रचनाकार

दीपक को तुम बुझने न देना, इंसानियत को तुम मिटने न देना…

✍️वर्षा…

चल रही अकेली वो
पीछे से आ रहे चार वो
डरी-सहमी सी भाग रही वो
उनके भी पैर तेज होते देख वो
सड़क पर पुकारती देखो वो
सुनो भैया,सुनो दीदी,सुनो अंकल,
जब भी दिखे आवाज़ लगाती वो
तो उसकी चुनरी को तुम संभाल लेना
सुनो इंसानियत को तुम मिटने न देना।

देखो दर्द से तड़प रहा है वो
फटे कपड़े से तन ढक रहा है वो
हाथों में चंद सिक्के लिए खड़ा है वो
बड़ी आस लगाए मुझे देख रहा है वो
डॉ साहब मुँह से खून निकल रहा है
सीने में भी दर्द हो रहा है ये बता रहा वो
इलाज़ करवाना है मग़र पैसे नहीं है कह रहा वो
उस वक्त तुम अपनी प्रतिज्ञा याद कर लेना
मुफ्त में उसका इलाज़ तुम कर देना
धरती के भगवान हो तुम ये बात को साबित कर देना।
सुनो इंसानियत को तुम मिटने न देना।

चल रही है कोर्ट में पेशी

ऑडर-ऑडर का शोर गूंज रहा है
एक ओर मुजरिम तो
एक ओर गवाह खड़ा है
वकीलों में हो रही है बहस
देखो मोठे पेट वाला वो सेठ
पैसों से कानून को तोल रहा है
जज साहब भी सब कुछ
बारीकी से सुन रहा है
सत्य की जीत और
असत्य की हार
यही संदेश तुम देना
हे कानून के रक्षकों !
सुनो इंसानियत को तुम
मिटने न देना।

दीपक को तुम बुझने न देना,
इंसानियत को तुम मिटने न देना।

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