातीय जिंदगी के बारे में सोचकर देखें. उनके सहजताबोध को सोचें. उनके सच्चे हृदय को समझें और उस स्थान पर महसूस करके देखें कि इस समाज से यदि कोई राष्ट्रपति बनता है तो उनके समाज में कितना साहस, उम्मीद और कुछ कर गुजरने की चाहत का संचार होने वाला है.

इसलिए जो आने वाले समय में जिस द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति के रूप में चयन भारत करने जा रहा है वह आज की ज़रूरत है. वह जरूरत है भारतबोध के लिए भी और जनजातीय-अस्मिताबोध के लिए भी. वह जनजातीय स्त्रीबोध के भीतर बैठी स्त्री को जागृत करने के लिए भी आवश्यक प्रतीत होता है. द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनना इसलिए आवश्यक हो गया है क्योंकि अब यदि उन्हें यह सम्मान दिया जाता है तो राष्ट्र को जो दिशा मिलने वाली है और जो मैसेज पूरी दुनिया को मिलने वाला है उसका भी अपना महत्त्व है.

फ़िलहाल आगामी 25 जुलाई को राष्ट्रपति भारत को मिल जायेंगे. आज जो सवाल हैं वे सवाल भी अपने एक अच्छे उत्तर के साथ समाप्त हो जायेंगे. लेकिन भारत को जो ज़वाब द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति रूप में ताजपोशी के साथ संपन्न होगा तो एक साथ कई ऐसे भी लोगों के भीतर आशाओं के दीप जल उठेंगे जो किसी गुमनाम और अँधेरे में खो जाने की डर से कभी बाहर कदम नहीं रखते. द्रौपदी मुर्मू का इसलिए भी चयन आवश्यक हो गया है क्योंकि वह इन सवालों के लिए एक सशक्त उत्तर हैं. भारतके आदिवासी समाज के, जनजातीय समाज के भीतर उम्मीद की किरण के रूप में प्रस्तावित हैं.

किसी भी राष्ट्र का उत्थान उसके आर्थिक, सामजिक, राजनीतिक भागीदारी की सुचिता से ही रेखांकित किया जाता है. भारत ने उस सुचिता की समझ को प्रकट करते हुए इस राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने का फैसला किया. चीजें हमेशा सुचिता को ध्यान में रखकर नहीं घटित होतीं लेकिन भारत की प्रकृति इस बात का संकेत कर रही है कि भारत में वह सुचिता है, और उसे बराबर सम्मान है. दुनिया का इतिहास जब कभी भी ऐसे तथ्यों को खंगालेगा तो यह समय इस बात का साक्ष्य बनेगा कि भारत में तत्कालीन सरकार ने इस सुचिता के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्ज़ करते हुए द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद पर सुशोभित किया.

आने वाले समय में द्रौपदी मुर्मू का भी सम्मान और उनकी परीक्षा की घड़ी होगी जब अनेकों चुनौतियों के बीच वह स्वयं को साबित करेंगी और जनजातीय समाज के बीच मिसाल बनकर उभरेंगी. आवश्यकता इस बात की है कि समय के सापेक्ष मन बनाते हुए राष्ट्र गौरव को कैसे स्थापित करना है इस पर हम गौर करें और राष्ट्र उत्थान में जो हमारी प्रतिबद्धता है उसका आदर करें.  एक तरह से देखा जाये तो यह ऐतिहासिक है कि अमृत पर्व पर राष्ट्र को द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति के रूप में अभिनन्दन किया जा रहा है.

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व सम्हाल चुके हैं और अहिंसक सभ्यता के पैरोकार हैं.

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