धर्म कमाया जाता है

(शब्द मसीहा केदारनाथ)
एक रोज पिता ने अपने बेटे को बुलाया और उससे पूछा – “क्या वजह है कि तुम धर्म बदलना चाहते हो ?”
बेटे ने कहा -“मैं विदेश जा रहा हूँ । वहाँ पर ईसाई बहुत हैं। अगर मैं उनके धर्म का रहूँगा, तो मुझे काम करने में आसानी होगी , मुझे तरक्की मिलेगी और मैं उनके साथ घुल-मिल सकूँगा । हमारे धर्म में रखा ही क्या है ?”
“हम्म …. तुम तो अभी भी फाउंटेन पैन से लिखते हो न । जरा अपना पैन दिखाओ।” पिता ने कहा और अपने पास रखे पानी के गिलास को उठाया । फिर बूंद-बूंद स्याही को उसमें गिराने लगे।
“अगर तुम अपना धर्म छोड़ते हो तो इस पैन की तरह हो जाओगे । इस स्याही के बाद जैसे ये पैन बेकार है …..तुम अपने धर्म के बिना बेकार हो । तरक्की और धर्म का ये रिश्ता तुम नहीं समझ रहे हो अभी। सदियों के संस्कार जब लहू में शामिल होते हैं तो धर्म बनता है। जरूरत धर्म छोड़ने की नहीं है, संस्कारों पर ख़ुद को कसने की है। तुम नाम, रंग और लिबास को धर्म मत समझना …वह तो बहरूप है। धर्म जीया जाता है, धारण किया जाता है। ये आदत है ….सांस लेने की तरह होनी चाहिए …सिगरेट के धुएँ जैसी नहीं। बेटे! धर्म कमाया जाता है ….आचरण से, न कि नाम से या पहचान से। ” पिता ने सिगरेट का कश छोड़ते हुए कहा।

