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जीवनपर्यन्त स्वयं को शिक्षक समझते रहे डॉ राधाकृष्णन

…17 अप्रैल पुण्य तिथि विशेष

आज भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति, द्वितीय राष्ट्रपति, महान शिक्षाविद , उच्चकोटि के दार्शनिक भारत रत्न डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पुण्यतिथि है। आज भी भारत का बौद्धिक वर्ग राधाकृष्णन को सदाशयता से स्मरण करता है। वैसे राधाकृष्णन शास्त्रीय ( classical) अर्थों में कोई राजनीतिक और सामाजिक विचारक नहीं थे वह मूलतः उच्चोकोटि दार्शनिक और भारतीय धर्मशास्त्र के गम्भीर जानकार थे। परन्तु उनके राजनीतिक और सामाजिक विचार उनकी पुस्तकों रिलीजन एण्ड सोसाइटी, एजूकेशन पोलिटिक्स एण्ड वार, कल्की एण्ड द फ्यूचर ऑफ सिविलाइजेशन, इण्डिया एण्ड चाइना, और इज दिस पीस में पर्याप्त रूप से पढने समझने को मिल जाते हैं। तमाम उच्च पदो को सुशोभित करने बाद भी वह एक शिक्षक को सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वोपरि मानते थे। इसलिए वह स्वयं को जीवनपर्यन्त एक शिक्षक के रूप में मानते रहे। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत की दार्शनिक परम्परा, भारतीय जीवन दर्शन और भारतीय चिंतन परम्परा के विलक्षण व्याख्याकार थे। उनके अनुसार भारतीय जीवन दर्शन में महान कर्मयोगियो और सृजनात्मक व्यक्तित्वो को पैदा करने की अद्भुत शक्ति हैं। राधाकृष्णन मनुष्य में निहित अंतःप्रज्ञा को समस्त मानसिक शक्तियों से ऊंची शक्ति मानते थे। उनके अनुसार दार्शनिक, साहित्यकार, कलाकार, रहस्यवादी और वैज्ञानिक भी अपने चिंतन के विकास तथा अपनी कल्पनाओं और परिकल्पनाओं में इसका सहारा लेते हैं। चिंतन, विचार और सिद्धांत को परिपक्वता तथा श्रेष्ठतम स्वरूप प्रदान करने मे अंतःप्रज्ञा की महती भूमिका होती हैं ।
डॉ राधाकृष्णन भी रबिन्द्र नाथ टैगोर की तरह मानते थे कि-जो सभ्यता शाश्वत, नैतिक और मानवीय मूल्यों पर खडी होती हैं वह दीर्घकालिक, अविरल और उत्तरोत्तर प्रगतिगामी होती हैं। इसके विपरीत जो सभ्यता महज भौतिक उपलब्धियों और वैज्ञानिक चमत्कारों पर टिकी होती हैं वह अल्पकालिक होती हैं। इसलिए एक श्रेष्ठ और प्रगतिगामी सभ्यता में वैज्ञानिक चमत्कारों तथा भौतिक उपलब्धियों के साथ-साथ शाश्वत नैतिक तथा मानवीय मूल्यों का समन्वय आवश्यक है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति की अखंडता अविरलता और अक्क्षुणता का कारण यही समन्वय हैं। विश्व की दर्जनों सभ्यताएं काल-कवलित हो गई । इन सभ्यताओ के पतन का कारण शाश्वत नैतिक मानवीय मूल्यों का अभाव रहा है। वैज्ञानिक चमत्कारों तथा भौतिक उपलब्धियों ने शासकों के मन को विजेता के भाव भर दिया, नस्लवादी दम्भ से दम्भित कर दिया। विजेता होने का अहंकार लेकर पाश्चात्य सभ्यता के शासक दुनिया का दमन करने के लिए निकल पड़े। इसकी स्वाभाविक परिणति अंततः पतन में हूई। इसलिए एक श्रेष्ठ और आदर्श सभ्यता के लिए सार्वभौमिक दृष्टिकोण का होना आवश्यक है। राधाकृष्णन के अनुसार एक आदर्श सभ्यता के लिए जाति केन्द्रित देशभक्ति की जगह सार्वभौम दृष्टिकोण अपनाना होगा। उसी तरह जैसे आधुनिक पाश्चात्य जगत ने टॉलमी के भूकेन्द्रित सिद्धांत का परित्याग कर कोपरनिकस के सूर्यकेन्द्रिक सिद्धांत को स्वीकार कर लिया। कोपरनिकस के सूर्यकेन्द्रिक सिद्धांत को स्वीकार करने के उपरांत सम्पूर्ण यूरोप कूपमंडूकता से बाहर निकल आया तो तरक्की की राह पर सरपट दौड़ पडा।
भारत जैसे बहुधार्मीक देश में राधाकृष्णन सर्वधर्म समभाव के विचार के प्रतिपादक थे। उनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण विशुद्ध रूप से धार्मिक था। राधाकृष्णन के अनुसार आधुनिक मानव जीवन अनगिनत चुनौतियों जटिल और संकटपूर्ण परिस्थितियों से उलझा हुआ है। मनुष्य विविध प्रकार की मानसिक चिंताओं, द्वन्द्वो , मनसंतापो और भयंकर असुरक्षा का शिकार हैं। धर्म शोक संतप्त और विक्षुब्ध जीवन बार-बार संतुलन स्थापित करने का शक्तिशाली औजार है। धर्म का वास्तविक अर्थ सत्य की निरंतर साधना करना और विद्यमान सभी पदार्थों में एकता का दर्शन करना है।
महान शिक्षाविद और विलक्षण दार्शनिक एवं शिक्षा जगत के शलाका पुरूष को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन करता हूँ।

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