देशभक्ति का क्या होगा ?
(शब्द मसीहा केदारनाथ)


रात के ग्यारह बजे नेता जी घर लौट आए थे । सब लोग खाने पर इंतजार कर रहे थे।
“अरे! अब बदल डालो इस रिवाज को, अब मैं सिर्फ तुम्हारा बाबूजी नहीं हूँ । इलाके का नेता भी हूँ और बहुत कुछ मुझे देखना पड़ता है , पार्टी के भी काम देखने पड़ते हैं।” नेता जी बोले ।
“हाँ, पिताजी! सो तो है, देश में कई समस्याए हैं। पर समस्या तो यहाँ भी हैं।” बेटा बोला।
“हा हा हा …..अरे ! मेरे लाल तुझे क्या समस्या है ? मैं हूँ, सरकार है, पुलिस है ….तू बता तो सही , तेरी समस्या कौन बन रहा है। उसका ऐसा हाल करूंगा कि पुश्तें याद करेंगी ….तेरा बाप सत्ता में है, विपक्ष में भी होता तब भी कोई तुझे परेशान नहीं कर पाता।” नेता जी बोले।
“पिताजी ! आप तो जानते ही हैं कि अपना बड़ा काम चीन से होता था और अब चीन से सामान आयात नहीं कर सकते। सामान महंगा होने से अपना घाटा बढ़ता जा रहा है और गोदाम में ढ़ेर सारा तैयार माल है पर आगे का डर लगातार बना हुआ है। समझ नहीं आता कि क्या करूँ ?” बेटे ने अपनी समस्या सामने रखते हुए कहा ।
“हम्म …सो तो है, सरकार ने राष्ट्र के हित में बड़ा फैसला लिया है, पर तुम भी निरे बेबकूफ हो ।” नेताजी मुस्कुराते हुए बोले ।
“सो कैसे?”
“हा हा हा ….तेरा फूफा है सिंगापुर में । उसकी फर्जी कंपनी बनाकर चीन से सामान लो और सिंगापुर का माल इंडिया मँगवा लो। तब तो सिंगापुर का शिप होगा …चीन का नहीं … समझे कुछ !” नेताजी प्लेट में खाना डालते हुए बोले।
तभी उनकी पोती ने कहा, “दादा जी ! तब देशभक्ति का क्या होगा ?”

