रचनाकार

फिर जागो, भगवन परशुराम ! ..…

@ महेन्द्र राय…

भगवान श्री परशुराम-जयंती की पावन बेला पर, भगवान के पावन पदारविंदो में सादर समर्पित

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फिर ‘परशु’ उठा, ‘कोदंड’ लिए,
कर ‘भ्रष्टों’ पर भीषण प्रहार।
कर भ्रष्ट-तंत्र में ,उथल-पुथल,
हर लो इनकी , क्षमता अपार।

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फिर जागो उठा है ‘सहसबाहु’,
ले रूप ,‘भ्रष्टता’ का ,अनेक ।
कर रहा ‘साधु-जन’-उत्पीडन,
कर रहा ‘भ्रष्टता’ काभिषेक।

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बनता है ‘भू-माफिया’ कहीं,
अन्यत्र बना, ‘भंडारण’ है।
हो कहीं ‘छिनैती’ बन उभड़ा,
यह किये रूप, बहु धारण है।

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‌‌ बन कहीं ‘शोहदा’, ‘अपहर्ता’,
शोषण करता है, ‘दीनों’ का ।
नफ़रत फैलाता जन-जन में,
हर रहा चैन है ,‘हीनों’ का ।

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कर राजनीति, कर भ्रमित ,सभी,
दिखलाता स्वप्न सुहाना है ।
यह है ‘प्रतिभा’ का कुटिल काल ,
‘मुर्खों’ का यह , दीवाना हैं ।

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कर भीषण फरसे से प्रहार,
दो गाड़ ‘भ्रष्टता’, ‘अतल’-अमित।
लो बचा ,डूबती प्रतिभा को,
हो जाय ‘मंदता’ सकल नमित।

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कर दो समाप्त षड़यंत्र सकल,
जो रोक रहीं ‘प्रतिभा-धारा’।
ये बड़ी लकीरें, छोटी का,
हैं मेट रहीं, जीवन सारा ।

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‘सूर्य’ की ‘सूर्यता’ छेड़ नहीं,
है ‘दिव्य’, ‘दिव्यता’ पाने दें।
‚तारों’ में क्षमता पैदा कर,
निज क्षमता से मुस्काने दें।

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रोको विकास की गति न कभी,
विकसित को ‘विकसित’ होने दो।
बढ़ने वाले की वृद्धि रोक,
ऐसी दुर्बुद्धि न , होने दो।

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आओ मेरे प्रिय। परशुराम!,
दो मिटा विषमता ,विषम -कुटिल।
छोटा, बढ़ता है बढ़ने दें,
बढ़ते का पथ, मत करो जटिल।

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प्रभु ! प्रकृति-दत्त, ‘अनमोल रत्न’,
का कहीं नहीं ‘ भंडारण’ हो।
यह फैल रही माफिया–वृत्ति,
रोको, न रोग का कारण हो।

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विद्वत जनों को सादर समर्पित एवं अभिनंदन……
द्वारा – [महेन्द्र राय पूर्व प्रवक्ता अंग्रेजी आजमगढ़]

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