अवंतिका विशाल की ग्यारह रचनाएँ
@ अवंतिका विशाल…
कुछ बात फिजाओं में है…
आज न जाने क्या
इन हवाओं में है
बेचैन कर रही हैं
कुछ बात फिजाओं में है
कर रही हैं गुफ्तगू
राज़ छिपा बूँदों में है
दे रही है दस्तक़ दिल पे
पैगाम इन परिदों में है
बादल दीवाना हुआ
इश्क़ तो सजदों में है
बरसातों में कहाँ ढंढूँ मैं
ये बसा हर दिलों में है
होठों पर बसी हँसी
बात आँखों के पानी में है
बिन बात बरसती हैं ये
ख़ुशी ग़म की निशानी में है
अनदेखा अनजाना सा
क़शिश उसकी अदाओं में है
भिगोता रहा वो रात भर
अब भी वो टुकड़ा हिज्रों में है
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छोटी सी जिंदगानी में, महफूज़ रखना उम्र को…
आप दिल में रखेगें
तो मिला कौन करेगा ॥
देखोगे नहीं नज़र भर
तो शरमाया कौन करेगा॥
सलामत रखना ए ख़ुदा
तू मेरे हमसफ़र को॥
ग़र हम ही न रहे तो
तुझसे दुआ कौन करेगा॥
छोटी सी जिंदगानी में
महफूज़ रखना उम्र को॥
ग़र चंद लम्हे न दोगे
तो फ़ना कौन करेगा॥
ठुकरा दोगे ग़र मेरे
फैलाए दामन को॥
तो दहलीज़ पर तेरी
सजदा कौन करेगा॥
ग़र आँखें होगी बंद
तो दीदार कौन करेगा
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मैं इंतज़ार करूँगी तुमसे मिलूँगी…
क्या जानते हो तुम
मैं तुम्हें हर जन्म मिलूँगी
दोबारा फिर दास्तां
दोहराई जाएगी
हमारी मोहब्बत की
क्या जानते हो तुम
मैं कब कहाँ कैसे
किस रूप में मिलूँगी
नहीं जानती
पर मिलूँगी बार बार
लेकिन इक़ बार फिर अधूरी
प्रेम कहानी पूरी होगी
क्या जानते हो तुम
मैं क्षितिज के उस पार मिलूँगी
जहाँ बिछड़ने का कोई
दस्तूर नहीं होता
क्या जानते हो तुम
मैं इंतज़ार करूँगी तुमसे मिलूँगी
क़ायनात के अंत तक
जहाँ हम दोनों जन्म जन्मांतर
तक एक होगें ॥
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होगी बरसात मन पे भी, तुम्हारा स्पर्श रुह छुएगी…
किया था वादा तुमने
आने का सावन में
डालोगे झूले मेरे लिए
हमारे घर के आँगन में
खिल जाएगी फुलवारी
हमारे तुम्हारे तन मन में
रोम-रोम गीत गाएगा
रास रचेगी जीवन में
ढल जाएगी वो शाम
हम दोनों के बीच में
आएगी अलसाई रात
हम दोनों होंगें साथ में
सावन रुत पवन चलेगी
बूँदे हम तुम पर बरसेगी
होगी बरसात मन पे भी
तुम्हारा स्पर्श रुह छुएगी
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कुछ अधूरी, कथाएँ…
कुछ कही
कुछ अनकही
कथाएँ
अधूरी रह जाती
जीवन में
कुछ पूरी होती
सफ़हों में
कुछ दिल के
तहखानों में
कैद हो जाती
कुछ दीवारों में
चुनी हुई
कुछ पत्थरों से
टकराती
थपेड़े खाती
चीखें मारती
क़ायनात में
भटक रही है
अब भी
लिखी गई है
दास्तां
किताबों में
रहगुज़र रास्ता
देख रही है
सदियों से
सिसक रही हैं
कलियाँ
तन्हाई समेट
रही है
कुछ टूटे टुकड़े
कह रहा है
रोम -रोम
कुछ अधूरी
कथाएँ
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भला सुकूँ चैन मिले कहाँ…
लिखने बैठी अंतर्मन से
दिल की संवेदन कथा
काली घटाओं के साये
गाए गीत घनघोर व्यथा ॥
क़लम भी बह गई दर्द से
सफ़हे बिखरे यहाँ वहाँ
पथराए चक्षुओं को भी
भला सुकूँ चैन मिले कहाँ ॥
ए बेक़रार दिल न पूछ
कैसे कटे ये दिन रैन
पेशोपेश में पड़े हृदय से
व्याकुल अश्क़ बहते नैन ॥
झाइयाँ मुख मंडल पर
छा गया ये कैसा द्वेष
बैरन बन गई ये बूँदें भी
कर रहीं कितना क्लेश ॥
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दिल ही दिल की सुन बैठा…
अज़ब दिल ने मजबूर किया
एक पल में तेरा हो बैठा
एक नज़र मिलाकर तुझसे
आँखों में तुझे बसा बैठा
कुछ मत पूछो जाने कब
तुझसे यूँ प्रीत लगा बैठा
चुपके – चुपके आकर तू
मेरे मन में जगह बना बैठा
बातों ही बातों में तू
जाने कब मेरा बन बैठा
ख़ुद को ही पता न चला
मैं ग़ज़ब दीवाना बन बैठा
ये कैसी नादानी दिल की
कुसूरवार ख़ुद को बना बैठा
दुनिया चाहे कुछ भी कहे
मैं मन ही मन दिल दे बैठा
ये कैसी कशमकश में फंसा
मैं कैसा मोह पाल बैठा
अपने वीराने जीवन को
ख़ूबसूरत रंग से सजा बैठा
था तो बिल्कुल तन्हा सा
पर उसे अपना बना बैठा
कहीं जुदा न हो जाऊँ उससे
डरते – डरते ये कह बैठा
करता तो वो है मनमानी
फिर भी इश्क़ फ़रमा बैठा
वो बहुत मगरूर है लेकिन
दिल ही दिल की सुन बैठा
ऐसा भी चाहा क्या सुकूँ
कि ख़ुद को बेचैन कर बैठा
कभी न चाहा था हमने
कि नींदों में ख़लल कर बैठा
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फिर लौटे वो इस तरह…
खुले आसमां के तले
टिमटिमाते तारों को मिले
नज़र आए वो इस तरह
हमारे सारे ज़ख़्म सिले ॥
उसी पेड़ के नीचे
उन्हीं पगडंडियों के पीछे
भागे आए वो इस तरह
उसी पर चलना सीखे ॥
चिड़ियों की चहचहाहट में
पत्तों की सरसराहट में
फिर लौटे वो इस तरह
आँगन की मुस्कुराहट में ॥
बारिश की फुहारों में
सावन के इस यौवन में
भीगे आए वो इस तरह
मोहब्बत भरी वफ़ाओं में ॥
सुबह सबेरे भौर में
ढलती सुनहरी शाम में
कर गए इज़हार इस तरह
रात के घने अंधेरों में ॥
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हौले से छू करके मुझे, मिरी जुल्फें सहलाएगा…
रात सपना कोई आएगा
मेरी चुप्पी तोड़ जाएगा
रतजगी इन आँखों में
कोई तो ख़्वाब जगाएगा ॥
मुझे हँसना सिखाएगा
लब पे मुस्क़ान दे जाएगा
बुझी बुझी सी ज़िंदगी में
प्यार के रंग भर जाएगा ॥
गहरा अँधेरा गहराएगा
मिरी साँसे महकाएगा
हौले से छू करके मुझे
मिरी जुल्फें सहलाएगा ॥
फिर लौकर वो आएगा
तन्हाई दूर कर जाएगा
रूके रूके क़दमों को
इब्तिदा दे जाएगा ॥
मुझे मुझ से चुराएगा
मिरी माँग सज़ाएगा
अपनी आगोश में लेकर
मुझे रात भर सुलाएगा ॥
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बहुत याद आता वो गुज़रा जमाना…
रूठ कर फ़िर तुम्हारा मुस्कुराना ।
याद है हमें अब भी गुज़रा जमाना ॥
दूर से हमें देख कर इशारे कर जाना ।
पास आते ही नतमस्तक़ हो जाना ॥
कैसे बीत गया वो हर लम्हा दीवाना ।
झूठ – मूठ रूठ कर बहाना बनाना ॥
ना कोई शिकवा ना शिकायत रखना ।
कहाँ संभव था इक़ दूजे से दूर रहना ॥
बातों ही बातों में दिल जीत जाना ।
यूँ ही चुटकियों में गुत्थी सुलझाना ॥
नाराज़ होने पर तुम्हारा गले लगाना ।
बहुत याद आता वो गुज़रा जमाना ॥
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हम तुझसे मोहब्बत कर जाएंगें…
यूँ ना देख मुझे तिरछी नज़रों से
हम तेरे दीवाने हो जाएंगें
यूँ ना खींच मुझे अपनी क़शिश से
हम तुझे देख मचल जाएंगें
यूँ ना बेबस कर अपने हुस्न से
हम तेरे बिन ना रह पाएंगें
यूँ ना बिखेर जलवे तेरी अदाओं से
हम तेरे ज़ाल में फँस जाएंगें
यूँ ना बरसा नूर तेरे चेहरे से
हम तुझसे मोहब्बत कर जाएंगें
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