कविता! सुंदर कल देना है, थमकर आना, अच्छा लगता है…

@ डा. प्रमोद कुमार ‘अनंग’…
“सुंदर कल देना है”
हर प्रश्नों का हल देना है।
हमको सुंदर कल देना है।।
पानी खूब बचाओ यारों।
धरती को संबल देना है।।
पीपल – नीम सरीखे वृक्ष।
लगाकर अमृत दल देना है।।
सूख रही सारी नदियों को।
राहें स्वच्छ सरल देना है।।
प्यास बुझाना है भविष्य का।
निर्मल मीठा जल देना है।।
खनिज श्यामला की शक्ति है।
इसे बचाकर बल देना है।।
जैविक जीवन है खेतों का।
उत्तम स्वस्थ फसल देना है।।
जंतु -वनस्पति की रक्षा में।
अपना अब हर पल देना है।।
क्रियाशील रहकर जीवन में।
आए हैं तो फल देना है।।
स्वर्ग उतारेंगे धरती पर।
हरा भरा अविरल देना है।।
सुख-दुख में सहभागी बनकर।
कर विश्वास अटल देना है।।
हम एकाकी नहीं रहेंगे।
सबका साथ अचल देना है।।
दल-दल में फंसने से अच्छा।
सब कुछ आज बदल देना है।।………”अनंग “
“थमकर आना”
तुम्हीं सब्जियों के, फूलों में डालो में।
बलखाती लहराती , सुंदर बालों में।।
हरियाली में खो जाती हो, छू-छूकर।
धनिया की पत्ती में, और मसालों में।।
जड़ से पत्ती तक, अर्पण कर देना है।
तुम सलाद बन,घुलती हो घरवालों में।।
पीली-पीली चुनरी ओढ़े, मेढ़ों पर।
अक्सर चर्चा होती है ,दिलवालों में।।
कहीं बाजरे सी लंबी, सुंदर दिखती।
रंग – बिरंगे फूलों ,वाले दालों में।।
लहलहा रही फसलों में भी,तुम ही हो।
तुम्हीं खुशी हो,तुम चिंता रखवालों में।।
अरे सुंदरी ! मौसम तुम थमकर आना।
सचमुच बसती हो किसान के छालों।।…….”अनंग “
“अच्छा लगता है”
रोते हुए बच्चे को हंसाना, अच्छा लगता है।
भूखों को भरपेट खिलाना, अच्छा लगता है।।
दोस्त हमारी ताकत हैं, मिलते ही रहते हैं।
दुश्मन को भी गले लगाना, अच्छा लगता है।।
मुझे बुजुर्गों के जीवन से, सीख बहुत मिलती।
अंधे को घर तक पहुंचाना, अच्छा लगता है।।
कब कैसे कोई चुपके से, मन में बस जाता।
फिर भी उनका आंख चुराना, अच्छा लगता है।।
दरबारों में डरकर रहना, कायर का है काम।
खुलकर सच्ची बात सुनाना, अच्छा लगता है।।
बड़ी मोहब्बत होती है, मेहनतकश लोगों में।
ऐसे लोगों के घर जाना, अच्छा लगता है।।
झालर – बत्ती बाजारों के, मुझे नहीं भाते।
दिवाली में दीप जलाना, अच्छा लगता है।।
राजनीति की बातें अब, बेमानी लगती हैं।
बच्चों के संग दिल बहलाना, अच्छा लगता है।।
जितना मन हो उड़ते जाओ, पर वापस आना।
घर-मंदिर खुशियों का खजाना, अच्छा लगता है।।……”अनंग “

