ग़ज़ल : आवास अब मिलेगा नहीं, आस छोड़कर आ फिर किसी जुगाड़ से छप्पर बनाएँ हम
✍️ हरिलाल राजभर ‘कृषक’…
अब क्यूँ न जादू इश्क़ का ऐसा चलाएँ हम
वो चैन की लें नींद तो सपनो में आएँ हम
करवट बदल-बदल के तो तनहाँ घड़ी कटी
अब इस तवील रात को कैसे बिताएँ हम
फ़ुरसत नहीं है तुझको कभी रब्त के लिए
फिर तू बता कि कैसे ये रिश्ता निभाएँ हम
हमको तो तेरे इश्क़ पे यूँ भी यक़ीन है
तू यूँ कसम न खा कि बुरा मान जाएँ हम
इक माँ ही है जो कहती है मत फ़िक्र कर तू लाल
ले लेंगे तुझसे सर की तेरी हर बलाएँ हम
कुव्वत न इतनी है कि बला छू सके हमें
चलते हैं वालिदैन की लेकर दुआएँ हम
आवास अब मिलेगा नहीं, आस छोड़कर
आ फिर किसी जुगाड़ से छप्पर बनाएँ हम
जब तंग कर रही है मुई जीस्त इस कदर
जी चाहता है मौत को अब आजमाएँ हम
‘हरिलाल’ रंग ‘नूर’ से पायी है ये ग़ज़ल
महफ़िल में शान से न इसे क्यूँ सुनाएँ हम

